ईरान का 10 पॉइंट प्लान: किन शर्तों पर रुका अमेरिका-ईरान युद्ध?

दो हफ्ते के युद्धविराम के पीछे तेहरान की बड़ी रणनीति, परमाणु कार्यक्रम से लेकर हॉर्मुज पर नियंत्रण तक रखीं कड़ी शर्तें

ईरान का 10 पॉइंट प्लान Image (State Mirror Hindi)

अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कई हफ्तों से जारी तनाव आखिरकार उस मोड़ पर पहुंच गया, जहां दुनिया एक बड़े युद्ध के खतरे से कुछ समय के लिए पीछे हटती दिखाई दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा तय की गई सैन्य कार्रवाई की डेडलाइन खत्म होने से ठीक पहले दोनों देशों के बीच दो हफ्ते के सीजफायर पर सहमति बन गई। इस अस्थायी युद्धविराम ने न केवल संभावित बड़े सैन्य टकराव को टाल दिया, बल्कि वैश्विक स्तर पर राहत की सांस भी दी। हालांकि इस सीजफायर के पीछे जो शर्तें और रणनीति काम कर रही हैं, वे बेहद जटिल और दूरगामी प्रभाव वाली हैं।

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तेहरान द्वारा पेश किए गए 10 सूत्रीय प्रस्ताव से हुई, जिसे अमेरिका ने बातचीत के लिए एक “वर्केबल आधार” माना। यह प्रस्ताव केवल युद्ध रोकने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें ईरान ने अपने दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक हितों को भी शामिल किया। इस योजना ने साफ कर दिया कि ईरान सिर्फ सीजफायर नहीं चाहता, बल्कि वह इस मौके का इस्तेमाल अपने पक्ष में वैश्विक समीकरण बदलने के लिए करना चाहता है।

सीजफायर के तहत अमेरिका ने फिलहाल ईरान पर अपने सैन्य हमलों को रोक दिया है, जबकि ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज को दोबारा खोलने पर सहमति जताई है। यह वही जलमार्ग है, जहां से सामान्य परिस्थितियों में दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा सप्लाई गुजरती है। इस मार्ग के बंद होने से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर गंभीर असर पड़ा था।

इस अस्थायी समझौते में इजराइल ने भी हमले रोकने का समर्थन किया है, जबकि पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने में अहम योगदान दिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने इस प्रस्ताव को वॉशिंगटन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अलावा चीन, जो ईरान का बड़ा व्यापारिक साझेदार है, ने भी तनाव कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए तेहरान पर दबाव बनाया।

ईरान के 10 सूत्रीय प्रस्ताव में सबसे पहली और अहम मांग गैर-आक्रामकता की है। यानी अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान के खिलाफ किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे। इसके साथ ही ईरान ने साफ किया है कि स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज पर उसका नियंत्रण बना रहेगा। यह मुद्दा इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू बन गया है, क्योंकि इस जलमार्ग का नियंत्रण वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है।

ईरान की दूसरी बड़ी मांग उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर है। तेहरान चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसके यूरेनियम संवर्धन (न्यूक्लियर एनरिचमेंट) कार्यक्रम को स्वीकार करे। यह वही मुद्दा है, जिस पर वर्षों से अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ उसका विवाद चला आ रहा है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे इसे जारी रखने का अधिकार मिलना चाहिए।

इसके अलावा ईरान ने अमेरिका द्वारा लगाए गए सभी प्राथमिक और द्वितीयक प्रतिबंधों को हटाने की मांग की है। प्राथमिक प्रतिबंध सीधे अमेरिका द्वारा लगाए गए हैं, जबकि द्वितीयक प्रतिबंध उन देशों पर लागू होते हैं जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं। इन प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ा है, इसलिए उनका हटना तेहरान के लिए बेहद जरूरी है।

ईरान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) से जुड़े सभी प्रस्तावों को खत्म करने की भी मांग की है, जो उसके परमाणु कार्यक्रम पर निगरानी या प्रतिबंध लगाते हैं। इसके साथ ही उसने युद्ध के दौरान हुए नुकसान के लिए आर्थिक मुआवजा और विदेशों में फंसी अपनी संपत्तियों को वापस करने की भी मांग रखी है।

ईरान की एक और महत्वपूर्ण शर्त यह है कि अमेरिका अपने सैन्य बलों को मध्य पूर्व से वापस बुलाए और क्षेत्र में चल रही सभी सैन्य कार्रवाइयों को रोके। इसमें लेबनान में सक्रिय संगठन हिज़्बुल्लाह के खिलाफ हमले भी शामिल हैं, जिसे ईरान अपना सहयोगी मानता है।

ईरान ने यह भी प्रस्ताव रखा है कि किसी भी समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के जरिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बाध्यकारी बनाया जाए, ताकि भविष्य में कोई भी पक्ष इससे पीछे न हट सके। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने इस प्रस्ताव को एक “कूटनीतिक जीत” बताया है और दावा किया है कि अमेरिका को उसकी शर्तों पर विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर वॉशिंगटन और अन्य पश्चिमी देशों में काफी संदेह भी है। खासकर स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज पर ईरान के नियंत्रण की मांग को लेकर चिंता जताई जा रही है। अमेरिकी सांसदों और विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान को इस जलमार्ग पर पूर्ण नियंत्रण मिल जाता है, तो यह वैश्विक व्यापार के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

इसी बीच रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि ईरान और ओमान मिलकर इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से प्रति जहाज लगभग 20 लाख डॉलर तक का शुल्क वसूल सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह ईरान के लिए एक बड़ा आर्थिक स्रोत बन सकता है, लेकिन इससे वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर भी दबाव बढ़ेगा।

अब आगे की स्थिति काफी हद तक आने वाली कूटनीतिक बातचीत पर निर्भर करेगी। पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता आयोजित करने का प्रस्ताव दिया है। ईरान ने इसमें शामिल होने की पुष्टि कर दी है, जबकि अमेरिका ने अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि यह सीजफायर केवल एक अस्थायी विराम है, न कि स्थायी समाधान। असली चुनौती अब यह है कि क्या दोनों देश इन जटिल मुद्दों पर सहमति बना पाते हैं या फिर यह तनाव दोबारा बढ़ता है।

फिलहाल, दुनिया ने एक बड़े संकट से थोड़ी राहत जरूर महसूस की है, लेकिन आने वाले दिनों में होने वाली बातचीत ही तय करेगी कि यह शांति कायम रहती है या फिर एक और टकराव की ओर बढ़ती है।

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