इस्लामिक NATO का सपना तोड़ेगा भारत, UAE के साथ बड़ा रणनीतिक समझौता

एक बार फिर इस्लामिक देश मिलकर इस्लामिक नाटो बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वह शायद भूल रहा है कि भारत के ताकत के आगे सब फिका है।

इस्लामिक NATO का सपना तोड़ेगा भारत

इस्लामिक NATO का सपना तोड़ेगा भारत

यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायद के भारत दौरे की तैयारी के बीच, पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बदल रहे हैं। ईरान अंदरूनी अशांति से जूझ रहा है और अमेरिका उस पर दबाव बनाने के तरीकों पर विचार कर रहा है। वहीं सऊदी अरब और यूएई, जो कभी बहुत करीबी माने जाते थे, अब यमन युद्ध को लेकर अलग-अलग पक्षों में हैं।

इसी बीच तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन इस्लामी दुनिया का नेतृत्व करने की कोशिश कर रहे हैं। तुर्की अब सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बने सुरक्षा समझौते (SDMA) में शामिल होने की संभावना तलाश रहा है। अगर ऐसा होता है, तो यह एक नए तरह के सैन्य गुट का रूप ले सकता है, जिसे कुछ लोग “इस्लामिक नाटो” भी कह रहे हैं।

इस समझौते से पाकिस्तान को ज्यादा ताकत और आत्मविश्वास मिल सकता है। तुर्की पहले से ही पाकिस्तान के काफ़ी करीब है और भारत के खिलाफ, खासकर कश्मीर के मुद्दे पर, खुलकर बोलता रहा है। सऊदी अरब सीधे भारत के खिलाफ न भी जाए, लेकिन पाकिस्तान के इर्द-गिर्द बनता यह सुरक्षा गुट भारत के लिए चिंता का विषय है।

हालांकि, भारत के यूएई के साथ रिश्ते बहुत अच्छे हैं। दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ मिलकर काम करते हैं और यूएई भारत में भारी निवेश भी करता है। लेकिन सऊदी अरब और यूएई के बीच बढ़ते मतभेदों के कारण भारत को बहुत संतुलन बनाकर चलना होगा।

इस बीच भूमध्यसागर क्षेत्र में एक नया मौका भी सामने आया है। इज़राइल, ग्रीस और साइप्रस ने आपसी सैन्य सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है। भारत को भी इस समूह में शामिल होने का निमंत्रण मिला है। भारत के इन तीनों देशों के साथ पहले से अच्छे रिश्ते हैं और सैन्य अभ्यास भी होते रहे हैं।

अगर भारत इस सहयोग में शामिल होता है, तो उसकी सैन्य और रणनीतिक पहुंच बढ़ेगी, लेकिन वह किसी पक्के सैन्य गठबंधन में फंसा नहीं रहेगा। इससे भारत अपनी समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय स्थिति को मजबूत कर सकता है।

भारत की नीति हमेशा से रही है कि वह किसी एक सैन्य गुट का हिस्सा न बने। इसलिए फिलहाल किसी औपचारिक गठबंधन में जाना जरूरी नहीं है। लेकिन बदलते हालात को देखते हुए, भारत को अलग-अलग देशों के साथ सुरक्षा और रक्षा सहयोग बढ़ाने की जरूरत है।

संक्षेप में, भारत को “इस्लामिक नाटो” जैसे किसी गुट का जवाब उसी तरह के गठबंधन से नहीं देना है, बल्कि समझदारी से अलग-अलग देशों के साथ मजबूत रिश्ते बनाकर अपनी सुरक्षा और हितों की रक्षा करनी है।

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