Supreme Court of India में 2023 डेटा कानून को लेकर सुनवाई, RTI कमजोर करने का आरोप

सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बेंच जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची व जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने वेंकटेश नायक (द रिपोर्टर्स कलेक्टिव), पत्रकार नितिन सेठी और एनसीपीआरआई की याचिकाओं पर नोटिस जारी किया।

Supreme Court of India में 2023 डेटा कानून को लेकर सुनवाई

Supreme Court of India में 2023 डेटा कानून को लेकर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट  ने सोमवार को 2023 के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने की सहमति दे दी। याचिकाओं में कहा गया है कि यह कानून सूचना के अधिकार (RTI) को कमजोर करता है और सरकारी अधिकारियों को बहुत ज्यादा गोपनीयता की शक्ति देता है। हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल इस कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है, यानी पूरी सुनवाई तक यह कानून लागू रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट  तीन जजों की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची व जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने वेंकटेश नायक (द रिपोर्टर्स कलेक्टिव), पत्रकार नितिन सेठी और एनसीपीआरआई की याचिकाओं पर नोटिस जारी किया।

मुख्य विवाद DPDP कानून की धारा 44(3) को लेकर है। इस धारा के तहत RTI कानून की धारा 8(1)(j) में बदलाव किया गया है, जिससे सरकारी विभागों को व्यक्तिगत जानकारी देने से छूट मिल जाती है। पहले अगर जनहित ज्यादा महत्वपूर्ण होता था, तो ऐसी जानकारी दी जा सकती थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह बदलाव गोपनीयता को ज्यादा महत्व देता है और जवाबदेही व पारदर्शिता को कमजोर करता है। इससे पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए भ्रष्टाचार या गलत कामों का खुलासा करना मुश्किल हो सकता है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा कि यह कानून बहुत सख्त है और इससे RTI की सुरक्षा को बड़ा नुकसान पहुंचा है। वकील प्रशांत भूषण ने पहले के सुभाष अग्रवाल मामले का हवाला दिया, जिसमें निजता और RTI के बीच संतुलन तय किया गया था। लेकिन अदालत ने कहा कि नए कानून की अलग से गहराई से जांच करनी होगी। वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने भी अपनी दलीलें रखीं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को जटिल और संवेदनशील बताया है और इसे बड़ी बेंच को भेज दिया है। अगली सुनवाई मार्च 2026 में होगी। माना जा रहा है कि यह मामला भविष्य में नागरिकों के सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार की सीमाएं तय करने वाला अहम फैसला साबित हो सकता है।

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