बेंगलुरु टाउनहॉल में मुस्लिम संगठनों का सम्मेलन: कांग्रेस पर लगाया ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का आरोप, सरकार के सामने रखीं 10 प्रमुख मांगें

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के ऐतिहासिक टाउनहॉल (Town Hall) में 'फेडरेशन ऑफ कर्नाटक मुस्लिम ऑर्गनाइजेशन' के बैनर तले करीब 48 मुस्लिम संगठनों का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया।

बेंगलुरु टाउनहॉल में मुस्लिम संगठनों का बड़ा सम्मेलन

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के ऐतिहासिक टाउनहॉल (Town Hall) में ‘फेडरेशन ऑफ कर्नाटक मुस्लिम ऑर्गनाइजेशन’ के बैनर तले करीब 48 मुस्लिम संगठनों का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में एक 75 पन्नों की रिपोर्ट जारी की गई, जिसका शीर्षक था— “कांग्रेस सरकार के वादे, डिलीवरी में कमियां और मांगों का चार्टर”। इस सम्मेलन में मुस्लिम नेताओं ने राज्य की सिद्दारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पर विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान किए गए चुनावी वादों को पूरा न करने और ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ (Soft Hindutva) की राह पर चलने का सीधा आरोप लगाया है। इस सम्मेलन के दौरान मुस्लिम संगठनों द्वारा सरकार के सामने जो मांगें रखी गई हैं, वे राज्य की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर रही हैं।

मुस्लिम संगठनों द्वारा रखी गई मुख्य मांगें और उनकी विस्तृत व्याख्या:

1. 2B आरक्षण की बहाली और कोटे में वृद्धि

संगठनों की सबसे बड़ी मांग है कि मुसलमानों के लिए 4% पिछड़ा वर्ग श्रेणी 2B आरक्षण को पूरी तरह से कानूनी रूप से बहाल किया जाए और इसे और मजबूत किया जाए। इसके साथ ही, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अनुभवजन्य डेटा पेश करते हुए इस कोटे को 4% से बढ़ाकर 8% करने की मांग उठाई है।

2. जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व

रिपोर्ट में शिकायत की गई है कि 224 सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा में मुस्लिम विधायकों का प्रतिनिधित्व केवल 4.4% है, जबकि राज्य में उनकी आबादी करीब 13% है। संगठनों ने मांग की है कि विधान परिषद (Legislative Council) और स्थानीय निकाय चुनावों में मुस्लिम उम्मीदवारों को उनकी आबादी के अनुपात में टिकट और प्रतिनिधित्व दिया जाए।

3. अल्पसंख्यक कल्याण के लिए ₹10,000 करोड़ का रोडमैप

सम्मेलन में आरोप लगाया गया कि कांग्रेस ने चुनाव से पहले अल्पसंख्यकों के लिए जिस बजट का वादा किया था, उसे पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। उन्होंने मांग की कि अल्पसंख्यक कल्याण और विकास के लिए सालाना ₹10,000 करोड़ के बजट आवंटन का एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया जाए।

4. वक्फ संपत्तियों का संरक्षण और कानूनी मिशन

संगठनों ने राज्य में वक्फ संपत्तियों (Waqf Properties) पर अवैध कब्जों और उनके कम उपयोग पर चिंता जताई। उन्होंने मांग की कि वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा के लिए मजबूत कानूनी तंत्र बनाया जाए और एक समर्पित ‘वक्फ भूमि बहाली और मुकदमेबाजी मिशन’ (Waqf Land Recovery and Litigation Mission) शुरू किया जाए।

5. मुस्लिम छात्रों के लिए शैक्षणिक सुविधाएं और हिजाब पर औपचारिक आदेश

यद्यपि सरकार ने हिजाब पर लगे प्रतिबंध को हटाने के संकेत दिए हैं, लेकिन संगठनों ने मांग की है कि शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पहनने की अनुमति देने के लिए एक औपचारिक और स्पष्ट विधायी आदेश जारी किया जाए। साथ ही, अल्पसंख्यक छात्रों के लिए छात्रवृत्ति (Scholarships) और हॉस्टल सुविधाओं का विस्तार किया जाए।

6. गोहत्या निषेध कानून को वापस लेना

भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान लागू किए गए ‘कर्नाटक मवेशी वध रोकथाम और संरक्षण अधिनियम’ को तुरंत वापस लेने या उसमें संशोधन की मांग की गई है। संगठनों का तर्क है कि इस कानून के कारण किसानों, मांस व्यापारियों, चमड़ा श्रमिकों और ट्रांसपोर्टरों की आजीविका बुरी तरह प्रभावित हो रही है और गो-सतर्कता (Cattle Vigilantism) के नाम पर उत्पीड़न बढ़ा है।

7. जबरन धर्मांतरण विरोधी कानून को निरस्त करना

पिछली सरकार द्वारा लाए गए ‘धर्मांतरण विरोधी कानून’ (Anti-Conversion Law) को तुरंत निरस्त करने की मांग की गई है। संगठनों का कहना है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर चोट करता है।

8. मॉब लिंचिंग और नफरती भाषणों के खिलाफ सख्त कानून

सम्मेलन में एक और प्रमुख मांग ‘कर्नाटक एंटी-लिंचिंग कानून’ (Anti-Lynching Law) बनाने की रही। इसके साथ ही, नफरत फैलाने वाले भाषणों (Hate Speech) की निगरानी के लिए गृह विभाग के तहत एक वैधानिक प्राधिकरण (Statutory Authority) बनाने और स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज करने की मांग की गई है।

9. मतदाता सूची संशोधन (SIR) प्रक्रिया पर टास्क फोर्स

आगामी विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को लेकर मुस्लिम संगठनों ने आशंका जताई है कि इसके जरिए वास्तविक मतदाताओं के नाम काटे जा सकते हैं। उन्होंने मांग की कि इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक राज्य स्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया जाए ताकि कमजोर और अल्पसंख्यक समुदायों के मतदाताओं का नाम सूची से गायब न हो।

10. जाति जनगणना (Caste Census) रिपोर्ट को लागू करना

संगठनों ने मांग की है कि कर्नाटक के बहुप्रतीक्षित सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण (जाति जनगणना) के आंकड़ों को तुरंत जारी और लागू किया जाए। उनका मानना है कि इस डेटा के आने से मुस्लिम समुदाय को उनकी आबादी के अनुसार आनुपातिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय (Social Justice) मिल सकेगा। ध्यान दें कि जाति जनगणना की मांग केवल हिंदुओं के लिए नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को आंकने के लिए की जा रही है।

विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया

बेंगलुरु में मुस्लिम संगठनों के सम्मेलन और उनकी 10 मांगों के खिलाफ उठ रहे देशव्यापी विरोध का मुख्य सार यह है कि आलोचक और विपक्षी दल इसे कांग्रेस की चरम तुष्टिकरण और वोट-बैंक की राजनीति मान रहे हैं। विरोधियों का तर्क है कि ‘मुसलमानों के लिए अलग बजट’, ‘आबादी के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व’ और ‘2B आरक्षण को 4% से बढ़ाकर 8% करने’ जैसी मांगें 1947 के विभाजन से पहले की मुस्लिम लीग की विभाजनकारी मानसिकता को दर्शाती हैं, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और बहुसंख्यक हिंदू समाज की भावनाओं के खिलाफ हैं। इसके अतिरिक्त, गोहत्या निषेध और धर्मांतरण विरोधी कानूनों को हटाने की मांग को हिंदुओं की धार्मिक आस्था पर चोट माना जा रहा है, जबकि वक्फ संपत्तियों के लिए विशेष कानूनी मिशन और अलग एंटी-लिंचिंग अथॉरिटी की मांगों को देश के सामान्य कानून के ऊपर एक समानांतर व्यवस्था खड़ी करने और पुलिस प्रशासन को कमजोर करने की कोशिश बताया जा रहा है। आलोचकों का यह भी आरोप है कि कांग्रेस केवल हिंदू समाज को बांटने के लिए जाति जनगणना का दोहरा मापदंड अपना रही है, और हालिया उपचुनावों में कमजोर प्रदर्शन के बाद वह सत्ता में बने रहने के लिए मुस्लिम संगठनों की इस राजनीतिक ब्लैकमेलिंग और असंवैधानिक शर्तों के आगे पूरी तरह नतमस्तक हो चुकी है।

Exit mobile version