रक्षा खरीद बोर्ड (DPB) ने सोमवार को भारतीय वायु सेना (IAF) के रूस से पांच और S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब पश्चिम एशिया में बैलिस्टिक मिसाइलों और कामिकाज़े ड्रोन से जुड़ा संघर्ष जारी है।
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की अध्यक्षता वाले बोर्ड ने प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। अब यह प्रस्ताव रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) के पास ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ (AoN) के लिए भेजा जाएगा। DAC से मंजूरी मिलने के बाद लागत तय करने के लिए एक समिति गठित की जाएगी और अंत में वित्त मंत्रालय के माध्यम से कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) से अंतिम मंजूरी ली जाएगी।
फिलहाल भारत के पास तीन S-400 सिस्टम हैं और दो अन्य इस वर्ष सशस्त्र बलों में शामिल होने की उम्मीद है। S-400 सिस्टम ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान बेहतरीन प्रदर्शन किया था। 10 मई को भारत द्वारा दुश्मन के एयरबेस, एयर डिफेंस रडार और कमांड कंट्रोल सिस्टम पर हमले के समय इस प्रणाली ने पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों, एयरबोर्न वार्निंग और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस विमानों को उड़ान भरने से रोका।
10 मई 2025 की सुबह भारतीय ब्रह्मोस मिसाइल हमले में रावलपिंडी के चकलाला एयरबेस पर पाकिस्तान वायु सेना के नॉर्दर्न कमांड एंड कंट्रोल नेटवर्क को नष्ट कर दिया गया था। इसके बाद पाकिस्तान ने शांति की अपील की।
रक्षा मंत्रालय अब वायु सेना और थल सेना के उस प्रस्ताव का इंतजार कर रहा है, जिसमें 13 रूसी ‘पैंटसिर S-1’ स्व-चालित मिसाइल सिस्टम खरीदने की बात है। यह सिस्टम मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, कम दूरी के रॉकेट और कामिकाज़े ड्रोन को रोकने में सक्षम है।
इनमें से 10 पैंटसिर सिस्टम वायु सेना द्वारा S-400 सिस्टम की सुरक्षा के लिए खरीदे जाएंगे, जबकि तीन सिस्टम सेना द्वारा सीमा पर क्रूज मिसाइल, अटैक हेलीकॉप्टर, ड्रोन और कम दूरी की मिसाइलों से निपटने के लिए लिए जाएंगे।
सूत्रों के अनुसार, पांचों नए S-400 सिस्टम सीधे खरीदे जाएंगे, जबकि उनके रखरखाव और मरम्मत का काम भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनियों को दिया जाएगा। पैंटसिर सिस्टम के मामले में कुछ सिस्टम तेज प्रक्रिया के तहत सीधे खरीदे जाएंगे, जबकि कुछ का निर्माण भारत में निजी कंपनियां करेंगी।
पैंटसिर सिस्टम का उपयोग संयुक्त अरब अमीरात की सेना कर रही है और इसने ईरानी कामिकाज़े ड्रोन को मार गिराने में अपनी क्षमता साबित की है।
भारत का बड़ा भू-भाग, पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर दुश्मनों की मौजूदगी और 11,000 किलोमीटर लंबी तटरेखा को देखते हुए उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत है, ताकि दुश्मन के लड़ाकू विमानों और बैलिस्टिक मिसाइलों का मुकाबला किया जा सके।
ईरान-अमेरिका के जारी संघर्ष ने वैश्विक स्तर पर एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम की आवश्यकता को और उजागर किया है। इसके अलावा तुर्की कम लागत वाले कामिकाज़े ड्रोन और अन्य हथियार पाकिस्तान, ईरान, अज़रबैजान, मालदीव और बांग्लादेश को उपलब्ध करा रहा है, जिससे दुश्मन पर एक साथ बड़े पैमाने पर हमले की रणनीति अपनाई जा सके।
