हॉर्मुज क्राइसिस की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल की कीमतें तेज़ी से बढ़ी हैं, लेकिन भारत में न सिर्फ कीमतें, बल्कि सप्लाई भी स्थिर बनी हुई है और इसका बहुत बड़ा श्रेय पीएम मोदी की डिप्लोमेसी को जाता है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, खासतौर पर अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच टकराव का असर अब पूरी दुनिया महसूस करने लगी है। इस जंग की वजह से दुनिया भर में पेट्रोल और डीजल के दाम तेजी से बढ़े हैं। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, सिंगापुर, स्पेन जैसे देशों में तो क़ीमतों में 20% से लेकर 30% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि कच्चे तेल और गैस के मामले में बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर भारत में कोई भी बढ़ोतरी नहीं हुई है और न सिर्फ क़ीमतें, बल्कि सप्लाई भी पूरी तरह स्थिर बनी हुई है, जबकि कच्चे तेल (Brent crude) की क़ीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी है।
दुनिया भर में कीमतों में भारी तेजी
23 फरवरी से 16 मार्च के बीच ऑस्ट्रेलिया और वियतनाम में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें सबसे ज्यादा- करीब 32% तक बढ़ चुकी हैं, जबकि अमेरिका में 24% और सिंगापुर में 21% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ये हाल तब है जबकि अमेरिका के पास ख़ुद के बेहद विशाल तेल और गैस भंडार हैं और अब वेनेजुएला की तेल इंडस्ट्री पर भी उसका ही कब्जा है। इसके अलावा स्पेन में 19% और मिस्र में 14% का इजाफा हुआ, वहीं चीन में भी कीमतों में करीब 10% की बढ़ोतरी देखी गई। मलेशिया और हांगकांग में 5-5% तथा कतर में 3% की वृद्धि हुई, जिससे साफ है कि युद्ध का असर लगभग दुनिया के हर बड़े बाज़ार में युद्ध का असर हुआ है। ईरान के पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी 25% कीमतें बढ़ी हैं, जबकि कंबोडिया में 19.37% , कनाडा (17.33%) और जर्मनी (12.64%) में कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, सिर्फ भारत इस लिस्ट में अपवाद है। भारत में क़ीमतें पूरी तरह स्थिर बनी हुई हैं।
युद्ध के बीच क़ीमत कैसे काबू कर रहा है भारत ?
भारत में पेट्रोल और डीजल के रेट आज भी लगभग उतने ही बने हुए हैं, जितने इस युद्ध से पहले थे, तो इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है सरकार की सक्रिय हस्तक्षेप की नीति।
भारत ने अपने स्ट्रैटेजिक ऑयल रिजर्व (Strategic Petroleum Reserves) का उपयोग डिमांड और सप्लाई के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए किया है, जिससे कीमतें स्थिर बनी रहीं।
दूसरा बड़ा फैक्टर है रूस से सस्ते कच्चे तेल का आयात: पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बीच भारत ने डिस्काउंट पर रूसी तेल की जमकर ख़रीद की, जिससे लागत काफी हद तक नियंत्रित रहीं।
वहीं सरकारी तेल कंपनियों ने भी कुछ हद तक मार्जिन कम करके कीमतों को स्थिर रखा, ताकि आम जनता पर तुरंत बोझ न पड़े।
सरकार का प्रयास भी यही है कि जब तक संभव हो, जनता को इस युद्ध के प्रभाव और महंगाई के बोझ से बचा कर रखा जाए।
यानी जब तक कच्चा तेल 120–130 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक नहीं पहुंचता, तब तक कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी से बचने की कोशिश की जाएगी।
‘मोदी डिप्लोमेसी’ और खेमों में बंटती दुनिया के बीच भारत का संतुलन
भारत का कीमतों को नियंत्रण में रख पाना इसलिए भी बेहद उल्लेखनीय है क्योंकि दूसरे देशों की तुलना में भारत भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85% हिस्सा आयात करता है और इसमें भी करीब 60–65% तेल खाड़ी देशों (Middle East) से आता है। इस सप्लाई का बहुत बड़ा हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के जरिए भारत तक पहुंचता है, जो दुनिया का सबसे संवेदनशील और रणनीतिक समुद्री मार्ग माना जाता है। मिडिल ईस्ट में जंग या तनाव का सीधा असर इस रूट पर पड़ा है, और ये संकरा रास्ता इस वक्त एक तरह से ठप पड़ा है। हालांकि भारत अपनी डिप्लोमेसी के दम पर भारतीय झंडे वाले तेल और गैस के टैंकर्स को हॉर्मुज से बाहर निकालने में कामयाब रहा है और मौजूदा परिस्थितियों के लिहाज़ से ये बेहद चुनौतीपूर्ण काम है, जिसे बखूबी से अंजाम दिया जा रहा है।
The whole world is currently struggling with the consequences of war.
Gasoline and petrol prices have surged across many countries, and diesel prices have risen sharply.
But these numbers clearly show one thing: under PM Modi’s leadership, India remains safe and stable.
No… pic.twitter.com/0Qf7ut6lx6
— BJP (@BJP4India) March 20, 2026
अगर भारत अपने ठीक पड़ोस में हो रही इस जंग में दोनों पक्षों के बीच न सिर्फ बेहतरीन संतुलन बनाते हुए अपने हितों को सुरक्षित रखने में कामयाब हो रहा है तो इसका बहुत बड़ा श्रेय प्रधानमंत्री मोदी की डिप्लोमेसी और उनके निजी संबंधों को भी जाता है। उन्होने खाड़ी देशों के नेताओं के साथ बातचीत तक ईरान के नागरिक ठिकानों पर हुए हमलों की आलोचना की, तो वहीं ईरान के राष्ट्रपति से भी बात कर भारत के पक्ष से अवगत करवाया, जिसके ठीक बाद ईरान भारतीय जहाजों को हॉर्मुज से निकालने के लिए तैयार हो गया। यह केवल आर्थिक मैनेजमेंट नहीं, बल्कि एक संतुलित भू-राजनीतिक रणनीति (geopolitical balancing) का भी परिणाम है। ज़ाहिर है युद्ध अगर लंबा खिंचता है तो स्थितियां और भी जटिल होंगी और तब ‘मोदी डिप्लोमेसी’ की और कड़ी परीक्षा भी होगी, लेकिन फ़िलहाल वो इसमें पूरी तरह खरे उतरते नज़र आए हैं।
