30 दिसंबर 1943: जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर में फहराया तिरंगा

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का मार्ग चुना। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) का गठन किया।

जहाँ आज़ादी ने पहली बार भूमि पाई—पोर्ट ब्लेयर में नेताजी

जहाँ आज़ादी ने पहली बार भूमि पाई—पोर्ट ब्लेयर में नेताजी

आज ही के दिन 30 दिसंबर 1943 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराकर भारत की स्वतंत्रता की दिशा में एक ऐतिहासिक घोषणा की थी। यह केवल ध्वजारोहण का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खुली चुनौती और भारतीय आत्मसम्मान के पुनर्जागरण का प्रतीक था।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का मार्ग चुना। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) का गठन किया और 21 अक्टूबर 1943 को आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना की। जापान के सहयोग से अंडमान-निकोबार द्वीपों को अंग्रेज़ों से मुक्त कराया गया, जिन्हें नेताजी ने शहीद द्वीप और “स्वराज द्वीप नाम दिया। यह कदम प्रतीकात्मक ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी ब्रिटिश सत्ता की नींव को हिलाने वाला था।

30 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर में नेताजी ने तिरंगा फहराकर स्पष्ट संदेश दिया कि भारत की स्वतंत्रता केवल मांगने से नहीं मिलेगी, बल्कि उसके लिए साहस, संगठन, अनुशासन और बलिदान आवश्यक हैं। इस अवसर पर उन्होंने द्वीपों का प्रशासन आज़ाद हिंद सरकार को सौंपने की घोषणा की और कहा कि यह भारत की स्वतंत्रता की पहली भूमि है, जहाँ से अंग्रेज़ी शासन समाप्त हुआ।

नेताजी का यह कदम भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना। उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता केवल भावनात्मक आकांक्षा नहीं, बल्कि सामर्थ्य, परिश्रम, न्याय और संगठित संकल्प का परिणाम होती है। उनका प्रसिद्ध उद्घोष—
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”— आज भी राष्ट्रभक्ति और त्याग की भावना को प्रज्वलित करता है।

हालाँकि अंडमान-निकोबार में आज़ाद हिंद सरकार का शासन अल्पकालिक रहा, लेकिन इसका ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव अत्यंत गहरा था। इसने भारतीय जनमानस में यह विश्वास पैदा किया कि ब्रिटिश शासन अजेय नहीं है और भारत स्वयं अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है।

आज, जब हम 30 दिसंबर को इस ऐतिहासिक घटना को स्मरण करते हैं, तो यह दिन हमें यह सुभाषित देता है कि राष्ट्र की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा के लिए दृढ़ निश्चय, त्याग और साहस अनिवार्य हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का यह साहसिक कार्य भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है और आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देता रहेगा।

Exit mobile version