हिंदी में एक मुहावरा है – जिसकी लाठी उसकी भैंस।
ये मुहावरा कम से कम मौजूदा वर्ल्ड ऑर्डर या फिर कूटनीति में बिल्कुल मुफीद साबित हो रहा है। था तो पहले भी, लेकिन ट्रम्प जिस तरह से दुनिया को-विशेषकर अपने ही मित्रों (यूरोप के देशों) को अपनी टैरिफ वाली लाठी से हांक रहे हैं, उसे देखते हुए लग रहा है कि ये मुहावरा खासकर अमेरिका और ट्रम्प के इसी कार्यकाल के लिए ही लिखा गया है।
लेकिन मज़े की बात ये है कि ट्रम्प की दंबगई और दादागीरी से त्रस्त ये पश्चिमी देश अब नियम आधारित दुनिया की दुहाई दे रहे हैं और भारत के सुर में सुर मिला रहे हैं।
हाल ही में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी कुछ यही किया है। उन्होने अपने बयान में भारत की उस स्थिति को मजबूती दी है, जिसे भारत लंबे समय से दोहराता आ रहा है। यह स्थिति संप्रभुता, कानून के शासन और जिम्मेदार अंतरराष्ट्रीय व्यवहार से जुड़ी है। शुरुआत में भारत और कनाडा के बीच जो मामला तनावपूर्ण लग रहा था, वह अब ऐसे मोड़ पर आ गया है जहाँ भारत के शांत और संतुलित रुख को परोक्ष रूप से सही माना जा रहा है। इस बदलाव ने नीति से जुड़े लोगों का ध्यान खींचा है, क्योंकि इससे यह साफ होता है कि अंततः तथ्य, कानून और संस्थागत प्रक्रियाएँ ही अंतरराष्ट्रीय सोच को दिशा देती हैं।
कनाडा के प्रधानमंत्री का यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें घरेलू राजनीति से प्रेरित तीखी भाषा के बजाय संयम दिखाई दिया। उन्होंने जांच, न्यायिक प्रक्रिया और संस्थानों के आपसी सहयोग पर ज़ोर दिया। ये वही बातें हैं जिन पर भारत शुरू से बल देता रहा है। यह कोई अचानक किया गया यू-टर्न नहीं था, बल्कि एक संतुलित बदलाव था, जिसने दुनिया को यह संदेश दिया कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में जिम्मेदारी और संयम ज़रूरी है।
पिछले कई महीनों से भारत यह कहता आ रहा है कि गंभीर आरोपों को राजनीतिक बयानों के बजाय सबूतों और कानूनी प्रक्रिया के ज़रिये सुलझाया जाना चाहिए। भारत का रुख सख़्त होने के साथ-साथ संतुलित भी रहा। भारत ने बार-बार कहा कि लोकतांत्रिक देशों को कानून और आपसी सम्मान के दायरे में रहकर काम करना चाहिए। जब कनाडा के प्रधानमंत्री ने भी उचित प्रक्रिया और संस्थागत जांच की बात कही, तो इससे भारत की बात को ही बल मिला।
भारत के नजरिए से देखें तो यह पूरा घटनाक्रम “रणनीतिक धैर्य” की ताकत दिखाता है। भारत ने किसी तरह की तीखी प्रतिक्रिया देने के बजाय संवाद, तथ्यों और स्थापित तरीकों पर भरोसा बनाए रखा। समय के साथ इससे कनाडा में भी यह समझ बनी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता भावनात्मक आरोपों से नहीं, बल्कि कानून के पालन से आती है। यह उदाहरण दिखाता है कि सिद्धांतों पर आधारित कूटनीति लंबे समय तक असर डालती है।
इसका असर सिर्फ भारत–कनाडा रिश्तों तक सीमित नहीं है। लोकतांत्रिक देशों के बीच रिश्ते अक्सर घरेलू राजनीति, प्रवासी समुदायों और मीडिया की वजह से प्रभावित होते हैं। ऐसे में कनाडा के प्रधानमंत्री द्वारा संस्थागत प्रक्रिया पर ज़ोर देना उन लोकतांत्रिक मूल्यों को दोहराता है, जिनकी बात भारत लगातार करता रहा है। इससे यह संदेश भी गया कि जिम्मेदार नेतृत्व का मतलब है सबूतों और जवाबदेही के साथ बोलना।
इस घटनाक्रम के बाद भारत और कनाडा के रिश्तों के भविष्य को लेकर नई चर्चाएँ शुरू हुई हैं। भले ही मतभेद अभी पूरी तरह खत्म न हुए हों, लेकिन कानूनी प्रक्रिया को स्वीकार करना विश्वास बहाली की दिशा में एक कदम है। व्यापार, शिक्षा, तकनीक और लोगों के बीच संपर्क दोनों देशों के रिश्तों की मजबूत नींव रहे हैं, और व्यावहारिक सहयोग से संबंध फिर से बेहतर हो सकते हैं।
गहराई से देखें तो यह मामला बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति आखिरकार बुनियादी सिद्धांतों पर ही लौट आती है। भारत का संप्रभुता और कानून पर ज़ोर सिर्फ अपनी रक्षा के लिए नहीं था, बल्कि वैश्विक नियमों पर आधारित था। जब कनाडा के प्रधानमंत्री ने भी इन्हीं मूल्यों की बात की, तो यह साफ हुआ कि मतभेदों के बावजूद लोकतांत्रिक देश न्याय और संस्थागत ईमानदारी पर ही भरोसा करते हैं। इससे वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति और मजबूत हुई।
