आस्था के साथ ‘जहरीला’ खिलवाड़: वैष्णो देवी के खजाने में मिला नकली चांदी का अंबार, 550 करोड़ की उम्मीद और 30 करोड़ की कड़वी सच्चाई

जम्मू की त्रिकुटा पहाड़ियों पर विराजने वाली माता वैष्णो देवी के प्रति करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा है। भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार माता के चरणों में सोने-चांदी के सिक्के, छत्र और आभूषण अर्पित करते हैं

वैष्णो देवी के खजाने में मिला नकली चांदी का अंबार

जम्मू की त्रिकुटा पहाड़ियों पर विराजने वाली माता वैष्णो देवी के प्रति करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा है। भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार माता के चरणों में सोने-चांदी के सिक्के, छत्र और आभूषण अर्पित करते हैं। लेकिन हाल ही में जो खुलासा हुआ है, उसने न केवल श्राइन बोर्ड के होश उड़ा दिए हैं, बल्कि उन करोड़ों भक्तों के दिल को भी चोट पहुँचाई है जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से माता के लिए ‘चांदी’ खरीदी थी। यह मामला केवल एक वित्तीय घोटाले का नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी साजिश की ओर इशारा करता है जहाँ आस्था को जहर में घोलकर बेचा जा रहा है। सरकारी टकसाल (Mint) की जांच रिपोर्ट ने एक ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है जो कटरा की गलियों में चांदी के नाम पर कैंसर बांट रहा था।

550 करोड़ का सपना और 30 करोड़ की हकीकत: उम्मीदों पर फिरा पानी

माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के पास दशकों से भक्तों द्वारा चढ़ाया गया भारी मात्रा में सोना और चांदी जमा होता रहता है। हाल ही में बोर्ड ने तय किया कि मंदिर के खजाने में मौजूद करीब 20 टन चांदी को गलाकर उसे सुरक्षित ईंटों या बिस्कुट के रूप में रखा जाए। बाजार भाव के हिसाब से श्राइन बोर्ड को उम्मीद थी कि इस 20 टन वजन की कीमत लगभग 500 से 550 करोड़ रुपये के बीच होगी। इस भारी-भरकम खजाने को जब सरकारी टकसाल भेजा गया, तो अधिकारियों को लगा था कि यह देश के सबसे समृद्ध मंदिरों में से एक का शुद्ध चढ़ावा है। लेकिन जैसे ही जांच शुरू हुई, सरकारी टकसाल के लैब में सन्नाटा पसर गया। जिस चांदी को 550 करोड़ का अनमोल खजाना माना जा रहा था, उसकी असलियत केवल 30 करोड़ रुपये पर आकर सिमट गई।

चांदी नहीं, लोहे और ‘कैडमियम’ का कचरा: टकसाल में मचा हड़कंप

सरकारी टकसाल के विशेषज्ञों ने जब 20 टन के उस जखीरे की रासायनिक जांच की, तो परिणाम डराने वाले थे। रिपोर्ट में सामने आया कि भक्तों द्वारा चढ़ाई गई ‘चांदी’ में असली चांदी का अंश केवल 5 से 6 प्रतिशत ही था। बाकी का हिस्सा साधारण लोहा और अत्यधिक जहरीली धातु ‘कैडमियम’ था। इसे आसान भाषा में समझें तो 70 किलो के एक बड़े लॉट को गलाने पर शुद्ध चांदी महज 3 किलो ही प्राप्त हुई। यह शुद्धता का इतना निम्न स्तर था जिसे देखकर टकसाल के अधिकारी भी दंग रह गए। जांच में पाया गया कि नकली चांदी के इन आभूषणों और सिक्कों को बनाने के लिए लोहे के ऊपर चांदी की बेहद पतली परत चढ़ाई गई थी, और उन्हें वजन देने के लिए कैडमियम का इस्तेमाल किया गया था।

कैडमियम का जानलेवा खतरा: जब कर्मचारियों ने काम करने से किया मना

इस घोटाले का सबसे काला और डरावना पहलू वित्तीय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ा है। कैडमियम एक ऐसी धातु है जिसे ‘जहरीला कचरा’ माना जाता है। जब सरकारी टकसाल के कर्मचारियों ने इस नकली चांदी को गलाने की प्रक्रिया शुरू की, तो उन्हें तुरंत खतरे का अहसास हो गया। कैडमियम को गर्म करने पर जो धुआं निकलता है, वह सीधे तौर पर कैंसर का कारण बनता है। यह धुआं इंसान के फेफड़ों और किडनी को हमेशा के लिए खराब कर सकता है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि टकसाल के कर्मचारियों ने अपनी जान जोखिम में डालने से साफ मना कर दिया। इस ‘जहरीली चांदी’ को प्रोसेस करने के लिए टकसाल प्रबंधन को विशेष रूप से 25 लाख रुपये खर्च करके सेंसर और हाई-टेक सुरक्षा उपकरण मंगवाने पड़े, ताकि कर्मचारियों को कैंसरकारी धुएं से बचाया जा सके।

तिरुपति-सिद्धिविनायक से अलग है यह पैटर्न: कटरा में फैला है जाल?

जांच रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला तुलनात्मक अध्ययन सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह की मिलावट या नकली चढ़ावे की समस्या तिरुपति बालाजी या मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर के चढ़ावे में नहीं देखी गई है। वहां चढ़ावे की शुद्धता का स्तर काफी ऊंचा रहता है। इससे जांच अधिकारियों और विशेषज्ञों का यह मानना है कि नकली चांदी का यह संगठित खेल विशेष रूप से कटरा और वैष्णो देवी मार्ग के आसपास ही फल-फूल रहा है। यह अंदेशा जताया जा रहा है कि कटरा के स्थानीय बाजारों में कुछ ऐसे दुकानदार या गिरोह सक्रिय हैं जो भोले-भाले भक्तों को कम दाम या शुद्धता के नाम पर लोहा और कैडमियम से बने सिक्के और छत्र बेच देते हैं। भक्त उसे माता का प्रसाद समझकर मंदिर में चढ़ा देते हैं, यह जाने बिना कि वे अनजाने में मंदिर के खजाने में ‘जहर’ जमा कर रहे हैं।

भक्तों के साथ विश्वासघात: आस्था की आड़ में व्यापार

वैष्णो देवी में हर साल लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। कई भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर चांदी का छत्र या मुकुट चढ़ाते हैं। बाजार में ठगों ने इस आस्था को ही अपना शिकार बना लिया है। यह खुलासा उन लाखों लोगों के लिए एक चेतावनी है जो कटरा के बाजारों से बिना किसी हॉलमार्क या भरोसेमंद जांच के कीमती धातुएं खरीदते हैं। ₹550 करोड़ के खजाने का महज ₹30 करोड़ रह जाना यह साबित करता है कि पिछले कई वर्षों से यह खेल बड़े पैमाने पर चल रहा था। यह केवल श्राइन बोर्ड को हुआ वित्तीय नुकसान नहीं है, बल्कि उस पवित्र चढ़ावे का अपमान है जो एक गरीब भक्त अपनी गाढ़ी कमाई से माता के चरणों में अर्पित करता है।

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