राघव चड्डा ने राज्यसभा में उपनेता पद से हटाए जाने के एक दिन बाद अपनी ही पार्टी आम आदमी पार्टी (AAP) पर तीखा हमला बोला है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी के इस फैसले के बाद चड्ढा ने साफ कहा कि संसद में उनकी खामोशी को उनकी हार समझने की गलती न की जाए। कभी केजरीवाल के बेहद करीबी माने जाने वाले चड्ढा ने बिना किसी का नाम लिए पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़े किए, खासतौर पर उस फैसले के बाद जिसमें AAP ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर उन्हें बोलने का समय न देने की बात कही थी।
सोशल मीडिया पर चड्ढा ने पुरानी संसद भवन की पृष्ठभूमि में एक वीडियो साझा किया, जिसका शीर्षक था “Silenced, Not Defeated” यानी “चुप कराया गया हूं, हारा नहीं हूं।” इस वीडियो को उन्होंने “आम आदमी के लिए संदेश” बताया। वीडियो में उन्होंने कहा कि जब भी उन्हें संसद में बोलने का मौका मिला, उन्होंने जनता से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने सवाल किया कि क्या जनता के मुद्दे उठाना कोई अपराध है? क्या उन्होंने कोई गलती की है या कुछ गलत किया है?
चड्ढा ने आरोप लगाया कि AAP ने राज्यसभा सचिवालय को यह तक लिख दिया कि उन्हें संसद में बोलने से रोका जाए। उन्होंने दोहराया कि पार्टी ने औपचारिक रूप से यह कहा है कि उन्हें बोलने का मौका न दिया जाए। इस पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जिन लोगों ने आज उनका बोलने का अधिकार छीना है, उन्होंने उन्हें चुप तो करा दिया है, लेकिन इसे उनकी हार नहीं समझा जाना चाहिए। उन्होंने अपने अंदाज में कहा कि वह एक ऐसी नदी हैं, जो समय आने पर बाढ़ बन जाती है।
उन्होंने यह भी कहा कि संसद में उनकी प्राथमिकता हमेशा आम लोगों से जुड़े मुद्दे रहे हैं। चाहे वह हवाई अड्डों पर महंगे खाने का मामला हो, डिलीवरी करने वाले गिग वर्कर्स की समस्याएं हों, या फिर खाद्य पदार्थों में मिलावट, टोल टैक्स और बैंक चार्जेस जैसे मुद्दे—उन्होंने हर बार जनता की आवाज उठाई। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कंटेंट क्रिएटर्स पर टैक्स के बोझ, मोबाइल रिचार्ज की बढ़ती लागत और टेलीकॉम कंपनियों की नीतियों जैसे मुद्दों को भी संसद में उठाया।
चड्ढा ने कहा कि वह बार-बार यह सवाल उठाते रहे हैं कि आखिर टेलीकॉम कंपनियां लोगों को 12 महीनों में 13 बार रिचार्ज करने के लिए क्यों मजबूर करती हैं और डेटा रोलओवर की सुविधा क्यों नहीं देतीं। उन्होंने कहा कि उन्होंने जो भी मुद्दे उठाए, उनसे आम लोगों को फायदा हुआ, लेकिन यह समझ से परे है कि इससे AAP को क्या नुकसान हुआ। उन्होंने यह भी सवाल किया कि आखिर कोई उन्हें बोलने से क्यों रोकना चाहता है और उनकी आवाज को दबाने की कोशिश क्यों की जा रही है।
उन्होंने जनता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जब भी उन्होंने लोगों के मुद्दे उठाए, जनता ने उन्हें समर्थन दिया, सराहा और प्रोत्साहित किया। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इसी तरह उनका साथ देते रहें और उनका हाथ न छोड़ें। उन्होंने कहा कि वह जनता के साथ हैं और जनता के लिए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम से एक दिन पहले AAP ने आधिकारिक तौर पर राज्यसभा सचिवालय को सूचित किया था कि Ashok Kumar Mittal को राज्यसभा में उपनेता बनाया जाएगा, जो चड्ढा की जगह लेंगे। यह फैसला पार्टी के अंदर एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। हाल के वर्षों में चड्ढा ने संसद में “जनता के मुद्दे” उठाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी, जिसमें गिग वर्कर्स के अधिकार, मोबाइल रिचार्ज की बढ़ती कीमतें, पितृत्व अवकाश और एयरपोर्ट पर खाने-पीने की कीमतों जैसे मुद्दे शामिल थे।
चड्ढा का राजनीतिक सफर AAP के उभार के साथ ही शुरू हुआ था। अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में चले जनलोकपाल आंदोलन से अरविंद केजरीवाल का उदय हुआ और उसी दौर में चड्ढा भी राजनीति में सक्रिय हुए। AAP के विस्तार और दिल्ली में लगातार तीन बार सरकार बनाने के साथ-साथ चड्ढा का कद भी पार्टी में बढ़ता गया। वह केजरीवाल के भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल हो गए और पार्टी का एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।
जब AAP ने दिल्ली से बाहर विस्तार किया और पंजाब में बड़ी जीत हासिल की, तब चड्ढा को महत्वपूर्ण संगठनात्मक जिम्मेदारियां सौंपी गईं। उन्होंने पार्टी के विस्तार और सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई, जहां भगवंत मान के नेतृत्व में सरकार बनी। एक चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के नाते चड्ढा खुद को “अरविंद केजरीवाल स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स” का उत्पाद बताते रहे हैं।
हालांकि, अब पार्टी के भीतर उनके खिलाफ आवाजें भी उठने लगी हैं। AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने चड्ढा के वीडियो के जवाब में सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने फिल्म शोले का मशहूर डायलॉग “जो डर गया, समझो मर गया” का इस्तेमाल किया। इसे चड्ढा पर सीधा तंज माना जा रहा है।
पार्टी के आईटी सेल प्रमुख अनुराग ढंडा ने भी चड्ढा की आलोचना करते हुए कहा कि संसद में पार्टी को सीमित समय मिलता है और उसमें देश को बचाने जैसे बड़े मुद्दों पर बात करनी चाहिए, न कि एयरपोर्ट के समोसे सस्ते कराने जैसे मुद्दों पर। उन्होंने चड्ढा पर यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने कई अहम राष्ट्रीय मुद्दों पर चुप्पी साधे रखी।
धांडा ने आरोप लगाया कि चड्ढा ने गुजरात में पार्टी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, पश्चिम बंगाल में वोटिंग अधिकारों के मुद्दे और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव जैसे मामलों पर कोई ठोस रुख नहीं अपनाया। उन्होंने यह भी कहा कि चड्ढा कई बार पार्टी के वॉकआउट के दौरान सदन में ही बैठे रहे, जो पार्टी लाइन के खिलाफ था।
उन्होंने चड्ढा पर निशाना साधते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में वह डरने लगे हैं और नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलने में हिचकिचाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जो व्यक्ति डरता है, वह देश के लिए कैसे लड़ेगा। उनके बयान का अंत भी उसी तंज के साथ हुआ—“जो डर गया…”
इस पूरे घटनाक्रम ने AAP के अंदर चल रहे आंतरिक मतभेदों को उजागर कर दिया है। एक तरफ चड्ढा खुद को जनता की आवाज के रूप में पेश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व और अन्य नेता उनके रुख और प्राथमिकताओं पर सवाल उठा रहे हैं। यह विवाद न सिर्फ AAP की आंतरिक राजनीति को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर मतभेद किस हद तक बढ़ चुके हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह टकराव किस दिशा में जाता है और इसका पार्टी की राजनीति पर क्या असर पड़ता है।
