भारत की तरफ़ से बीते कुछ समय में लगातार कई अहम मिसाइल परीक्षण किए गए हैं। हाल ही में जहां DRDO की Solid Fuel Ducted Ramjet (SFDR) तकनीक के सफल परीक्षण की जानकारी सामने आई थी, वहीं बीते शुक्रवार को भी भारत ने एक और बेहद महत्वपूर्ण परीक्षण किया है। यह परीक्षण IRBM यानी इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-3 का है, जिसे हाल ही में ओडिशा के चांदीपुर रेंज से सफलतापूर्वक टेस्ट किया गया। इस परीक्षण के लिए पहले 6–7 फरवरी के दौरान NOTAM (Notice to Airmen) जारी किया गया था। शुरुआती नोटिफिकेशन में परीक्षण की अधिकतम रेंज करीब 2500 किलोमीटर बताई गई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर लगभग 3200 किलोमीटर कर दिया गया।
अग्नि -3 मिसाइल के परीक्षण का क्या मतलब है?
ध्यान देने वाली बात यह है कि यह परीक्षण Strategic Forces Command (SFC) के तहत किया गया। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि यह कोई डेवलपमेंटल टेस्ट नहीं था, बल्कि एक पूरी तरह ऑपरेशनल मिसाइल का परीक्षण था, जो पहले से ही भारतीय सैन्य बलों के जखीरे में शामिल की जा चुकी है और इस मिसाइल को सीधे आयुध भंडार से निकालकर टेस्ट किया गया।
यहीं एक अहम सवाल उठता है कि जब अग्नि-3 पहले से ही ऑपरेशनल है और 2011 से सेवा में मौजूद है, तो फिर बार-बार इसके परीक्षण क्यों किए जा रहे हैं? इसका उत्तर हालिया तकनीकी अपग्रेड्स में छिपा है। दरअसल, अग्नि सीरीज़ के नए संस्करणों में गाइडेंस और नेविगेशन सिस्टम से जुड़े कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं। इनमें Ring Laser Gyro (RLG) आधारित Inertial Navigation System और High Specific Impulse वाले प्रोपेलेंट्स शामिल हैं। इस परीक्षण के दौरान इन सभी सुधारों को प्रमाणित किया गया। इसके अलावा, यह भी संभावना है कि सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम से जुड़े अपडेट्स को भी टेस्ट किया गया हो, जिससे मिसाइल का प्रदर्शन और उसकी एक्यूरेसी और बेहतर हो सके।
मिसाइल की दक्षता, उसकी क्षमता की जांच
यही नहीं जब कोई मिसाइल सिस्टम लंबे समय तक स्टोरेज में रहता है, तो यह जांचना बेहद जरूरी हो जाता है कि उसके भीतर मौजूद मोटर और प्रोपेलेंट किस स्थिति में हैं। क्या उनका बर्न रेट पहले जैसा बना हुआ है या उसमें कोई बदलाव आया है, संभव है कि इस परीक्षण में इस तरह के पहलुओं की भी जांच की गई होगी।
इसके साथ ही, Re-entry Vehicle का बिहेवियर, स्ट्रक्चरल परफॉर्मेंस, स्टेज सेपरेशन टाइमिंग और Thermal Protection System जैसे अहम पैरामीटर्स को भी परखा गया। यह सुनिश्चित किया गया कि जब मिसाइल दोबारा वायुमंडल में प्रवेश करे, तो हीट प्रोटेक्शन समेत सभी सिस्टम्स अपेक्षित रूप से काम करें।
कुल मिलाकर, यह परीक्षण एक Reliability Check था, जो सामान्य प्रक्रिया का ही हिस्सा है। इस तरह के टेस्ट नियमित रूप से किए जाते हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इंडक्ट की गई मिसाइल किसी भी समय ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट के लिए पूरी तरह तैयार और भरोसेमंद रहे।
‘अग्नि- 3’ क्यों अहम है और ये ‘अग्नि’ सीरीज़ की बाक़ी मिसाइलों क्यों अलग है ?
अब सवाल यह उठता है कि अग्नि-3 पर इतना ज़ोर क्यों दिया जा रहा है और इसकी रणनीतिक अहमियत क्या है।
तकनीकी तौर पर देखें तो अग्नि-1 और अग्नि-2 को ‘टैक्टिकल’ या ‘रीजनल’ मिसाइल माना जाता है। इनका उपयोग अपेक्षाकृत कम रेंज और सीमित टारगेट सेट के लिए किया जाता है और इन्हें मुख्य रूप से पाकिस्तान को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। इसके विपरीत, अग्नि-3 एक पूरी तरह ‘स्ट्रैटेजिक’ मिसाइल है, जो विशेष रूप से Second Strike Capability के लिए डिजाइन की गई है। यानी यदि भारत पर पहले हमला होता है, तो भी यह मिसाइल दुश्मन के महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर और हाई-वैल्यू टारगेट्स पर प्रभावी जवाबी हमला करने की क्षमता प्रदान करती है।
इसे खासतौर पर चीन को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है। यह ‘न्यूक्लियर वॉरहेड’ ले जाने में सक्षम है और इसकी अधिकतम रेंज लगभग 3500 किलोमीटर बताई जाती है, जिससे यह बीजिंग, शंघाई समेत चीन के लगभग पूरे मेनलैंड को कवर करती है।
हालांकि भारत के पास अग्नि-5 जैसी अधिक रेंज और क्षमता वाली स्ट्रैटेजिक’ मिसाइल भी मौजूद है लेकिन ये न सिर्फ आकार में बड़ी और महंगी है, बल्कि इसके इसके इस्तेमाल के रणनीतिक जोखिम भी कहीं ज्यादा हैं। इसके मुकाबले अग्नि-3 न केवल अपेक्षाकृत सस्ती है, बल्कि भारी वॉरहेड ले जाने की क्षमता भी रखती है। वहीं अगर इसकी तुलना अग्नि प्राइम से की जाए, तो दोनों का रोल स्पष्ट रूप से अलग है। अग्नि प्राइम एक तरह की टैक्टिकल मिसाइल सिस्टम है, जिसे तेजी से तैनाती और सेलेक्टिव रिस्पॉन्स के लिए तैयार किया गया है। यानी ऐसी परिस्थितियों में जहां एस्केलेशन सीमित रखते हुए जवाबी कार्रवाई जरूरी हो – ये मिसाइल कारगर साबित हो सकती है।
पलटवार के लिए हमेशा Ready To Fire है अग्नि-3
कुल मिलाकर अग्नि-3 एक तैयार और मैच्योर मिसाइल सिस्टम है। इसे बार-बार टेस्ट किया जा चुका है और इसके पास कई वर्षों का ऑपरेशनल डेटा मौजूद है। हालिया परीक्षण भी इस बात की पुष्टि करता है कि यह सिस्टम पूरी तरह तैयार और भरोसेमंद है। कैनिस्टर-बेस्ड और मोबाइल प्लेटफॉर्म पर तैनात अग्नि-3 को रेडी-टू-फायर मोड में रखा जाता है। इसे सड़क या रेल आधारित लॉन्चर से बेहद कम समय में लॉन्च किया जा सकता है, जिससे इसकी ‘सर्वाइवेबिलिटी’ और ‘रिस्पॉन्स ‘टाइम दोनों बेहतर होते हैं। अपनी कैटेगरी में अग्नि-3 सबसे सटीक बैलिस्टिक मिसाइलों में गिनी जाती है। इसका CEP (Circular Error Probable) करीब 40 मीटर बताया जाता है, जो इसे अत्यधिक सटीक बनाता है।
ये मिसाइल भारत की “No First Use” न्यूक्लियर पॉलिसी का एक अहम स्तंभ है, जो किसी भी गंभीर खतरे की स्थिति में प्रभावी जवाबी कार्रवाई की क्षमता प्रदान करता है। इसीलिए इसका ये परीक्षण भारत की Credible Minimum Deterrence बनाए रखने की क्षमता को तो दर्शाता ही है, इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों के क्षेत्र में भारत की तकनीकी परिपक्वता को भी प्रदर्शित करता है।




























