सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पूर्व विधायक और दोषी बलात्कारी कुलदीप सिंह सेंगर को राहत देने से साफ इनकार कर दिया।
यह मामला उन्नाव रेप पीड़िता के पिता की पुलिस हिरासत में हुई मौत से जुड़ा है। हालांकि कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट से कहा है कि वह सेंगर की सजा रोकने की अर्जी पर जल्दी सुनवाई करे और तीन महीने के भीतर फैसला सुनाए।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साफ कहा कि सेंगर पहले से ही नाबालिग से बलात्कार के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि जब कोई व्यक्ति पहले से उम्रकैद की सजा भुगत रहा हो, तो सजा रोकने की मांग अपने आप कमजोर हो जाती है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि हाईकोर्ट सेंगर की अर्जी के साथ-साथ पीड़िता की उस अपील पर भी सुनवाई करे, जिसमें पीड़िता ने मांग की है कि सजा को IPC की धारा 304 से बढ़ाकर धारा 302 (हत्या) किया जाए।
क्या है पूरा मामला
उन्नाव रेप केस जून 2017 का है। आरोप है कि नाबालिग लड़की को नौकरी का लालच देकर कुलदीप सिंह सेंगर के घर बुलाया गया और उसके साथ बलात्कार किया गया। 3 अप्रैल 2018 को जब पीड़िता का परिवार कोर्ट में पेशी के लिए जा रहा था, तब उसके पिता पर खुलेआम हमला हुआ। बाद में उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। 9 अप्रैल 2018 को उनकी मौत पुलिस हिरासत में हो गई। उनके शरीर पर कई चोटों के निशान पाए गए।
यह मामला पहले उन्नाव के माखी थाने में दर्ज हुआ था, लेकिन निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में केस दिल्ली ट्रांसफर कर दिया।
दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट ने सेंगर को पहले बलात्कार और फिर पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत की साजिश का दोषी ठहराया।
इस मामले में उसके भाई अतुल सिंह सेंगर समेत पांच अन्य लोग भी दोषी पाए गए।
सेंगर की दलील क्या थी
कुलदीप सिंह सेंगर 13 अप्रैल 2018 से जेल में बंद है। उसके वकीलों ने कहा कि वह 7 साल से ज्यादा सजा काट चुका है, गवाहों के बयानों में विरोधाभास हैं और जब उसे थोड़े समय के लिए राहत मिली थी, तब उसने इसका गलत इस्तेमाल नहीं किया।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब वह पहले से उम्रकैद की सजा काट रहा है, तो सजा रोकने की मांग कितनी सही है।
सरकार की ओर से कहा गया कि सेंगर की मुख्य अपील 11 फरवरी 2026 को सुनवाई के लिए तय है।
पीड़िता की आपत्ति
पीड़िता की ओर से वकील ने सेंगर को किसी भी तरह की राहत देने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि अगर सेंगर बाहर आया तो पीड़िता और उसके परिवार की जान को खतरा हो सकता है। यह भी बताया गया कि पीड़िता को अब भी सोशल मीडिया पर परेशान किया जा रहा है।पीड़िता ने सजा बढ़ाने की अपील भी की है, ताकि इस मामले को हत्या मानते हुए धारा 302 के तहत सजा दी जाए।
कोर्ट का साफ संदेश
दिल्ली हाईकोर्ट पहले भी दो बार सेंगर की अर्जी खारिज कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कर दिया कि कानून से बचने की कोशिश या देरी के बहाने पर कोई नरमी नहीं मिलेगी। अब सेंगर जेल में ही रहेगा और दिल्ली हाईकोर्ट तीन महीने में दोनों अपीलों पर फैसला देगा।
यह मामला दिखाता है कि कानून सबके लिए बराबर है — चाहे व्यक्ति कितना ही ताकतवर या प्रभावशाली क्यों न हो।
न्यायपालिका जघन्य अपराधों के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
