1993 के मुंबई बम धमाकों के अगले दिन भारत की सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि आखिर हुआ क्या था। उस समय ऐसी किसी घटना से निपटने के लिए कोई तय गाइडलाइन या नियमों की किताब मौजूद नहीं थी।। दो घंटे के भीतर एक बड़े शहर में 13 समन्वित बम धमाके हुए, ऐसी स्थिति के लिए पुलिस, खुफिया एजेंसियां और कानून पहले से तैयार नहीं थे।
हमलों के बाद देश में केवल शोक और आक्रोश ही नहीं था। इसके साथ-साथ एक धीमी, कठिन और कई बार अव्यवस्थित प्रक्रिया भी शुरू हुई—ऐसी सुरक्षा व्यवस्थाएं खड़ी करने की, जो शायद पहले से मौजूद होनी चाहिए थीं।
इन धमाकों की साजिश अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और उसके संगठित अपराध नेटवर्क डी-कंपनी ने रची थी। इसमें टाइगर मेमन (इब्राहिम मूसा मेमन) मुख्य स्थानीय समन्वयक था। जांच में यह भी सामने आया कि इस पूरे ऑपरेशन को पाकिस्तान की संयुक्त सैन्य खुफिया एजेंसी से लॉजिस्टिक समर्थन मिला था। टाइगर मेमन और दाऊद इब्राहिम तब से फरार हैं और माना जाता है कि उन्हें पाकिस्तान में शरण मिली हुई है।
जांच के शुरुआती चरण में अधिकारियों ने सबसे बड़ी कमी संचार और समन्वय में पाई। मुंबई पुलिस, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) राज्य की खुफिया इकाइयां और अन्य राष्ट्रीय एजेंसियां सभी को धमाकों की जानकारी मिली और सभी ने अपनी-अपनी तरफ से कार्रवाई की। लेकिन कोई साझा कमान संरचना नहीं थी और न ही ऐसा तेज़ तंत्र था जिससे अलग-अलग एजेंसियों की जानकारी तुरंत जोड़कर पूरी तस्वीर सामने लाई जा सके।
महाराष्ट्र ने इस त्रासदी से सबक लेने की कोशिश की। 1999 में राज्य ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) लागू किया। इस कानून के पीछे एक महत्वपूर्ण सोच थी 1993 जैसे अपराध किसी एक व्यक्ति का काम नहीं होते। इनके पीछे संगठित नेटवर्क होते हैं, जिनकी संरचना कई स्तरों में फैली होती है और जिन्हें पकड़ना आसान नहीं होता।
मकोका ने जांच एजेंसियों को सिर्फ किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार दिया। अब अभियोजन पक्ष किसी सिंडिकेट को उसके नेतृत्व, वित्तीय स्रोतों और कमान संरचना के आधार पर अदालत में ला सकता था।
मुंबई पुलिस के भीतर भी धीरे-धीरे महत्वपूर्ण बदलाव हुए। कई इकाइयों का पुनर्गठन किया गया और अधिकारियों ने गैंगस्टरों को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में नहीं, बल्कि संभावित आतंकवादी नेटवर्क के हिस्से के रूप में देखना शुरू किया। अब ध्यान इस बात पर भी जाने लगा कि पैसा कैसे चलता है, हथियार कहां से आते हैं और आदेश किस तरह ऊपर से नीचे तक पहुंचते हैं।
तटीय सुरक्षा भी सुधार का बड़ा क्षेत्र बनी। धमाकों में इस्तेमाल हुआ आरडीएक्स समुद्र के रास्ते भारत पहुंचा था। इसके बाद महाराष्ट्र ने समुद्री गश्त बढ़ाई, मरीन पुलिस को मजबूत किया और तटरेखा पर अधिक निगरानी शुरू की। पहले तस्करी के रास्तों को मुख्यतः कस्टम्स का मामला माना जाता था, लेकिन अब यह समझ बनी कि यही रास्ते हथियार और विस्फोटक भी देश में ला सकते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर बदलाव अपेक्षाकृत धीरे आए। कई दशकों से अलग-अलग काम कर रही खुफिया एजेंसियों के बीच धीरे-धीरे सूचना साझा करने की नई व्यवस्थाएं बनाई गईं। यह प्रक्रिया आसान नहीं थी और कई बार इसका विरोध भी हुआ, लेकिन इसकी दिशा उन कमियों से तय हुई जो 12 मार्च 1993 से पहले मौजूद थीं।
समय के साथ मुंबई के सार्वजनिक स्थानों का स्वरूप भी बदल गया। वित्तीय इमारतों, बड़े बाजारों और सरकारी कार्यालयों के बाहर सुरक्षा जांच सामान्य हो गई। संवेदनशील इलाकों में वाहनों की जांच भी रोजमर्रा का हिस्सा बन गई। यह बदलाव केवल दिखावे के नहीं थे; वे इस समझ को दर्शाते थे कि भीड़भाड़ वाले महानगर, जो आर्थिक गतिविधियों का केंद्र होते हैं, सुरक्षा के लिहाज से भी संवेदनशील हो सकते हैं।
1993 के धमाकों का आघात भारत की सुरक्षा संस्थाओं की स्मृति में गहराई से दर्ज हो गया। वर्षों तक यह घटना नीति निर्माण, प्रशिक्षण और सुरक्षा योजना बैठकों में संदर्भ के रूप में मौजूद रही। हर नया प्रोटोकॉल, हर सुधार और हर अतिरिक्त तटीय गश्ती नौका उसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश थी—आखिर शहर इतना असुरक्षित कैसे रह गया, और यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि ऐसा फिर कभी न हो।
