डिजिटल तानाशाही का मॉडल: चीन और खामोश होती दुनिया

बीजिंग केवल सड़कें और पुल नहीं बना रहा; वह निरंकुश शासनों का एक वैश्विक गठबंधन खड़ा कर रहा है, जो सत्ता में बने रहने के लिए उसकी तकनीक पर निर्भर हैं।

तानाशाही मॉडल अब केवल चीन की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा है

तानाशाही मॉडल अब केवल चीन की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा है

किसी मनुष्य का आग में जल जाना ऐसा दृश्य है जिसकी आँच इतनी भयावह और तीव्र होती है कि वह सरकार की सबसे सख्त सेंसरशिप की दीवारों को भी भेद देती है। हाल के दिनों में, कुछ अपुष्ट जानकारियां और तेजी से मिटाए गए डिजिटल निशान चीन की सेंसर्ड सीमाओं के पार फैलते देखे गए हैं, जिनमें दावा किया गया है कि तियानआनमेन स्क्वायर—चीनी राज्य के प्रतीकात्मक हृदय—में किसी व्यक्ति ने आत्मदाह का प्रयास किया। चाहे इन रिपोर्टों की कभी निर्णायक पुष्टि हो पाए या नहीं, उनकी संभाव्यता स्वयं उस राजनीतिक वास्तविकता के बारे में बहुत कुछ कह देती है जिसे वे उजागर करती हैं। 
यह छवि—चाहे वास्तविक हो या दबा दी गई हो—पश्चिम में लंबे समय से पनप रही उस भ्रांति को जलाकर राख कर देने के लिए पर्याप्त है कि आर्थिक साझेदारी अंततः पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को राजनीतिक बहुलता की ओर ले जाएगी। सर्वव्यापी निगरानी राज्य की निगाहों के नीचे घटित यह आत्मदाह किसी आसन्न क्रांति का संकेत नहीं, बल्कि आशा के पूर्ण

दम घुटने की एक भयावह गवाही है।
23 जनवरी 2001 को इसी चौक में फालुन गोंग के पाँच कार्यकर्ताओं ने स्वयं को आग के हवाले कर दिया था। उस त्रासदी में वांग जिंदोंग और बारह वर्षीय बच्ची लियू सियिंग आग में झुलस गए थे। पार्टी तंत्र ने इस घटना का इस्तेमाल एक क्रूर दमन अभियान को सही ठहराने के लिए किया। दो दशक बाद, शासन को अब किसी कथा को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की आवश्यकता भी नहीं रही, क्योंकि उसने एक ऐसी वास्तविकता गढ़ ली है जहाँ कथा पहले से ही तय होती है।

नियंत्रण की यह व्यवस्था अब अधकचरे प्रचार से आगे बढ़कर एक परिष्कृत डिजिटल तानाशाही में बदल चुकी है। हालिया घटना का त्वरित दमन एक ऐसे घरेलू वातावरण को उजागर करता है जहाँ असहमति को एल्गोरिदम के ज़रिए असंभव बना दिया गया है। वीचैट जैसे प्लेटफॉर्मों पर जन संवाद का भ्रम बनाए रखा जाता है, जो सहभागिता का केवल एक नक़ली रूप प्रस्तुत करते हैं। जनता, अदृश्य लक्ष्मण रेखाओं से भली-भांति परिचित है। विचार लिखे जाने से पहले ही साफ कर दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप ऐसी आवाज़ें ही रह जाती हैं, जहाँ एकमात्र स्वीकार्य स्वर सत्ता के केंद्र के प्रति अडिग निष्ठा का होता है। यह सहमति का मौन नहीं, बल्कि जीवित रहने की खामोशी है। डिजिटल सार्वजनिक चौक को एक ऐसे दर्पण में बदल दिया गया है जो वही प्रतिबिंब लौटाता है जिसे सरकार देखना चाहती है, जबकि ये दर्पण समाज की उन गहरी दरारों को छिपा देता है जहाँ बचा हुआ एकमात्र ईमानदार राजनीतिक वक्तव्य, स्वयं का ही विनाश है।

यह उच्च-प्रौद्योगिकी तानाशाही मॉडल अब केवल चीन की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा है। यह बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत अवसंरचना ऋणों और व्यापार समझौतों के साथ एकाकार होकर एक प्रमुख निर्यात उत्पाद बन चुका है। डेढ़ सौ से अधिक देशों में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की संरचना की नकल की जा रही है। मध्य एशिया के स्पाई नेटवर्क से लेकर पूर्वी अफ्रीका के इंटरनेट फायरवॉल तक, दमन के औज़ार सॉफ्टवेयर अपडेट जैसी दक्षता से स्थापित किए जा रहे हैं। बीजिंग केवल सड़कें और पुल नहीं बना रहा; वह निरंकुश शासनों का एक वैश्विक गठबंधन खड़ा कर रहा है, जो सत्ता में बने रहने के लिए उसकी तकनीक पर निर्भर हैं। इसलिए तियानआनमेन की घटना कोई स्थानीय त्रासदी नहीं, बल्कि एक संभावित वैश्विक मानक की झलक है—जहाँ व्यक्ति के अधिकारों को योजनाबद्ध तरीके से शासन की सुरक्षा के अधीन कर दिया जाता है।

स्वतंत्रता का दमन शायद सबसे अधिक ठोस रूप में हांगकांग में दिखाई देता है, जो कभी ब्रिटिश उपनिवेश था। “वन कंट्री, टू सिस्टम्स” का वादा, जिसे 2047 तक शहर की विशिष्ट स्वतंत्रताओं की रक्षा करनी थी, अब समय से पहले ही ध्वस्त कर दिया गया है। अनुच्छेद 23 के सुरक्षा कानून के लागू होने से एकीकरण की समय-सीमा तेज कर दी गई है, जिससे उदार परिधि और सत्तावादी केंद्र के बीच का अंतर मिट गया है। जिस जीवंत नागरिक समाज ने कभी इस बंदरगाह नगर को परिभाषित किया था, वह अब खामोश कर दिया गया है—उसके नेता जेलों में बंद हैं या निर्वासन में। हांगकांग का त्वरित पतन इस बात का निर्णायक संकेत है कि कम्युनिस्ट पार्टी अंतरराष्ट्रीय संधियों को बाध्यकारी दायित्व नहीं, बल्कि अस्थायी रणनीतिक असुविधाएँ मानती है। शहर की कानूनी घुटन यह सिद्ध करती है कि शासन की नियंत्रण-लालसा निरपेक्ष है और किसी भौगोलिक या ऐतिहासिक अपवाद को नहीं मानती।

जलते प्रदर्शनकारियों की भयावह तस्वीरों और जनता की उदास चुप्पी के बावजूद, निकट भविष्य का अनुमान निराशाजनक स्थिरता का ही है। पश्चिमी पर्यवेक्षक अक्सर उस ब्रेकिंग प्वाइंट की तलाश करते रहते हैं, जब नागरिक अशांति व्यवस्था परिवर्तन में बदल जाए। लेकिन 2030 तक ऐसा होने की संभावना कम ही है। चीनी स्टेट ने शिकायतों को बिखेरने की कला में महारत हासिल कर ली है। यह सुनिश्चित करके कि कोई दो असंतुष्ट नागरिक प्रभावी ढंग से संगठित न हो सकें, पार्टी गुस्से को किसी आंदोलन में बदलने से रोक देती है। अर्थव्यवस्था डगमगा सकती है और युवा बेरोज़गारी राष्ट्रीय मनोदशा को विषाक्त कर सकती है, लेकिन दमन तंत्र वफादार और प्रभावी बना हुआ है। मानव प्रवर्तक की कमजोरियों को मशीन की निर्विकार विश्वसनीयता से बदलकर शासन ने स्वयं को उन जन विद्रोहों से सुरक्षित कर लिया है जिन्होंने अतीत में तानाशाहियों को गिराया था।

इस एकाश्म स्थिरता के सामने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को नए प्रेशर प्वाइंट्स खोजने होंगे। कम्युनिस्ट पार्टी की वैधता घरेलू प्रतिष्ठा के साथ-साथ वैश्विक स्वीकार्यता के प्रदर्शन पर भी निर्भर करती है। बड़े खेल आयोजन और अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन इस प्रदर्शन के लिए एक महत्वपूर्ण मंच होते हैं, जहाँ शासन सद्भाव और शक्ति की अपनी नकली कथा प्रस्तुत करता है। स्वतंत्र विश्व के पास उपलब्ध सबसे प्रभावी प्रतिक्रिया यही है कि वह बीजिंग को इस प्रतिष्ठा की ऑक्सीजन से वंचित कर दे। भविष्य में होने वाले बीजिंग ओलंपिक जैसे आयोजनों और इसी प्रकार की वैश्विक सभाओं का व्यापक बहिष्कार एक आवश्यक नैतिक आधार रेखा है।

ऐसे राज्य के तमाशे में भाग लेना, जो शांतिपूर्ण अपीलों का जवाब फोम कैनन और कैद से देता है, सह-अपराधिता का कार्य है। यह शासन के इस विश्वास को पुष्ट करता है कि उसके आंतरिक अत्याचारों की कोई बाहरी कीमत नहीं है। एथलीटों, गणमान्य व्यक्तियों और कॉर्पोरेट प्रायोजकों को इन आयोजनों से दूर रखकर लोकतांत्रिक दुनिया उस विजयोल्लास के बुलबुले को फोड़ सकती है जिसे शी जिनपिंग गढ़ना चाहते हैं। चौक में जली आग देखे जाने की एक हताश कोशिश थी। दुनिया उस बलिदान का सम्मान व्यापार को सामान्य बनाए रखकर नहीं, बल्कि उस राज्य की दिखावटी भव्यता से मुँह मोड़कर करती है जिसने तीली जलाई। जब तक ठोस और सत्यापन योग्य सुधार नहीं होते, वीआईपी बॉक्स की सीटें खाली रहनी चाहिए, ताकि शासन अपनी शक्ति की रस्में दर्शकों से खाली मैदान में निभाता रहे।

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