शिवालिक के LPG लेकर गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पहुँचने के बाद अब ‘नंदा देवी’ भी भारत के कांडला बंदरगाह पर पहुँच चुका है, विस्तार से समझते

भारत का शिवालिक टैंकर सोमवार शाम को गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पंहुचा ये जहाज में लगभग 45,000 मीट्रिक टन LPG भारत लेकर आया, दूसरा वही ‘नंदा देवी’ टैंकर, जो ‘शिवालिक’ के साथ ही खाड़ी क्षेत्र से रवाना हुआ था, मंगलवार को कांडला बंदरगाह पहुँचा और अपने साथ करीब 47,000 से अधिक मीट्रिक टन LPG लेकर आया, दोनों जहाज मिलाकर करीब 92,712 टन LPG लेकर आए हैं।

‘शिवालिक’टैंकर

ईरान से विशेष अनुमति मिलने के बाद भारतीय LPG टैंकरों की आवाजाही को लेकर अहम अपडेट सामने आए हैं

भारत का शिवालिक टैंकर सोमवार शाम को गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पंहुचा ये जहाज में लगभग 45,000 मीट्रिक टन LPG भारत लेकर आया, दूसरा वही ‘नंदा देवी’ टैंकर, जो ‘शिवालिक’ के साथ ही खाड़ी क्षेत्र से रवाना हुआ था, मंगलवार को कांडला बंदरगाह पहुँचा और अपने साथ करीब 47,000 से अधिक मीट्रिक टन LPG लेकर आया, दोनों जहाज मिलाकर करीब 92,712 टन LPG लेकर आए हैं।

कैसे काम करते हैं ये टैंकर?

‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ जैसे विशालकाय LPG टैंकर साधारण जहाज नहीं, बल्कि खास तौर पर डिजाइन किए गए गैस कैरियर होते हैं। इनमें हजारों टन LPG होती है, जिससे लाखों सिलेंडर भरे जा सकते हैं। आइए समझते हैं कि ये टैंकर कैसे काम करते हैं

LPG से भरे ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ जैसे टैंकर सिर्फ गैस ढोने वाले जहाज नहीं होते, बल्कि ये चलते-फिरते हाई-टेक सिस्टम होते हैं, जहाँ हर पल प्रेशर, तापमान और सुरक्षा पर कड़ी निगरानी रखी जाती है।

इन टैंकरों का काम रिफाइनरी या गैस प्लांट से LPG को उठाकर उसे सुरक्षित तरीके से बंदरगाह तक पहुँचाना होता है।

LPG टैंकर में गैस कैसे भरी जाती है?

जहाज के अंदर बड़े-बड़े विशेष कार्गो टैंक लगे होते हैं, जो गोल या बेलनाकार आकार के होते हैं और इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे उच्च दबाव और बेहद कम तापमान को सह सकें, जिनमें LPG को तरल रूप में सुरक्षित रखा जाता है, LPG को पहले दबाव या कम तापमान पर लिक्विड बनाया जाता है, फिर पोर्ट पर पाइपलाइन के जरिए टैंकर से जोड़ा जाता है और हाई-पावर पंप की मदद से इसे टैंकर के टैंकों में भरा जाता है, पूरी प्रक्रिया एक बंद (सील्ड) सिस्टम में होती है ताकि गैस बाहर न निकल सके,सफर के दौरान टैंकर के अंदर कंप्रेसर और कूलिंग सिस्टम लगातार काम करते रहते हैं। LPG को लिक्विड रूप में बनाए रखना बेहद जरूरी होता है, क्योंकि तापमान बढ़ने पर इसका कुछ हिस्सा गैस (वाष्प) में बदल सकता है। ऐसे में जहाज में लगे सिस्टम उस गैस को दोबारा कंप्रेस करके लिक्विड में बदल देते हैं। इस प्रक्रिया को री-लिक्विफिकेशन कहा जाता है, जिससे टैंक के अंदर का प्रेशर और तापमान संतुलित बना रहता है और किसी तरह का खतरा पैदा नहीं होता।

पोर्ट पर LPG कैसे उतारी जाती है?

जब टैंकर अपने गंतव्य बंदरगाह पर पहुँचता है, तो उसे विशेष पाइपलाइन सिस्टम से जोड़ा जाता है। इसके बाद हाई-पावर पंप की मदद से LPG को जहाज से बाहर निकालकर बड़े-बड़े स्टोरेज टैंकों में ट्रांसफर किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया एक क्लोज्ड (सील्ड) सिस्टम में होती है, जिससे गैस का कोई रिसाव न हो और वह हवा के संपर्क में न आए। जहां तक सुरक्षा का सवाल है, LPG टैंकरों को दुनिया के सबसे सुरक्षित ट्रांसपोर्ट सिस्टम में गिना जाता है। इन जहाजों में डबल हुल (दोहरी परत वाली बॉडी) होती है, जो टक्कर या दुर्घटना की स्थिति में अंदर के टैंकों को सुरक्षित रखती है। इसके अलावा, हर समय प्रेशर और तापमान कंट्रोल सिस्टम सक्रिय रहते हैं, जो किसी भी असामान्य स्थिति को तुरंत संभाल लेते हैं, साथ ही, जहाजों में गैस लीक डिटेक्टर,अत्याधुनिक फायर फाइटिंग सिस्टम और इमरजेंसी शटडाउन सिस्टम लगे होते हैं, जो खतरे की स्थिति में तुरंत पूरी प्रक्रिया को रोक सकते हैं। इन सभी तकनीकों और कड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों के कारण LPG टैंकर हजारों टन गैस को सुरक्षित तरीके से एक देश से दूसरे देश तक पहुँचाने में सक्षम होते हैं।

यानी साफ तौर पर कहें तो, LPG टैंकर सिर्फ ट्रांसपोर्ट का माध्यम नहीं, बल्कि एक पूरी तरह सुरक्षित और कंट्रोल्ड “फ्लोटिंग गैस सिस्टम” होते हैं, जो हर स्तर पर सुरक्षा और तकनीक का बेहतरीन उदाहरण हैं।

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