बंगाल के नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने अपनी पहली ही कैबिनेट मीटिंग में कई बड़े फैसले लिए। सोमवार को नबन्ना भवन की 14वीं मंजिल पर अपनी पहली कैबिनेट बैठक को लीड करते हुए उन्होने “सभी के लिए काम करने” का वादा किया।
लेकिन बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने के लिए BSF को जगह देने की मंजूरी का फैसला सबसे अहम है।मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बांग्लादेश के साथ सीमा पर बाड़ लगाने के लिए सीमा सुरक्षा बल (BSF) को 600 एकड़ जमीन हस्तांतरित करने की औपचारिक मंजूरी दी। ये ज़मीन 45 दिनों अंदर BSF को सौंपे जाने के निर्देश दिए गए हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्य सचिव और भूमि एवं राजस्व विभाग के सचिव को इस जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेजी से पूरा कराने की जिम्मेदारी दी गई है। इस कदम का उद्देश्य सीमा पर मौजूद महत्वपूर्ण कमियों को दूर करना, अवैध घुसपैठ पर अंकुश लगाना और सीमा पार तस्करी को रोकना है।पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा सीमा पर बाड़बंदी के लिए 45 दिनों के भीतर BSF को जमीन हस्तांतरित करने का कथित फैसला भारत के सबसे लंबे समय से चले आ रहे राष्ट्रीय सुरक्षा विवादों में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
वर्षों से सीमा सुरक्षा बल (BSF) लगातार भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी में हो रही देरी को लेकर चिंता जताता रहा है, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में, जहां सीमा के बड़े हिस्से से भारी मात्रा में घुसपैठ, पशु तस्करी, मानव तस्करी और अवैध प्रवासन की खबरें सामने आती रही हैं। भारत, बांग्लादेश के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है, जो दूरी के लिहाज़ से भारत की किसी भी पड़ोसी देश के साथ सबसे लंबी जमीनी सीमा रेखा है। इसमें से लगभग 2,217 किलोमीटर सीमा अकेले पश्चिम बंगाल में आती है, जिससे यह सुरक्षा और जनसांख्यिकीय दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण सेक्टर बन जाता है।गृह मंत्रालय और BSF द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सीमा का एक बड़ा हिस्सा पहले ही फेंसिंग के दायरे में लाया जा चुका है। लेकिन कई सौ किलोमीटर क्षेत्र – विशेष रूप से नदी वाले और घनी आबादी वाले पश्चिम बंगाल के हिस्सों में कोई बाड़ नहीं है।
लेकिन इसके पीछे केवल भौगोलिक कारण नहीं थे।
ममता सरकार में BSF ने बाड़बंदी के लिए सरकार से ज़मीन चिन्हित करने और सौंपने की कई बार अपील की थी, लेकिन कई साल बीतने और कई मामलों में तो भुगतान होने के बावजूद ज़मीन सौंपी नहीं गई। राजनीतिक विरोध, स्थानीय प्रदर्शन और ममता बनर्जी सरकार के दौरान प्रशासनिक देरी के चलते बाड़बंदी की परियोजना पूरी नहीं हो सकी और बांग्लादेश सीमा के आसपास घुसपैठ और तस्करी नेटवर्क के लगातार फैलने के बावजूद बाड़बंदी को लगातार टाला गया।
BSF ने बीते एक दशक में सीमा से पशु तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, नकली भारतीय मुद्रा नेटवर्क, अवैध प्रवासन और मानव तस्करी गिरोहों के खिलाफ लगातार बड़ी जब्ती दिखाई है। इन सालों हजारों घुसपैठ के प्रयास भी दर्ज किए गए, जबकि सुरक्षा एजेंसियां लगातार चेतावनी देती रही हैं कि बिना बाड़बंदी वाले क्षेत्र बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।
बाड़बंदी का विवाद और सीमावर्ती जिलों में डेमोग्राफी चेंज
पश्चिम बंगाल के कई सीमावर्ती जिलों- विशेष रूप से उत्तर 24 परगना, मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और नदिया के कुछ हिस्सों में पिछले कुछ सालों में तेज जनसांख्यिकीय बदलाव देखे गए हैं। इस डेमोग्राफी चेंज का सबसे बड़ा कारण बांग्लादेश से होने वाले घुसपैठ को माना जाता है।
भाजपा और कई सुरक्षा विश्लेषकों का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि बंगाल में कमजोर सीमा प्रबंधन केवल प्रशासनिक विफलता नहीं था, बल्कि वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित एक राजनीतिक समझौता था।अब, सीमा बाड़बंदी के लिए भूमि हस्तांतरण में तेजी लाने के कथित फैसले के साथ इसका राजनीतिक संदेश भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।BSF के लिए, तेज भूमि अधिग्रहण का मतलब उन महत्वपूर्ण फेंसिंग गैप्स को आखिरकार पूरा करना हो सकता है जो वर्षों से अधूरे पड़े थे।और भारत की पूर्वी सीमा के लिए, यह लंबे समय से लंबित एक सुरक्षा सुधार की शुरुआत साबित हो सकती है।
