क्या बंगाल में कांग्रेस टीएमसी के साथ वही करने वाली है जो उसने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ किया?

राहुल गांधी चुनाव प्रचार बंगाल

प.बंगाल में कांग्रेस की नजर मुस्लिम वोटर्स पर है, जो फिलहाल ममता बनर्जी का सबसे पुख्ता वोटबैंक हैं

क्या कांग्रेस दिल्ली की तर्ज पर टीएमसी से अपने अपमान का बदला लेगी? परिवर्तन की आवाज़ के बीच ये सवाल पश्चिम बंगाल की सियासत में धीरेधीरे पैठ बनाता जा रहा है। राज्य में कांग्रेस की मौजूदा रणनीति और उसके चुनावी मूव्स को देखें तो यह साफ संकेत मिल रहा है कि पार्टी सीधी लड़ाई लड़ने की जगह समीकरण बदलने पर दांव लगा रही है और उसका बैटलग्राउंड है प्रदेश के वो मुस्लिम बहुल इलाकेजो अब तक ममता बनर्जी की TMC का सबसे सुरक्षित वोटबैंक माने जाते रहे हैं।

कांग्रेस का फोकस खास तौर पर मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों पर है, जहां कुल मिलाकर 43 विधानसभा सीटें आती हैं और कई इलाकों में मुस्लिम मतदाता 50% या उससे अधिक हैं। यही वे क्षेत्र हैं जहां कांग्रेस का पारंपरिक आधार रहा है और जहां वह आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

मुस्लिम बहुल इलाक़ों में ममता को चुनौती देने की कोशिश

2016 के विधानसभा चुनाव में, जब कांग्रेस ने वामदलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, तो इन 43 सीटों में से 31 पर उसने मुकाबला किया और राज्य में मिली अपनी 44 सीटों में से 25 सीटें इन्हीं जिलों से हासिल की थीं। यह बताता है कि इन इलाकों में उसका स्ट्राइक रेट कितना मजबूत था।

इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस इन क्षेत्रों में पूरी तरह हाशिए पर नहीं गई। इन 43 विधानसभा क्षेत्रों में वह 9 सीटों पर पहले स्थान पर रही और 14 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही।

2021 के West Bengal Legislative Assembly Election 2021 में भले ही कांग्रेसवाम गठबंधन का खाता नहीं खुला, लेकिन कांग्रेस लगभग 20–25 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही और इनमें से अधिकांश सीटें मालदा और मुर्शिदाबाद की ही थीं।

2024 के लोकसभा चुनाव में भी तस्वीर पूरी तरह नहीं बदली। इन्हीं 43 सीटों में से 11 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस पहले स्थान पर रही, जबकि 14 सीटों पर दूसरे नंबर पर। यानी यह साफ है कि इन जिलों में कांग्रेस आज भी लगभग 25 सीटों पर सीधी टक्कर में बनी हुई है।

हालांकि, मौजूदा स्थिति यह है कि कांग्रेस के पास बंगाल में एक भी विधायक नहीं है। उपचुनाव में सागरदिघी से उसे एक सीट जरूर मिली थी, लेकिन वह इकलौता विधायक भी बाद में टीएमसी में शामिल हो गया। यह घटना कांग्रेस के लिए सिर्फ राजनीतिक नुकसान नहीं, बल्कि एक तरह का अपमान भी मानी गई।

यहीं से कांग्रेस की नई रणनीति को समझा जा सकता है। पार्टी जानती है कि बंगाल में उसकी सीधी वापसी तभी संभव है, जब TMC कमजोर हो और राजनीतिक लड़ाई धीरेधीरे भाजपा बनाम कांग्रेस की ओर शिफ्ट हो। ऐसे में अगर कांग्रेस मुस्लिम बहुल सीटों में 2–4 प्रतिशत वोट भी TMC से खींचने में सफल होती है, तो इसका असर सीधा ममता बनर्जी की सीटों सीटों पर पड़ सकता है।

क्या बंगाल में दिल्ली मॉडल पर काम कर रही है कांग्रेस?

इस पूरे समीकरण की तुलना अब दिल्ली से भी की जा रही है। 2025 के विधानसभा चुनावों में दिल्ली में बीजेपी को 45.8% वोट और 48 सीट मिली थीं।
वहीं AAP को 43.8% वोट और 22 सीट मिली थीं। यानी बीजेपी और आम आदमी पार्टी के वोटबैंक में क़रीब 2 प्रतिशत का ही अंतर रहा था, जबकि कांग्रेस को भले ही दिल्ली में एक भी सीट न मिली हो, लेकिन उसे 6.34% वोट मिले थे, जो पिछली बार से ठीक 2 प्रतिशतज्यादाथे।

ग़ौरतलब है कि भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच वोटों का अंतर भी सिर्फ इतना ही था और भाजपा ने इन्ही 2 प्रतिशत वोटों के दम पर AAP से क़रीब 26 ज्यादा सीटें जीती थीं।

तो सवाल ये है कि क्या कांग्रेस बंगाल में भी कांग्रेस इसी मॉडल पर काम कर रही है और अगर वो कुछ प्रतिशत वोट काटने में भी सफल हुई तो नुक़सान किसका होगा ?

अगर कांग्रेस मुस्लिम बहुल सीटों में अपनी पकड़ थोड़ी भी मजबूत करती है और टीएमसी के वोटबैंक में सेंध लगाती है, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। इसलिए बंगाल की राजनीति में अब असली लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि वोट शेयर की भी हो गई है। और यही छोटेछोटे वोट शेयर्स आने वाले समय में बड़े राजनीतिक बदलाव की वजह बन सकते हैं।

Exit mobile version