भारतीय संसदीय इतिहास में एक ऐसा मोड़ आया है जिसने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। लोकसभा में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ यानी महिला आरक्षण बिल के गिर जाने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए इसे ‘करोड़ों भारतीय महिलाओं के साथ विश्वासघात’ करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस एक तरफ महिला सशक्तिकरण का ढोंग करती है, वहीं दूसरी तरफ सदन में ऐतिहासिक सुधारों की राह में रोड़े अटकाती है। यह विवाद अब केवल एक विधेयक की हार का नहीं, बल्कि भारत की आधी आबादी के राजनीतिक भविष्य और उनकी आकांक्षाओं के अपमान का मुद्दा बन गया है।
स्मृति ईरानी का पलटवार: सशक्तिकरण बनाम वोट बैंक की राजनीति
लोकसभा में बिल के गिरने के ठीक एक दिन बाद, स्मृति ईरानी ने भाजपा मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कांग्रेस के ‘दोहरे चरित्र’ को बेनकाब किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह बिल कभी भी चुनावी अंकगणित का हिस्सा नहीं था, बल्कि उन ‘साधारण महिलाओं’ को सशक्त बनाने का एक माध्यम था जो राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती हैं। ईरानी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए कहा कि 2014 से देश की महिलाओं ने लगातार मोदी सरकार का साथ दिया है, क्योंकि वे जानती हैं कि कौन वास्तव में उनके लिए काम कर रहा है। उन्होंने विपक्ष के उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें इस बिल को केवल वोट बैंक की कवायद बताया जा रहा था।
प्रियंका गांधी पर सीधा निशाना: विशेषाधिकार बनाम जमीनी संघर्ष
स्मृति ईरानी ने अपने संबोधन में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पर भी तीखा तंज कसा। ईरानी ने कहा कि जो लोग राजनीतिक विशेषाधिकारों (Privilege) के साथ पैदा हुए हैं, वे शायद कभी यह समझ ही नहीं पाएंगे कि एक जमीनी कार्यकर्ता महिला के लिए विधानमंडल में पहुंचना कितनी बड़ी बात होती है। प्रियंका गांधी ने बिल की हार को सरकार के लिए ‘काला दिन’ बताया था और कहा था कि महिलाएं अब जागरूक हो चुकी हैं और वे मीडिया या राजनीति द्वारा गढ़ी गई कहानियों से प्रभावित नहीं होंगी। इसके जवाब में ईरानी ने कहा कि असली ‘काला दिन’ वह था जब कांग्रेस ने संसद के अंदर बिल को गिराने के बाद जश्न मनाया, जिससे उनकी कथनी और करनी का अंतर साफ झलक गया।
संसदीय आंकड़ों का खेल: क्यों गिरा ऐतिहासिक बिल?
संसद के भीतर इस बिल का गिरना किसी नाटकीय घटनाक्रम से कम नहीं था। संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित करने के लिए सदन में उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी। मतदान के समय कुल 528 सदस्य उपस्थित थे, जिनमें से 298 ने पक्ष में मतदान किया और 230 ने इसके विरोध में। पारित होने के लिए 352 मतों की आवश्यकता थी, जिससे यह बिल बहुमत के बावजूद संवैधानिक मापदंडों को पूरा न कर पाने के कारण गिर गया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा बिल की हार की पुष्टि के बाद, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने संकेत दिया कि सरकार फिलहाल इससे संबंधित अन्य विधेयकों पर आगे नहीं बढ़ेगी।
कांग्रेस का रुख: समर्थन का दावा और प्रक्रिया पर आपत्ति
दूसरी ओर, राहुल गांधी समेत कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि वे सैद्धांतिक रूप से महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन वे इसे ‘परिसीमन’ (Delimitation) के साथ जोड़ने का विरोध करते हैं। विपक्ष का मानना है कि परिसीमन और जनगणना के साथ आरक्षण को जोड़ना इसे अनिश्चित काल के लिए टालने की एक चाल है। हालांकि, गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि विपक्ष ने केवल बहानेबाजी की और वास्तव में वे नहीं चाहते थे कि महिलाएं निर्णायक भूमिका में आएं। उन्होंने सीधे तौर पर कांग्रेस और उसके सहयोगियों को इस विफलता का जिम्मेदार ठहराया।
शासन के रिकॉर्ड पर सवाल: शौचालय से बैंकिंग तक का सफर
स्मृति ईरानी ने कांग्रेस के शासनकाल की तुलना वर्तमान सरकार से करते हुए कहा कि पिछले दशकों में महिलाओं को बुनियादी गरिमा तक नहीं दी गई। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे करोड़ों महिलाओं को शौचालय जैसी प्राथमिक सुविधा के लिए तरसना पड़ता था और बैंकिंग सेवाओं तक उनकी पहुंच नहीं थी। उन्होंने भाजपा के ‘जेंडर बजटिंग’ और महिला-केंद्रित योजनाओं को एक व्यवस्थित सुधार बताया। ईरानी के अनुसार, 33 प्रतिशत आरक्षण उसी कड़ी का एक बड़ा हिस्सा था जिसे विपक्ष ने अपनी संकीर्ण राजनीति की भेंट चढ़ा दिया।
आगे की राह और राजनीतिक परिणाम
महिला आरक्षण बिल का गिरना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। जहां एक ओर भाजपा इसे ‘विपक्ष का महिला विरोधी चेहरा’ बताकर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है, वहीं विपक्ष इसे ‘सरकार की विफलता’ के रूप में पेश कर रहा है। लेकिन इस राजनीतिक खींचतान के बीच वह करोड़ों महिलाएं फिर से इंतजार की कतार में खड़ी हो गई हैं, जो संसद और विधानसभाओं में अपनी आवाज बुलंद करना चाहती थीं। 2026 के इस घटनाक्रम ने देश की राजनीति में एक गहरी लकीर खींच दी है, जिसके परिणाम आने वाले चुनावों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलेंगे।
