फील्ड मार्शल कोडंडेरा मदप्पा करियप्पा, जिन्हें प्यार से के.एम. करियप्पा कहा जाता है, भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ और राष्ट्र सेवा, अनुशासन और समर्पण के प्रतीक थे। उन्होंने 15 जनवरी 1949 को ब्रिटिश जनरल रॉय ब्यूचर से भारतीय सेना का कमान संभाला और 1986 में उन्हें फील्ड मार्शल का सम्मान प्राप्त हुआ, जो भारतीय सेना का सर्वोच्च पद है। इससे पहले केवल फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ही इस पद पर थे।
करियप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को शानिवारसांथे, कोडागु, कर्नाटक में हुआ। वे एक कोडवा परिवार में जन्मे थे, जिनमें सैन्य परंपरा बहुत गर्व की बात थी। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा मडिकेरी के सेंट्रल हाई स्कूल से ली और आगे प्रेसिडेंसी कॉलेज, मद्रास (अब चेन्नई) में पढ़ाई की।
सैनिक जीवन की शुरुआत
विश्व युद्ध-I की वीरता की कहानियों से प्रेरित होकर करियप्पा ने सैन्य करियर चुना। 1919 में वे उन पहले भारतीयों में से थे जिन्हें इंग्लैंड के रॉयल मिलिट्री एकेडमी, सैंडहर्स्ट में प्रशिक्षण के लिए चुना गया। 1920 में वे ब्रिटिश भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त करने वाले भारतीय अधिकारियों में से एक बने।
उन्होंने2/88 कर्नाटिक इन्फैंट्री (बाद में 1/7 राजपूत रेजिमेंट) से अपने करियर की शुरुआत की। विश्व युद्ध-II के दौरान उन्होंने मध्य पूर्व और बर्मा (म्यांमार) सहित कई क्षेत्रों में सेवा की। उनकी नेतृत्व क्षमता और रणनीतिक कौशल को व्यापक रूप से सराहा गया।
भारतीय सेना का कमांडर-इन-चीफ
1947 में भारत के विभाजन के समय, करियप्पा ने भारतीय सेना के विभाजन की जिम्मेदारी संभाली। 15 जनवरी 1949 को वे भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने। इस नियुक्ति ने ब्रिटिश नियंत्रण का अंत और भारत की संप्रभुता का प्रतीक बनकर दिखाया। उन्होंने सेना में अनुशासन, आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। विभाजन के बाद सेना में एकता बनाए रखने और सेना को मजबूत बनाने में उनका योगदान अहम रहा।
1965 युद्ध में पिता का कर्तव्य
1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान करियप्पा का सामना व्यक्तिगत परीक्षा से हुआ। उनके बेटे, स्क्वाड्रन लीडर के.सी. करियप्पा भारतीय वायु सेना में थे और पाकिस्तान ने उन्हें युद्ध के दौरान कैद कर लिया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान, जिन्होंने पहले करियप्पा के अधीन सेवा की थी, ने उनके बेटे की विशेष रिहाई की पेशकश की। करियप्पा ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा कि उनके बेटे को किसी विशेषाधिकार के बिना सभी युद्धबंदी सैनिकों की तरह ही माना जाए।
इस निर्णय ने सेना में स्पष्ट संदेश दिया: देश सेवा और नियम परिवार से ऊपर है। यह घटना बाद में सैन्य इतिहास में नैतिक नेतृत्व और ईमानदारी का उदाहरण बन गई।
सेवानिवृत्ति और योगदान
1953 में सेवानिवृत्त होने के बाद, करियप्पा ने ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भारत के उच्चायुक्त के रूप में सेवा की। 1986 में उन्हें फील्ड मार्शल का पद दिया गया। वे अपनी सादगी, ईमानदारी और पेशेवर अनुशासन के लिए जाने जाते थे।
करियप्पा का निधन 15 मई 1993, बेंगलुरु में हुआ। भारत में 15 जनवरी को सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो उनके जीवन और योगदान को सम्मानित करता है।
