7 साल की कानूनी जंग और इंसाफ की जीत: शाह बानो केस पर बनी फिल्म ‘हक’

सात साल तक कानूनी लड़ाई के बाद शाह बानों को मिली कानून से छुट्टी, 5 बच्चों का पालन पोषण किया अकेेले।

जानिए शाह बानो केस, जिसने भारत में महिलाओं के अधिकारों की दिशा बदली

जानिए शाह बानो केस, जिसने भारत में महिलाओं के अधिकारों की दिशा बदली

इमरान हाशमी और यामी गौतम की फिल्म ‘हक़’ नेटफ्लीक्स पर  रिलीज होने वाली है। यह फिल्म शाह बानो केस पर आधारित है। इसी वजह से फिल्म रिलीज से पहले ही चर्चा में बनी हुई है। फिल्म का ट्रेलर आने के बाद शाह बानो केस एक बार फिर लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि शाह बानो केस क्या था।

क्या है शाह बानो केस?

शाह बानो केस भारतीय इतिहास का एक बहुत अहम मामला है। यह केस साल 1978 में शुरू हुआ था। उस समय शाह बानो की उम्र 62 साल थी। उन्होंने अपने तलाकशुदा पति से अपने भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। शाह बानो ने इंदौर की अदालत में अपने पति मोहम्मद अहमद खान के खिलाफ याचिका दायर की थी। मोहम्मद अहमद खान उस समय एक जाने-माने और बड़े वकील थे।

शादी, दूसरी शादी और तलाक

शाह बानो की शादी साल 1932 में मोहम्मद अहमद खान से हुई थी। दोनों के पांच बच्चे थे—तीन बेटे और दो बेटियां। शादी के लगभग 14 साल बाद, मोहम्मद अहमद खान ने दूसरी शादी कर ली। इस्लामिक कानून के तहत उन्हें इसकी इजाजत थी। इसके बाद दोनों पत्नियां साथ रहने लगीं। लेकिन साल 1978 में मोहम्मद अहमद खान ने शाह बानो को तलाक दे दिया और उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। उन्होंने सिर्फ इद्दत की अवधि यानी तीन महीने (90 दिन) तक पैसे देने का वादा किया।

अदालत में भरण-पोषण की मांग

तीन महीने बाद जब पैसे आना बंद हो गए, तो शाह बानो ने अपने और बच्चों के खर्च के लिए अदालत का सहारा लिया। उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग की।

धारा 125 के अनुसार, अगर कोई महिला तलाक या अलग होने के बाद अपना गुजारा नहीं कर सकती, तो वह अपने पति से भरण-पोषण मांग सकती है।

पति की दलील क्या थी?

मोहम्मद अहमद खान ने अदालत में कहा कि उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार इद्दत की अवधि तक भुगतान कर दिया है, इसलिए अब उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी उनकी बात का समर्थन किया और कहा कि अदालतों को मुस्लिम पर्सनल लॉ के मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। इसके बाद यह मामला लंबे समय तक अदालतों में चलता रहा।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

करीब 7 साल की कानूनी लड़ाई के बाद, साल 1985 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 73 साल की शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि: कोर्ट ने यह भी कहा कि यह कानून का नैतिक आदेश है और नैतिकता को धर्म से ऊपर रखा जाना चाहिए। यह फैसला भारतीय कानून और महिलाओं के अधिकारों के इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ।

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