भारत पिछले कुछ वर्षों से रूसी कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) पर काफी निर्भर रहा है, क्योंकि रूस से तेल सस्ता और आसानी से उपलब्ध था। कई बार रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। लेकिन अब भू-राजनीति (जियोपॉलिटिक्स) और व्यापार समझौतों के कारण हालात बदल रहे हैं।
भारत और अमेरिका के बीच एक बड़े व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है। अमेरिका ने संकेत दिया है कि अगर भारत रूस से तेल खरीद कम करता है या बंद करता है, तो वह भारतीय निर्यात पर लगने वाले टैरिफ (शुल्क) घटा सकता है।
अमेरिका ने भारत पर लगाए गए वे दंडात्मक टैरिफ भी हटा दिए हैं, जो रूस से तेल खरीदने के कारण लगाए गए थे। अमेरिका का कहना है कि भारत रूस से सीधे या परोक्ष रूप से तेल खरीदना बंद करेगा, हालांकि भारत सरकार ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
इसी वजह से भारतीय तेल रिफाइनरियां अब रूस के अलावा दूसरे देशों से तेल लेने के विकल्प तलाश रही हैं। वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल (हेवी क्रूड) एक विकल्प है, क्योंकि भारत की कई बड़ी और आधुनिक रिफाइनरियां भारी तेल को प्रोसेस कर सकती हैं।
इसलिए वेनेजुएला से 20 लाख बैरल तेल की खरीद प्रतीकात्मक है। यह दिखाता है कि भारत किसी एक देश पर निर्भरता कम करना चाहता है और अपने तेल स्रोतों में विविधता ला रहा है।
रूसी तेल के लिए इसका क्या मतलब है?
रॉयटर्स के अनुसार, रूस से तेल खरीद का मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन इसमें बदलाव जरूर आया है। 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद लगभग दो साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। इसकी वजह पश्चिमी प्रतिबंध और अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ताएं हैं।
भारत ने आधिकारिक तौर पर रूस से तेल खरीद बंद नहीं की है। सरकार ने कोई ऐसा ऐलान नहीं किया है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत तेल की खरीद “व्यावसायिक लाभ” और ऊर्जा सुरक्षा के आधार पर करता रहेगा, न कि केवल राजनीति के आधार पर।
इसका मतलब है कि रूस से तेल आना पूरी तरह बंद नहीं होगा, लेकिन मात्रा कम रह सकती है। भारत किसी एक देश पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं रहना चाहता, खासकर ऐसे देश पर जो युद्ध और प्रतिबंधों में फंसा हो।
भारत अब चाहता है कि वह सऊदी अरब और मध्य-पूर्व, वेनेजुएला, अमेरिका और अन्य देशों से तेल ले, ताकि कीमत, रिफाइनरी की जरूरत और कूटनीतिक संतुलन बना रहे।
रूस की प्रतिक्रिया
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि वह भारत और दूसरे देशों को रूसी तेल खरीदने से रोकने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका दबाव की नीति अपनाकर दुनिया की ऊर्जा बाजारों पर नियंत्रण करना चाहता है।
टीवी ब्रिक्स को दिए इंटरव्यू में (जिसे स्पुतनिक ने रिपोर्ट किया), लावरोव ने कहा कि अमेरिका प्रतिबंधों, टैरिफ और दूसरे तरीकों से देशों को मजबूर कर रहा है कि वे रूस से सस्ता तेल न खरीदें और महंगा अमेरिकी तेल और गैस लें।
उन्होंने कहा कि खुले समुद्र में रूसी टैंकरों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, जो संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानूनों का उल्लंघन है।
भारत की स्वतंत्र विदेश नीति
भारत ने बार-बार कहा है कि उसकी विदेश नीति “रणनीतिक स्वतंत्रता” पर आधारित है। भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेता है, न कि किसी देश के दबाव में।
विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि ऊर्जा आयात से जुड़े फैसले भारतीय उपभोक्ताओं को सस्ता, भरोसेमंद और पर्याप्त तेल उपलब्ध कराने के लिए लिए जाते हैं।
भारत ने कहा है कि वह बहुध्रुवीय (मल्टीपोलर) दुनिया में अपने साझेदार खुद चुनेगा और किसी एक गुट के अनुसार नहीं चलेगा।
सोमवार को विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा कि भारत कई स्रोतों से ऊर्जा लेने की नीति पर कायम रहेगा, ताकि सही कीमत पर सुरक्षित और भरोसेमंद आपूर्ति मिल सके।
यह बयान उस सवाल के जवाब में था जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे का जिक्र किया गया था कि भारत ने रूसी तेल खरीद बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है।
मिसरी ने कहा कि भारत किसी एक देश पर निर्भर नहीं है और न ही होना चाहता है। भारत बाजार की स्थिति और राष्ट्रीय हितों के अनुसार तेल खरीदता है।
रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रंप ने हाल ही में भारत पर लगाया गया 25% आयात शुल्क हटा दिया है, जो रूस से तेल खरीदने के कारण लगाया गया था।
क्रेमलिन ने कहा कि भारत का ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने का बयान कोई नई बात नहीं है। रॉयटर्स ने यह भी बताया कि जनवरी में भारत का रूसी तेल आयात घटा, क्योंकि रिफाइनरियों ने दूसरे विकल्प चुने और अमेरिका-भारत व्यापार वार्ता जारी रही।
































