महाराष्ट्र के नगर निगम चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, 27 में से 23 नगर निगमों पर बीजेपी और उसके सहयोगियों का नियंत्रण यह दिखाता है कि शहरी महाराष्ट्र की राजनीति में एक गहरा बदलाव हुआ है। जो शहरी मतदाता पहले बिखरा हुआ और अनिश्चित माना जाता था, वह पिछले एक दशक में धीरे-धीरे एक स्पष्ट वैचारिक झुकाव की ओर बढ़ा है—जो हिंदुत्व के साथ-साथ शासन और विकास से जुड़ा हुआ है।
इस बदलाव से मंबई में एक अलग झलक देखने को मिल रहा है। लगभग तीन दशकों तक मुंबई ठाकरे परिवार का मजबूत गढ़ रही। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) पर नियंत्रण सिर्फ प्रशासनिक नहीं था, बल्कि यह सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत का स्रोत था। बीएमसी का विशाल बजट ‘मातोश्री’ को एक समानांतर सत्ता केंद्र बनाता था, जो न केवल शहर बल्कि पूरे महाराष्ट्र की राजनीति को प्रभावित करता था।
अब वह दौर खत्म हो चुका है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच हुआ चुनावी समझौता, जिसे मराठी अस्मिता के एकजुट रूप में पेश किया गया था, मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पाया। यह हार मामूली नहीं, बल्कि साफ और निर्णायक थी। मुंबई के मतदाताओं ने भाजपा–शिवसेना (शिंदे गुट) गठबंधन को चुना। इससे यह संदेश गया कि केवल राजनीतिक विरासत, बिना स्पष्ट विचारधारा और भरोसेमंद शासन के, अब जनता की वफादारी नहीं पा सकती।
इस राजनीतिक बदलाव के केंद्र में बालासाहेब ठाकरे की उस राजनीति का टूटना है, जो कभी बहुत शक्तिशाली मानी जाती थी। बालासाहेब ने मराठी मानुस और हिंदुत्व के बीच एक मजबूत गठबंधन बनाया था। यही गठबंधन दशकों तक मुंबई की राजनीति पर हावी रहा और शिवसेना को नगर निगम से आगे बढ़ाकर पूरे महाराष्ट्र की राजनीतिक पहचान बना गया।
शिवसेना के विभाजन ने इस समीकरण को बदल दिया। मराठी पहचान से जुड़ा वोट, जिसे लंबे समय तक ठाकरे नाम से जुड़ा माना जाता था, बड़ी संख्या में एकनाथ शिंदे के साथ चला गया। शिंदे ने खुद को पुरानी शिवसेना की भावना और संगठन का उत्तराधिकारी बताया। वहीं हिंदुत्व और भगवा राजनीति की जगह भाजपा ने पूरी तरह भर दी। इस वजह से ठाकरे भाइयों के लिए कोई वैचारिक खाली जगह नहीं बची। यह गठबंधन सिर्फ बालासाहेब की विरासत को चुनौती नहीं देता, बल्कि आज की राजनीति में उसकी जगह ले चुका है।
उद्धव ठाकरे की राजनीतिक गिरावट केवल पार्टी टूटने की वजह से नहीं हुई। सत्ता में ढाई साल रहने के बाद भाजपा से अलग होकर कांग्रेस और एनसीपी के साथ जाना लोगों को मजबूरी और अवसरवाद जैसा लगा, न कि सिद्धांतों पर लिया गया फैसला। इससे शिवसेना की वैचारिक पहचान कमजोर हुई। बालासाहेब की हिंदुत्व राजनीति से हटकर समझौते और तुष्टिकरण की राजनीति अपनाने से पार्टी का पारंपरिक वोटर, खासकर मुंबई का मध्यम वर्ग और मराठी इलाकों के लोग, दूर हो गए। नगर निगम चुनाव के नतीजे बताते हैं कि मतदाताओं ने इसे व्यावहारिक राजनीति नहीं, बल्कि दिशा भटकना माना।
राज ठाकरे ने अलग रास्ता अपनाया, लेकिन नतीजा वही रहा। उन्होंने आक्रामक मराठी अस्मिता की राजनीति को फिर से खड़ा करने की कोशिश की, जिसमें गैर-मराठी खासकर उत्तर भारतीयों के खिलाफ बयानबाजी शामिल थी। लेकिन तेजी से आगे बढ़ती और अवसर चाहने वाली मुंबई में यह राजनीति नहीं चली। यहां के मतदाता ऐसी पहचान की राजनीति से थक चुके हैं, जो न तो बेहतर शासन देती है और न ही आर्थिक अवसर।
मुंबई से आगे: पूरे राज्य का रुझान
मुंबई जैसे रुझान राज्य के अन्य शहरों में भी दिखे। पुणे में शरद पवार और अजित पवार के बीच हुआ राजनीतिक तालमेल भी भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोक नहीं सका। अनुभव और प्रभाव के बावजूद एनसीपी के दोनों गुट एक ठोस विकल्प पेश नहीं कर पाए। भाजपा इसलिए मजबूत हुई क्योंकि उसने साफ राजनीतिक संदेश दिया, जबकि विपक्षी गठबंधन आपसी सौदेबाजी और भ्रम में उलझे नजर आए।
भाजपा की इस सफलता के पीछे देवेंद्र फडणवीस का नेतृत्व भी रहा, जिन्होंने हिंदुत्व को विकास से जोड़कर पेश किया। राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी का नेतृत्व, संघ का वैचारिक समर्थन और योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं की सख्त राजनीतिक भाषा ने शहरी महाराष्ट्र में भाजपा–शिवसेना (शिंदे गुट) के वोट आधार को मजबूत किया।
अल्पसंख्यक वोटों का बंटवारा और कांग्रेस की चुनौती
एक और अहम बात मुस्लिम बहुल इलाकों में AIMIM का प्रदर्शन रहा। असदुद्दीन ओवैसी का उभरना कांग्रेस के लिए लंबी अवधि की चुनौती बनता जा रहा है। AIMIM का फैलाव विपक्षी वोटों को और बांट सकता है, जिसे कांग्रेस नजरअंदाज नहीं कर सकती।
हालांकि, मुंबई का यह फैसला भाजपा के लिए जिम्मेदारी भी लेकर आया है। शहर की पुरानी समस्याएं—भ्रष्टाचार, बुनियादी ढांचे में देरी और कमजोर प्रशासन—अब भी बनी हुई हैं, जबकि बीएमसी के पास भारी संसाधन हैं। दशकों पुराना राजनीतिक एकाधिकार तोड़ने के बाद अब भाजपा की असली परीक्षा शुरू होती है। भारत की आर्थिक राजधानी में भ्रष्टाचार खत्म करना और प्रशासनिक भरोसा बहाल करना ही उसके शहरी शासन मॉडल की असली कसौटी होगी।
