माचाडो ने ट्रंप को ‘वापस जीतने’ के लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया , अमेरिकी राष्ट्रपति ने बेझिझक अपनाया

अमरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ने पुरस्कार पाने के बाद से अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सभी को जानकारी दी, जिसके बाद से लगातार सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गई।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस विवादित कदम को बेझिझक अपनाया

अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस विवादित कदम को बेझिझक अपनाया

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और वेनेजुेला की विपक्षी नेता मारिया कोरिन माचोडो इन दिनों चर्चा में है, दरअसल,व्हाइट हाउस में जबसे उन्होंने अपना नोबेल शांति पुरस्कार का मेडल राष्ट्रपति ट्रंप को सौपा है। इस खबर के मिलते ही सोशल मीडिया के अलावा हर जगह चर्चा शुरू हो गई.

नोबेल शांति पुरस्कार देने के बाद से लोगों में इस बात का इशारा शुरू हो गया है कि यह पुरस्कार वेनेजुएला की आजादी के लिए दिया गया है, ट्रंप इस शांति का समर्थन करें, हालांकि इस बात का कयास कुछ दिनों पहले से लगाया जा रहा था कि ट्रंप को वेनेजुेला की तरफ से शांति पुरस्कार से सम्मानित किया जा सकता है।  वहीं , ट्रंप ने इस मौके को तुरंत भुनाया और ट्रुथ सोशल पर लिखा कि उन्होंने माचाडो से “नोबेल स्वीकार कर लिया है”, जबकि नोबेल समिति पहले ही साफ कर चुकी है कि यह पुरस्कार न तो रद्द किया जा सकता है, न साझा किया जा सकता है और न ही किसी और को दिया जा सकता है।

अपने पोस्ट में ट्रंप ने इसे बड़े सम्मान और “आपसी सम्मान” का प्रतीक बताया, और यह नजरअंदाज कर दिया कि किसी और का पुरस्कार स्वीकार करना नियमों और नैतिकता दोनों के खिलाफ है। नतीजतन, यह पूरा मामला राजनयिक गरिमा से ज़्यादा एक राजनीतिक तमाशा लगने लगा, जिसका मकसद ट्रंप की छवि को बड़ा दिखाना था।

इस बीच, माचाडो वॉशिंगटन पहुँचीं और ट्रंप तथा कांग्रेस के सदस्यों से मिलीं। माना जा रहा है कि वह ट्रंप का समर्थन दोबारा हासिल करना चाहती थीं, जो उन्होंने पहले मादुरो की गिरफ्तारी के बाद उनसे दूरी बना ली थी और डेल्सी रोड्रीगेज़ को अंतरिम राष्ट्रपति बने रहने दिया था। लेकिन व्हाइट हाउस ने अपने रुख पर कायम रहते हुए संकेत दिया कि ट्रंप की प्राथमिकताएं कहीं और हैं।

वहीं बता दें कि व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने कहा कि रोड्रीगेज़ को बनाए रखने का फैसला ज़मीनी हालात को देखकर लिया गया है, न कि माचाडो की अपील पर। उन्होंने साफ कहा कि इस मुलाकात से ट्रंप की सोच में कोई बदलाव नहीं आया, जिससे यह भी स्पष्ट हो गया कि माचाडो का प्रभाव काफी सीमित है।

एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि नोबेल मेडल सौंपने का यह नाटकीय कदम ट्रंप का समर्थन वापस पाने की एक साफ कोशिश थी, जिसमें बेचैनी और दिखावे का मेल नजर आया। वहीं फॉक्स न्यूज़ ने बताया कि माचाडो ने ज़ोर देकर ट्रंप को मेडल दिया और ट्रंप ने बिना किसी झिझक के उसे स्वीकार कर लिया, उन्होंने नियमों का कोई परवाह नहीं किया।

अपने दिए हुए पुरस्कार में माचेडो खुद फंस गई जब नोबेल शांति समिति ने तुरंत दखल दिया और दावे को खारिज कर दिया,  समिति ने दोहराया कि नोबेल शांति पुरस्कार अंतिम होता है, न साझा किया जा सकता है और न ही ट्रांसफर किया जा सकता है।

आखिर में, समिति ने एक्स (X) पर साफ शब्दों में कहा कि मेडल भले ही हाथ बदल ले, लेकिन नोबेल विजेता का दर्जा नहीं बदल सकता। यह एक तरह से ट्रंप को दिया गया अप्रत्यक्ष संदेश था, जिससे साफ हो गया कि यह पूरा मामला शांति प्रयासों से ज़्यादा अहंकार और दिखावे से जुड़ा था। इस बात की चर्चा देश विदेश और सोशल मीडिया पर खूब हो रही है, जिसमें ट्रंप की जमकर आलोचना भी हो रही है।

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