30 अप्रैल 2026 को जब पाकिस्तान ने चीन के सान्या शहर में अपनी पहली हैंगोर-क्लास पनडुब्बी PNS Hangor को नौसेना में शामिल किया, तो इसे पाकिस्तान की बड़ी सैन्य उपलब्धि के रूप में पेश किया गया। इस समारोह में पाकिस्तान के राष्ट्रपति Asif Ali Zardari मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। नौसेना प्रमुख ने इसे समुद्री सुरक्षा और ताकत बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम बताया।
पाकिस्तान इसे अपने इतिहास के सबसे बड़े रक्षा सौदों में से एक मान रहा है। लेकिन इस समारोह के पीछे एक बड़ा सवाल भी छिपा हुआ है — चीन में बनी पनडुब्बियों का काम तो आगे बढ़ रहा है, लेकिन कराची में बनने वाली चार पनडुब्बियों की स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है।
कराची शिपयार्ड के सामने बड़ी चुनौती
पाकिस्तान का Karachi Shipyard and Engineering Works (KSEW) पहले भी पनडुब्बी बना चुका है। उसने 2008 में PNS Hamza नाम की पनडुब्बी तैयार की थी, जो दक्षिण एशिया की पहली ऐसी पारंपरिक पनडुब्बी थी जिसमें एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक थी।
लेकिन हैंगोर-क्लास पनडुब्बियाँ उससे कहीं ज्यादा बड़ी और आधुनिक हैं।
- अगोस्ता 90B पनडुब्बी छोटी थी,
- जबकि हैंगोर क्लास करीब 2800 टन वज़न वाली भारी पनडुब्बी है,
- इसमें नया इंजन, नई लड़ाकू प्रणाली और ज्यादा आधुनिक हथियार लगाए गए हैं।
इसलिए पहले का अनुभव मदद तो करता है, लेकिन नई तकनीक सीखने की चुनौती अभी भी बहुत बड़ी है।
नई तकनीक और भारी निवेश
KSEW ने 2017 में नॉर्वे की कंपनी TTS Group के साथ एक बड़ा समझौता किया था। इसके तहत शिपयार्ड में आधुनिक जहाज उठाने वाली प्रणाली (Ship Lift System), रेल सिस्टम और बड़े निर्माण शेड बनाए गए।
पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, पनडुब्बियों के निर्माण के लिए अलग से विशेष सुविधाएँ तैयार की गईं।
चीन ने पाकिस्तान को प्रशिक्षण देने के लिए अपनी Type 039A Yuan-class submarine पनडुब्बी भी लीज पर दी, ताकि पाकिस्तानी नौसेना और इंजीनियर नई तकनीक सीख सकें।
परियोजना में देरी
कराची में बनने वाली पहली हैंगोर पनडुब्बी के लिए स्टील कटिंग समारोह दिसंबर 2021 में हुआ, जबकि यह काम अक्टूबर 2020 में शुरू होना था।
इसके बाद छठी पनडुब्बी की कील फरवरी 2025 में रखी गई।
अब माना जा रहा है कि कराची में बनने वाली पनडुब्बियाँ शुरुआती योजना से काफी पीछे चल रही हैं और संभवतः 2030 के दशक की शुरुआत तक ही पूरी हो पाएँगी।
देरी के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं:
- जर्मन इंजन की जगह चीनी इंजन लगाने का फैसला,
- कोविड-19 महामारी,
- और ज्यादा आधुनिक पनडुब्बी बनाने की तकनीकी कठिनाइयाँ।
तकनीक ट्रांसफर पर सवाल
पाकिस्तानी इंजीनियरों को पनडुब्बी असेंबली, वेल्डिंग और कुछ सिस्टम इंटीग्रेशन की ट्रेनिंग दी गई है। लेकिन महत्वपूर्ण तकनीकें जैसे:
- प्रोपल्शन सॉफ्टवेयर,
- सोनार सिस्टम,
- और AIP तकनीक
अब भी चीन के नियंत्रण में बताई जाती हैं।
यानी पाकिस्तान फिलहाल पूरी तरह खुद पनडुब्बी डिजाइन करने की स्थिति में नहीं दिखता। अभी तक यह साफ नहीं है कि चीन पाकिस्तान को वास्तविक तकनीकी ज्ञान दे रहा है या सिर्फ अपने डिजाइन की पनडुब्बियाँ जोड़ने और बनाने की ट्रेनिंग दे रहा है।
PNS Hangor की कमीशनिंग का असली मतलब
PNS Hangor का नौसेना में शामिल होना पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है।
इसके अलावा चीन में बनी बाकी तीन पनडुब्बियाँ:
- PNS Shushuk
- PNS Mangro
- PNS Ghazi
भी समुद्री परीक्षण के अंतिम चरण में हैं और संभव है कि 2026 के भीतर ही पाकिस्तान नौसेना में शामिल हो जाएँ।
अगर ऐसा होता है, तो पाकिस्तान के पास AIP तकनीक वाली पनडुब्बियों की संख्या 3 से बढ़कर 7 हो जाएगी, जो उसकी समुद्री ताकत में बड़ा इजाफा होगा।
लेकिन कराची शिपयार्ड का कार्यक्रम अब भी कई सवालों के घेरे में है:
- निर्माण में देरी,
- तकनीकी निर्भरता,
- और असली तकनीक ट्रांसफर की कमी
ऐसे मुद्दे हैं जिनका जवाब अभी तक साफ नहीं है। यही वे सवाल हैं जो PNS Hangor के भव्य समारोह के बावजूद अनसुलझे रह गए।
