ईरान में हालिया घटनाक्रम सिर्फ ईरान की आंतरिक उथल–पुथल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके व्यापक क्षेत्रीय और वैश्विक निहितार्थ हैं। पश्चिम एशिया के इस महत्वपूर्ण देश में बढ़ता जन असंतोष, आर्थिक संकट और वैश्विक तनाव ऐसे समय सामने आए हैं, जब वैश्विक व्यवस्था पहले ही अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। यह स्थिति भारत के लिए विशेष महत्व रखती है, क्योंकि ईरान न केवल उसकी ऊर्जा और व्यापारिक सुरक्षा से जुड़ा है, बल्कि मध्य एशिया, अफगानिस्तान और यूरेशिया तक उसकी रणनीतिक पहुँच का भी एक प्रमुख रास्ता भी है।
ईरान में मौजूदा असंतोष की जड़ें बेहद गहरी हैं। दशकों से लगे पश्चिमी प्रतिबंधों ने ना सिर्फ ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है बल्कि महंगाई, बेरोज़गारी, मुद्रा अवमूल्यन और जीवन–यापन की बढ़ती लागत ने आम नागरिक की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की सरकार ने आर्थिक हालात की गंभीरता को स्वीकार भी किया है, लेकिन सुधारों की गति और प्रभाव को लेकर जनता में निराशा बनी हुई है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि यह असंतोष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक भी है, जिसे युवा और शिक्षित आबादी खुलकर व्यक्त कर रही है।
इसमें कोई संदेह नही है कि आंतरिक कारणों के साथ–साथ बाहरी दबावों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। अमेरिका और उसके सहयोगियों की ईरान को लेकर रणनीति लंबे समय से दबाव, प्रतिबंध और अलगाव पर आधारित रही है। हालिया प्रदर्शनों के दौरान पूरे विश्व ने देखा कि पश्चिमी नेताओं के बयान और खुले समर्थन ने ईरान के भीतर यह धारणा और मजबूत की है कि इन आंदोलनों को बाहरी ताक़तें अपने हितों के लिए इस्तेमाल करना चाहती हैं। पूर्व में हम लीबिया, इराक और सीरिया जैसे उदाहरण देखें तो हमें यह समझने में आसानी होगी कि ईरान और पूरे क्षेत्र के लिए यह एक चेतावनी हैं कि शासन परिवर्तन के नाम पर किया गया विदेशी हस्तक्षेप अक्सर दीर्घकालिक अस्थिरता ही लेकर आता है।
भारत इस संदर्भ में एक अलग और संतुलित दृष्टिकोण रखता है। भारत ने परंपरागत रूप से ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से परहेज़ किया है और संवाद व कूटनीति को प्राथमिकता दी है। यह नीति भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह पश्चिम एशिया में किसी एक ध्रुव के साथ खड़े होने के बजाय सभी प्रमुख पक्षों से संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।
भारत के लिए ईरान की स्थिरता कई कारणों से महत्वपूर्ण है।
उनमें सबसे पहली है ऊर्जा सुरक्षा
भले ही हाल के वर्षों में भारत ने ईरान से तेल आयात कम किया हो, लेकिन पश्चिम एशिया में किसी भी बड़े टकराव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पर पड़ेगा। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में अस्थिरता तेल और गैस की कीमतों को प्रभावित कर सकती है, जिसका प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
दूसरा: समुद्री व्यापार और आपूर्ति शृंखला
भारत का एक बड़ा व्यापार पश्चिम एशिया और यूरोप से होकर गुजरता है। लाल सागर, फारस की खाड़ी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में किसी भी तरह का सैन्य टकराव वैश्विक समुद्री व्यापार को बाधित कर सकता है। हालिया वर्षों में वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की नाज़ुकता भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सबक रही है।
तीसरा: रणनीतिक संपर्क और क्षेत्रीय पहुँच
ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह भारत के लिए केवल एक व्यापारिक परियोजना नहीं है, बल्कि यह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच का एक अहम माध्यम है। अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) भारत, ईरान, रूस और मध्य एशिया को जोड़ने वाली एक दीर्घकालिक रणनीतिक परियोजना है। यदि ईरान में अस्थिरता बढ़ती है या उस पर नए और कठोर प्रतिबंध लगते हैं, तो इन परियोजनाओं की प्रगति प्रभावित हो सकती है।
भारत–ईरान संबंधों में जो सबसे खास बात यह रही है कि दोनों देशों ने कठिन परिस्थितियों में भी संवाद बनाए रखा है। अमेरिका के CAATSA जैसे कानूनों और प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए ईरान के साथ संपर्क पूरी तरह समाप्त नहीं किया। चाबहार परियोजना को प्रतिबंधों से मिली अस्थायी छूट इसी संतुलित कूटनीति का परिणाम है। वर्तमान संकट में भारत की भूमिका केवल एक दर्शक की नहीं हो सकती। इन सभी घटनाक्रम में भारत ने अपने कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से यह संकेत दिया है कि वह क्षेत्र में तनाव कम करने और संवाद को बढ़ावा देने के पक्ष में है। विदेश मंत्री द्वारा ईरान और अमेरिका दोनों से संपर्क बनाए रखना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के साथ एक रणनीतिक स्वायत्तता का संदेश भी है कि भारत किसी भी वैश्विक शक्ति के दबाव में आए बिना अपने हितों और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देता है।
हालाँकि इन सभी घटनाक्रम में भारत को इस संतुलन में सावधानी भी बरतनी होगी क्योंकि एक ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भारत के गहरे रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ उसके ऐतिहासिक और भू–राजनीतिक हित जुड़े हैं। किसी भी पक्ष के साथ अत्यधिक झुकाव भारत की दीर्घकालिक रणनीति के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इसलिए भारत के लिए सबसे विवेकपूर्ण रास्ता यही है कि वह तनाव कम करने, प्रतिबंधों में यथासंभव छूट लाने और रीजनल डॉयलॉग को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम करे।
इस संदर्भ में भारत के सामने सबसे महत्वपूर्ण पहलू प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा का है। पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय कार्यरत हैं, जिनकी आजीविका और सुरक्षा सीधे तौर पर क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ी हुई है। ईरान में किसी भी बड़े पैमाने की अस्थिरता या सैन्य टकराव का प्रभाव आसपास के देशों तक फैल सकता है। हाल के वर्षों में भारत ने संकटग्रस्त क्षेत्रों से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने की क्षमता का प्रदर्शन किया है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान केवल स्थिरता और शांति से ही संभव है। ईरान के आंतरिक हालात पर भारत का रुख भी संतुलित होना चाहिए। जनता की वैध आर्थिक और सामाजिक आकांक्षाओं को समझते हुए भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि किसी भी देश की स्थिरता उसके अपने लोगों द्वारा तय की जानी चाहिए, न कि बाहरी हस्तक्षेप से। दमन और हिंसा से अस्थायी शांति तो मिल सकती है, लेकिन स्थायी समाधान केवल समावेशी सुधारों और संवाद से ही संभव है।
चाबहार परियोजना भी इस दृष्टि से एक परीक्षा भी है और अवसर भी, क्योंकि यह बंदरगाह न केवल भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ता है, बल्कि भारत की दीर्घकालिक यूरेशियन रणनीति का आधार भी है। यदि ईरान पर प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ता है या वहां अस्थिरता गहराती है, तो इस परियोजना की गति प्रभावित हो सकती है। ऐसे में भारत को वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी विचार करना होगा, लेकिन चाबहार की केंद्रीयता को कम किए बिना। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत यह भलीं भांति समझता है कि ईरान में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहने की स्थिति में चीन और रूस की भूमिका और मजबूत हो सकती है। पहले से ही चीन ने ईरान के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक समझौते किए हैं। यदि भारत इस क्षेत्र में अत्यधिक सतर्कता या निष्क्रियता दिखाता है, तो उसके लिए भविष्य में रणनीतिक स्पेस सीमित हो सकता है। इसलिए भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह ईरान के साथ अपने संपर्कों को केवल प्रतीकात्मक न रखे, बल्कि आर्थिक, कनेक्टिविटी और कूटनीतिक स्तर पर उन्हें सार्थक बनाए।
मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में जब यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और एशिया प्रशांत में बढ़ते तनाव विश्व व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं, ईरान में किसी भी बड़े टकराव का असर किसी भी सीमा तक जा सकता है। भारत जैसे उभरते वैश्विक शक्ति के लिए यह एक कूटनीतिक परीक्षा की घड़ी है जहाँ उसे अपने राष्ट्रीय हितों, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक शांति के बीच संतुलन साधना होगा। अंततः, ईरान का भविष्य उसके अपने लोगों और नेतृत्व के निर्णयों पर निर्भर करेगा। लेकिन भारत के लिए यह स्पष्ट है कि एक स्थिर, शांत और संवाद आधारित ईरान ही उसके हित में है। टकराव, प्रतिबंध और हस्तक्षेप की राजनीति से दूर रहकर कूटनीति, संपर्क और सहयोग का रास्ता ही न केवल ईरान, बल्कि पूरे क्षेत्र और भारत के लिए भी बेहतर भविष्य की नींव रख सकता है।
