90 वर्ष बाद फिर अखंड हुआ ‘वंदे मातरम्’- मोदी सरकार ने सरकारी समारोहों में वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन को किया अनिवार्य, मिलेगा राष्ट्रगान जैसा सम्मान

गृह मंत्रालय की ओर से जारी आदेश के अनुसार राष्ट्रगीत के रूप में ‘वंदे मातरम’ का छह छंदों वाला 3 मिनट 10 सेकंड का संस्करण राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले बजाया जाएगा, ताकि राष्ट्रीय सम्मान और भावना का स्पष्ट संदेश दिया जा सके।

90 वर्ष बाद फिर अखंड हुआ ‘वंदे मातरम्

90 वर्ष बाद फिर अखंड हुआ ‘वंदे मातरम्

केंद्र सरकार नेवंदे मातरमको लेकर नए दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनके तहत अब किसी भी सरकारी कार्यक्रम, सरकारी स्कूलों के आयोजनों और अन्य औपचारिक सरकारी अवसरों पर जबवंदे मातरमबजाया जाएगा, तो उसके सम्मान में उपस्थित सभी लोगों का खड़ा होना अनिवार्य होगाजैसा कि राष्ट्रगानजन गण मनके सम्मान में किया जाता है।
गृह मंत्रालय की ओर से जारी आदेश के अनुसार राष्ट्रगीत के रूप मेंवंदे मातरमका छह छंदों वाला 3 मिनट 10 सेकंड का संस्करण राष्ट्रगानजन गण मनसे पहले बजाया जाएगा, ताकि राष्ट्रीय सम्मान और भावना का स्पष्ट संदेश दिया जा सके। हालांकि सिनेमा हॉल को इन निर्देशों से बाहर रखा गया है और वहां फिल्म शुरू होने से पहलेवंदे मातरमबजाना या खड़ा होना अनिवार्य नहीं होगा।

वंदे मातरम्को मिलेगाराष्ट्रगानजैसा सम्मान

नए प्रावधानों के अनुसार तिरंगा फहराने के अवसर, राष्ट्रपति के आगमन, उनके राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और बाद, राज्यपालों के आगमन और भाषणों से पहले और बाद में, नागरिक सम्मान समारोहोंजैसे पद्म पुरस्कार (जिनमें राष्ट्रपति उपस्थित हों) इन सभी मौकों परवंदे मातरमबजाया जाएगा। सरकार का कहना है कि इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर स्पष्ट और एकरूप व्यवस्था स्थापित करना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा मेंवंदे मातरमके 150 वर्ष पूरे होने पर भाषण देते हुए बताया था कि यह गीत अंग्रेजों को दिया गया करारा जवाब था और आज भी प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा था किगांधीजी को यह गीत प्रिय था और वे इसे राष्ट्रीय गान के रूप में देखते थे।  प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में सवाल उठाया कि पिछले दशकों में इस गीत के साथअन्यायक्यों हुआ औरकिस ताकत ने बापू की भावनाओं से ऊपर खुद को रखा।

वंदे मातरम् और कथितसेक्युलर्सका रूदन

वंदे मातरमको लेकर विवाद भी समयसमय पर उभरता रहा है। पिछले वर्ष कुछ मुस्लिम संगठनों ने इसके पाठ का विरोध किया था। संसद के शीतकालीन सत्र में भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि तुष्टिकरण की राजनीति के तहत मूल छह अंतरों वाले गीत को घटाकर एक अंतरे तक सीमित किया गया। फिलहाल राष्ट्रीय गीत के रूप में इसके छह में से केवल पहले दो अंतरे ही आधिकारिक तौर पर गाए जाते हैं। शेष अंतरों में मां दुर्गा सहित कुछ हिंदू देवियों का उल्लेख है, जिसे लेकर आपत्तियां जताई जाती रही हैं।

भाजपा ने 1937 में तत्कालीन नेता जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखे गए पत्रों का हवाला भी दिया था, जिनमें उन्होंने संकेत दिया था कि गीत की कुछ पंक्तियां मुसलमानों को असहज कर सकती हैं। इस बहस के दौरान भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने यह भी कहा था कि राष्ट्रीय गीत कोराष्ट्रीय गानऔरराष्ट्रीय ध्वजके समान दर्जा और सम्मान मिलना चाहिए।  वहीं कांग्रेस ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया किवंदे मातरमपर जोर पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर दिया जा रहा है और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है।

ऐसे मेंवंदे मातरमअब केवल सांस्कृतिक या ऐतिहासिक प्रतीक भर नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी केंद्र बन गया है। केंद्र सरकार के नए निर्देश जहां इसे औपचारिक रूप से अधिक प्रमुख स्थान देते हैं, वहीं बंगाल चुनाव की पृष्ठभूमि में इसके राजनीतिक मायने भी और गहरे हो गए हैं। वर्तमान स्थिति यह है किवंदे मातरमको राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है, पर व्यवहार में इसके केवल दो अंतरे ही प्रचलित हैं। अब सरकार के ताजा फैसले के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर इसका प्रभाव क्या पड़ता है और चुनावी राजनीति में यह मुद्दा किस तरह सामने आता है, विशेषकर तब जबकि पश्चिम बंगाल में कुछ सप्ताह के अंदर ही विधान सभा के चुनाव होने हैं

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