नरसिम्हा राव: वो प्रधानमंत्री जिसकी लाश के लिए कांग्रेस ने दरवाजा नहीं खोला, अमित शाह ने संसद में कुरेदा इतिहास का सबसे गहरा जख्म

भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जो न केवल विचलित करती हैं, बल्कि सत्ता के गलियारों में छिपी क्रूरता और गुटबाजी को भी उजागर करती हैं

संसद में अमित शाह ने नरसिम्हा राव की विरासत का जिक्र करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा

भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जो न केवल विचलित करती हैं, बल्कि सत्ता के गलियारों में छिपी क्रूरता और गुटबाजी को भी उजागर करती हैं। हाल ही में संसद के पटल पर गृहमंत्री अमित शाह ने एक ऐसा ही ऐतिहासिक अध्याय खोल दिया, जिसने कांग्रेस पार्टी की कार्यप्रणाली और गांधी परिवार के साथ पी.वी. नरसिम्हा राव के संबंधों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शाह ने लोकसभा में चर्चा के दौरान स्पष्ट रूप से कहा कि नरसिम्हा राव कहने को तो कांग्रेस के प्रधानमंत्री थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें कभी अपना नहीं माना। यह केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं थी, बल्कि उस कड़वे सच का आईना था, जिसे भारतीय लोकतंत्र के सबसे दुखद प्रसंगों में से एक माना जाता है—एक पूर्व प्रधानमंत्री के पार्थिव शरीर का अपमान।

कौन थे पी.वी. नरसिम्हा राव: देश के ‘एक्सिडेंटल’ लेकिन सबसे शक्तिशाली सुधारक

पामुलपर्थी वेंकट नरसिम्हा राव, जिन्हें आज आधुनिक भारत के आर्थिक सुधारों का जनक कहा जाता है, का जन्म 28 जून 1921 को आंध्र प्रदेश के करीमनगर में हुआ था। वह एक बहुभाषी विद्वान थे जिन्हें 17 से अधिक भाषाओं का ज्ञान था। राव का राजनीतिक सफर कांग्रेस की विचारधारा के साथ शुरू हुआ। उन्होंने विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में दशकों तक सेवा की। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों में उन्होंने महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। लेकिन उनकी नियति में कुछ और ही लिखा था। 1991 में राजीव गांधी की असमय हत्या के बाद, जब कांग्रेस गहरे संकट में थी, तब राव को ‘संकटमोचक’ के रूप में आगे लाया गया। वरिष्ठ पत्रकार संजय बारू ने उन्हें देश का पहला ‘एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ कहा है। उन्होंने उस समय बागडोर संभाली जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था और देश को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था। राव ने मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाकर जो उदारीकरण की नीतियां शुरू कीं, उसी ने आज भारत को दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की नींव रखी।

अमित शाह का प्रहार: महिला आरक्षण और राव का अपमान

संसद में महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पर चर्चा के दौरान अमित शाह ने नरसिम्हा राव का जिक्र छेड़कर कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया। शाह ने याद दिलाया कि साल 1992 में यह नरसिम्हा राव ही थे जो 72वां और 73वां संविधान संशोधन लेकर आए, जिसके माध्यम से पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिला। शाह का तर्क था कि जिस नेता ने महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की पहली वास्तविक नींव रखी, कांग्रेस ने उसी नेता का नाम इतिहास के पन्नों से मिटाने की कोशिश की। उन्होंने आरोप लगाया कि गांधी परिवार के प्रति निष्ठा न होने के कारण राव को वह सम्मान कभी नहीं मिला जिसके वह हकदार थे। यह हमला सीधे तौर पर उस मानसिकता पर था जो नेहरू-गांधी परिवार के बाहर के किसी भी कांग्रेसी नेता के योगदान को स्वीकार करने में हिचकिचाती रही है।

सोनिया गांधी से खटास और बाबरी मस्जिद का साया

नरसिम्हा राव और सोनिया गांधी के बीच संबंधों में कड़वाहट की शुरुआत राव के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान ही हो गई थी। गांधी परिवार के वफादारों का मानना था कि राव जानबूझकर सोनिया गांधी को सत्ता के केंद्र से दूर रख रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया। कांग्रेस का एक धड़ा मानता था कि राव ने इसे रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। विनय सीतापति ने अपनी किताब ‘द हाफ लायन’ में जिक्र किया है कि एम्स में इलाज के दौरान जब सोनिया गांधी उनसे मिलने पहुंची थीं, तब राव ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा था कि उन्हें उस गलती के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है जो उन्होंने की ही नहीं। पार्टी के भीतर राव को अलग-थलग करने की प्रक्रिया उनके जीवित रहते ही शुरू हो चुकी थी।

24 अकबर रोड का वो शर्मनाक दिन: बंद दरवाजे और अपमानित शव

23 दिसंबर 2004 को जब एम्स में नरसिम्हा राव ने अंतिम सांस ली, तो किसी ने नहीं सोचा था कि उनके पार्थिव शरीर के साथ राजनीति होगी। राव का परिवार चाहता था कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में हो और उनका एक राष्ट्रीय स्मारक बने, जैसा कि अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों का है। लेकिन कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व ने कथित तौर पर दबाव बनाया कि उनका अंतिम संस्कार हैदराबाद में किया जाए। 24 दिसंबर को जब उनकी शवयात्रा कांग्रेस मुख्यालय (24 अकबर रोड) पहुंची, तो वह हुआ जिसने लोकतंत्र को शर्मसार कर दिया। पार्टी दफ्तर का मुख्य द्वार बंद रखा गया। आधे घंटे तक भारत के पूर्व प्रधानमंत्री का शव कड़ाके की ठंड में बाहर सड़क पर एक गाड़ी में पड़ा रहा। कार्यकर्ताओं और समर्थकों को अंतिम दर्शन तक नहीं करने दिए गए। मीडिया रिपोर्ट्स और चश्मदीदों के अनुसार, सोनिया गांधी उस समय अंदर ही मौजूद थीं, लेकिन दरवाजा नहीं खोला गया। यह संदेश साफ था—गांधी परिवार के विरोध की कीमत मौत के बाद भी चुकानी पड़ती है।

तेलंगाना का अपमान और भाजपा का राजनीतिक दांव

नरसिम्हा राव के अपमान को भाजपा ने हमेशा ‘तेलुगु गौरव’ के साथ जोड़कर पेश किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2015 में दिल्ली के एकता स्थल पर राव का स्मारक बनवाकर उस कमी को पूरा करने की कोशिश की, जिसे कांग्रेस ने नजरअंदाज किया था। अमित शाह का संसद में दिया गया भाषण इसी रणनीति का हिस्सा था कि कैसे एक दक्षिण भारतीय नेता, जिसने देश को दिवालिया होने से बचाया, उसे कांग्रेस ने अपनी यादों से बेदखल कर दिया। राव के बेटे प्रभाकर ने भी बाद के साक्षात्कारों में दर्द साझा किया था कि कैसे उनकी इच्छा के विरुद्ध शव को दिल्ली से बाहर ले जाने के लिए मजबूर किया गया ताकि दिल्ली में उनकी कोई स्थायी पहचान न रह सके।

इतिहास की अदालत में नरसिम्हा राव

पी.वी. नरसिम्हा राव भारतीय राजनीति के वो शिखर पुरुष थे जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी देश की दिशा बदली। चाहे वो परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाना हो, इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करना हो या फिर ‘लुक ईस्ट’ पॉलिसी की शुरुआत—राव के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। अमित शाह ने संसद में नरसिम्हा राव का ‘आईना’ दिखाकर कांग्रेस को केवल एक नेता की याद नहीं दिलाई, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति पर प्रहार किया है जो वंशवाद के आगे योग्यता को कुचलने का आरोप झेलती आई है। नरसिम्हा राव की कहानी यह सिखाती है कि राजनीति में कृतज्ञता की उम्र बहुत छोटी होती है, लेकिन इतिहास अंततः हर सच को बाहर ले ही आता है।

Exit mobile version