Four Stars of destiny….पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की ये आत्मकथा (अभी बाज़ार में नहीं आई है) इन दिनों सियासी तूफान की वजह बनी हुई है। विपक्ष इस अप्रकाशित किताब के कुछ हिस्सों को ‘कोट’ करते हुए संसद में मोदी सरकार को घेर रहा है और पीएम मोदी पर चीन के मामले में कमजोर रुख़ अपनाने का आरोप लगा रहा है।
कथित रूप से इस किताब में तत्कालीन सेना प्रमुख रहे नरवणे ने चीनी एडवांसमेंट के समय अपनी स्थिति और सरकार के रुख़ को लेकर बात की है। लेकिन नेता विपक्ष राहुल गांधी जिस बात को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को घेर रहे हैं, वो है– कैलाश रेंज की पहाड़ियों में भारतीय चौकियों की तरफ़ बढ़ रही चीनी सेना को रोकने के लिए सेना को दिए गए उनके निर्देश।
जनरल नरवणे की किस बात पर है विवाद ?
राहुल गांधी के मुताबिक़ नरवणे ने इसमें लिखा था कि “जब PLA (पीपल्स लिबरेशन आर्मी) के सैनिक टैंकों के साथ रेचिन ला की तरफ़ बढ़ रही थी तब उन्होने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस.जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को फ़ोन करके अपने लिए निर्देश मांगे थे”
क़रीब 2 घंटे बाद उन्हें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तरफ़ से प्रधानमंत्री मोदी का एक आदेश प्राप्त हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री ने कहा था, “जो उचित समझो वो करो”।
पीएम के इस निर्देश को लेकर ही विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी सरकार को घेर रहे हैं, उनका कहना है कि प्रधानमंत्री ने स्पष्ट निर्देश देने की जगह गेंद आर्मी चीफ के पाले में डाल दी थी।
(ये बात अलग है कि इसे प्रधानमंत्री द्वारा सेना को खुली छूट देने के रूप में भी देखा जा रहा है जिसे सैन्य लहजे में ऑपरेशनल फ़्रीडम कहते हैं )
वहीं सरकार का कहना है कि जो किताब अभी तक प्रकाशित ही नहीं हुई है, नियमों के मुताबिक़ उसे संसद में कोट नहीं किया जा सकता।
राहुल गांधी के पास कैसे पहुंची Un published Book?
हैरानी की बात ये है कि अगले ही दिन राहुल गांधी इस किताब की एक प्रति (हार्डकवर) लेकर संसद पहुँच गए, और लहराते हुए कहा कि वो इस किताब को पीएम मोदी को भेंट करने के लिए लाए हैं। इस मुद्दे पर इतना हंगामा हुआ कि प्रधानमंत्री को सदन में होने वाली अपनी स्पीच तक रद्द करनी पड़ी, जो उन्हें राष्ट्रपति के अभिभाषण पर आयोजित चर्चा के जवाब में देनी थी।
अब अगर बीते दो दिनों के घटनाक्रम को देखें तो तत्कालीन सैन्य परिस्थितियों के अलावा भी कुछ बेहद जरूरी प्रश्न सामने आते हैं।
पहला प्रश्न– क्या पेंग्विन बुक्स द्वारा ये किताब वाक़ई में प्रकाशित कर दी गई है ? की गई है तो ये उनकी वेबसाइट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स में उपलब्ध क्यों नहीं है?
हंगामे से पहले इस किताब का हार्डकवर ऐमेजॉन और फ्लिकॉर्ट जैसे ई–कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध था, लेकिन अब या तो उसे हटा लिया गया है, या बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है।
दूसरा प्रश्न– अगर ये पुस्तक आधिकारिक रूप से पेंग्विन द्वारा प्रकाशित नहीं की गई है, तो ये पुस्तक राहुल गांधी के हाथ में कैसे पहुंची ?
इन दोनों सवालों के तीन निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
पहला तो ये कि ये पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है, क्योंकि रक्षा मंत्री द्वारा सदन में आधिकारिक रूप से ये बताया गया है
दूसरा ये कि राहुल गांधी किताब की जिस प्रति को लेकर संसद पहुंचे थे वो पायरेटेड (फर्जी) कॉपी है, जो उन्होने किसी प्रकार हासिल कर ली है।
तीसरा- किताब पहले से प्रकाशित हो और बाजार में न उतारी गई हो (यही प्रति राहुल गांधी को मिल गई हो)
पेंग्विन से सवाल-जवाब क्यों होना चाहिए?
चर्चित और बेस्टसेलर किताबों की पायरेसी कोई नई बात नहीं है, भारत सरकार के तमाम क़ानून और नियामक संस्थाएं इन फर्जी प्रकाशकों के सामने मजबूर हैं और पायरेटेड प्रतियां धड़ल्ले से बेची जा रही हैं।
लेकिन यहां मामला दूसरा है– यहां पुस्तक अभी तक प्रकाशित ही नहीं हुई है, यानी इसके बाज़ार में होने का सवाल ही नहीं उठता, तब इसकी पायरेसी कैसे हो सकती है?
क्या ख़ुद पेंग्विन में ही कोई है जिसने इस कॉपी को लीक किया, या फिर ये किताब पहले ही छापी जा चुकी है, बस रक्षा मंत्रालय से अनुमोदन के इंतज़ार में गोदाम में ही पड़ी है। क्योंकि बीते वर्ष अप्रैल में एक इंटरव्यू में जनरल नवरणे ने बताया था कि वो अपनी तरफ़ से किताब लिखकर प्रकाशक को दे चुके हैं, लेकिन रक्षा मंत्रालय से इसको मंजूरी नहीं मिली है।
अगर ऐसा है, तो भी प्रकाशक पेंग्विन बुक्स को या लेखक जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को ये स्पष्ट करना चाहिए कि पुस्तक की स्थिति अभी क्या है? क्या उसे रक्षा मंत्रालय से जरूरी अनुमति प्राप्त हो चुकी है? अगर ऐसा है तो फिर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सदन में इसके अप्रकाशित होने का दावा क्यों किया ?
और अगर ये पुस्तक प्रकाशित ही नहीं हुई है और इसे अभी भी जरूरी अनुमति का इंतज़ार है तो इसकी प्रति राहुल गांधी के पास कहां से पहुंची?
फ़िलहाल नरवणे साहब ने पुस्तक में क्या लिखा और चीन के मामले में कौन सही था, कौन ग़लत ? इस चर्चा से इतर इस पुस्तक की वैधता के बारे में भी जानकारी जुटाई जानी चाहिए।
वैसे भी पाइरेसी भारतीय प्रकाशकों के लिए किसी आपदा से कम नहीं है और अगर ख़ुद नेता विपक्ष इसे बढ़ावा दे रहे हैं तो फिर उम्मीद किससे की जाए?
उम्मीद है कि रक्षा मंत्रालय भी इसका संज्ञान लेगा और पुस्तक के प्रकाशक पेंग्विन बुक्स से जवाब-तलब करेगा कि ये पुस्तक बाजार में कैसे आई?
