CMPR (सेंटर फॉर मीडिया पॉलिसी एंड रिसर्च) द्वारा आयोजित दो दिवसीय नमो बुक फेस्ट का आज आखिरी दिन है। यह विशेष पुस्तक मेला नई दिल्ली के अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित किया गया है। इस आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन, उनके विचारों और नीतियों पर आधारित 400 से अधिक पुस्तकों का प्रदर्शन किया गया है। देश-विदेश से आए पाठकों, छात्रों और विचारकों के लिए यह मेला खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
कार्यक्रम के दूसरे दिन एक महत्वपूर्ण अवसर तब आया, जब देशभर के स्कूली छात्र-छात्राओं द्वारा लिखी गई एक विशेष पुस्तक का अनावरण किया गया। यह पुस्तक भारत के विभिन्न राज्यों के छात्रों द्वारा लिखे गए लेखों का संकलन है। इन लेखों में छात्रों ने प्रधानमंत्री मोदी की पहल ‘परीक्षा पर चर्चा’ और ‘विकसित भारत’ के विजन जैसे विषयों पर अपने विचार साझा किए हैं। इस पुस्तक के लिए लगभग 20 हजार छात्रों ने अपने लेख भेजे थे, जिनमें से चुने गए लेखों को पुस्तक का रूप दिया गया है। यह पहल छात्रों की सोच, जागरूकता और देश के भविष्य को लेकर उनकी समझ को दर्शाती है।
इसके साथ ही आज ऑस्ट्रेलिया के लेखक सल्वाटोर बबून्स द्वारा प्रधानमंत्री मोदी पर लिखी गई पुस्तक का भी अनावरण किया जाएगा। यह पुस्तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व और उनकी वैश्विक छवि को दर्शाती है।
नमो बुक फेस्ट के दूसरे दिन भी कई देश और विदेश के प्रतिष्ठित विचारकों और विद्वानों के सत्र आयोजित किए गए हैं। इन सत्रों में वक्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों, नेतृत्व शैली और भारत के विकास पर उनके प्रभाव को लेकर अपने विचार रखेंगे। कार्यक्रम के पहले दिन जहां केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह, राम माधव और तुहिन सिन्हा जैसी जानी-मानी हस्तियों ने अपने विचार साझा किए, वहीं दूसरे दिन सुनील देवघर, विनय सहस्त्रबुद्धे, शहज़ाद पूनावाला और गौरव वल्लभ जैसे वक्ता अपने विचार प्रस्तुत करेंगे।
कुल मिलाकर, नमो बुक फेस्ट न केवल पुस्तकों का मेला है, बल्कि यह विचारों, संवाद और युवा सोच को मंच देने वाला एक महत्वपूर्ण आयोजन भी है, जो विकसित भारत की दिशा में एक सकारात्मक संदेश देता है।
बता दें कि दिल्ली सीएम श्रीमती Rekha Gupta ने इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। उनके उपस्थित होने ने उद्घाटन दिवस को राजनीतिक महत्व प्रदान किया और महोत्सव का माहौल स्थापित किया। आयोजकों ने उनकी भागीदारी को एक ऐसे क्षण के रूप में वर्णित किया, जिसने नेतृत्व, दृष्टि और सार्वजनिक सेवा को एक साथ लाया। इस कार्यक्रम में भारी भीड़ देखी गई, विशेष रूप से छात्रों और युवा पाठकों की, जो सभी सत्रों में मुख्य दर्शक वर्ग थे।
