DU एंट्रेंस में कांग्रेस का ‘जाति’ कार्ड और बिहार में ‘राजपूत’ लड़की की गैंगरेप के बाद हत्या: क्या राहुल सारण में मृतका के घर जा कर इंसाफ़ मांगेंगे?

दरअसल लड़कियों की कोई जाति नहीं होती, वो सिर्फ शिकार होती हैं, लेकिन जाति की सुविधाजनक राजनीति ने समाज के अंदर ये हुनर पैदा कर दिया है कि पीड़ितों का दर्द नहीं उनकी जाति देखी जाए

‘जाति’ कार्ड खेलने में माहिर हो चुके राहुल गांधी

‘जाति’ कार्ड खेलने में माहिर हो चुके राहुल गांधी

‘जाति’ कार्ड खेलने में माहिर हो चुके राहुल गांधी अब DU एंट्रेंस में जाति का एंगल लेकर घुस गए हैं, तो वहीं इधर बिहार में एक राजपूत समाज की नाबालिक लड़की की गैंगरेप के बाद हत्या की ख़बर है और आरोप दलित युवाओं पर है। जानकारी के मुताबिक राजपूत परिवार की ये लड़की 10 वीं की छात्रा थी और चूल्हा जलाने के लिए जलावन लेने घर के पीछे गई थी, ताकि रोटियों का इंतज़ाम हो सके, लेकिन वहां घात लगाए पहले से बैठे 5 लड़के (दलित जाति से संबंध रखने वाले) उसे जबरन उठाकर ले गए, रेप किया।

आवाज़ सुन लड़की की मां वहां पहुंची तो लड़की को 10 मीटर तक घसीटते हुए कुएं तक लाए और उसे कुएं में फेंक कर भाग निकले। क़रीब आधा घंटे तक कुएं में ही डूबने-उतरने और तड़पने के बाद बच्ची की मौत हो गई।

प्रत्यक्षदर्शी ने ये भी बताया कि, छात्रा को कुएं में धकेलने के बाद मुख्य आरोपी ने अपने वॉट्सएप पर भोजपुरी सॉन्ग का स्टेटस लगाया था। इसमें उसने लिप्सिंग करते हुए कहा था- ‘रानी हम बना लेहब तोहरा के दुल्हिनियां… अगर कोई बोला तो घर में घुसकर सबको मार डालेंगे’

अपराधी की जाति देखकर अपराध तय करने का नजरिया बदलने की जरूरत

महिलाओं के साथ अपराध के मामले में ऐसी कहानियां नई नहीं हैं, लेकिन इस ख़बर पर इतना सन्नाटा क्यों है, क्योंकि लड़की सामान्य वर्ग की है, जाति से राजपूत है और बलात्कारी-हत्यारे दलित (पासवान)?

चूंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, तो हमारी लोकतांत्रिक राजनीति सिर्फ ‘अंकगणित’ की बाइनरी ही समझती है और अब बड़ी मुश्किल से साधे गए जातिगत समीकरणों के ख़िलाफ़ कैसे जाया जाए?

दरअसल इसी राजनीति ने ही देशवासियों के अंदर ये हुनर पैदा कर दिया है कि पीड़ितों का दर्द नहीं उनकी जाति देखी जाए।
अब क्या इस सियासी समीकरण के लिए क्या सदियों से ‘शोषक’ जाति का परिचायक बने रहे सामान्य वर्ग की बेटी की भेंट नहीं चढ़ाई जा सकती ?

क्या वंचितों, पिछड़ों और शोषित वर्ग को इतना भी अधिकार नहीं? 

आख़िर एक IAS अधिकारी से लेकर सामान्य वर्ग की लड़कियों की लालसा रखने वाला सड़कछाप ‘शोषित’ इसी अधिकार की बात नहीं कर रहा था? लेकिन लड़कियों की कोई जाति नहीं होती, वो सिर्फ शिकार होती हैं, समानता के हर आंदोलन में उन्हें ही ‘बांट बखरा’ बनाया जाता है। 
‘सर्वहारा’ और ‘ बुर्जुआ’ वर्ग की तरह जब तक कथित ‘शोषितों’ को कथित

‘शोषकों’ की बेटियां न मिलें तब तक अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ाई अधूरी है।
किसी वर्ग की किसी दूसरे वर्ग पर, किसी समुदाय या मज़हब की दूसरे पर जीत तब तक असंभव है, जब तक उनकी बहन, बेटियों और लड़कियों को छीन या हड़प न लिया जाए (बलात् या छल पूर्वक)।
 यकीन मानिएं गाँव के लोग और स्वयं आरोपियों की जाति के लोग उन्हें हैवान ही मान रहे हैं, लेकिन उतना ही सच ये है कि पिछड़ों और ‘शोषितों’ को साधने में पूरी शक्ति लगाने वाली सरकारें उन्हें अपराधी नहीं, जाति विशेष के नज़रिए से ही देखेंगी, उसी अनुरूप कार्रवाई करेंगी ताकि अंकगणित का संतुलन बना रहे सवाल ये भी है कि क्या नीतीश सरकार आरोपियों के घर बुलडोज़र चलाने की हिम्मत दिखा सकेंगे, इन दलित आरोपियों पर ऐसी कार्रवाई होगी जो मिसाल बन सके?
चंद्रशेखर से लेकर राहुल गांधी और अंबेडकरवादी कितने नेता पीड़िता के घर जाने और उसे इंसाफ़ दिलाने की हिम्मत दिखा सकेंगे?

फर्ज कीजिए अगर अपराध का यही जातिगत समीकरण उलट दिया गया होता तो ?
कृपया पीड़ितों के दर्द और अपराधियों के गुनाहों का पैमाना जाति को मत बनाइए।
अपराधों के प्रति कोई दोहरा मापदंड नहीं होना चाहिए, नहीं तो समाजिक एकता की आड़ में जो राजनीतिक प्रयास जारी हैं, उन्हें धराशाई होते देर नहीं लगेगी।

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