जब दुनिया में गेहूं का संकट गहराया: रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने बांग्लादेश तक पहुंचाया अनाज

बांग्लादेश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा रूस और यूक्रेन से खरीदता था। लेकिन सप्लाई रुकने के बाद उसे तुरंत दूसरे विकल्प तलाशने पड़े। उसी समय भारत भी मुश्किल दौर से गुजर रहा था। 2022 में भीषण गर्मी के कारण भारत में गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा था और देश में महंगाई बढ़ने लगी थी

गेहूं का संकट गहराया

गेहूं का संकट गहराया

2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद इसका असर सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया की खाद्य आपूर्ति पर पड़ा। बांग्लादेश जैसे देशों में इसका असर सीधे लोगों की रसोई तक पहुंचा। ढाका के बाजारों और चिटगांव की आटा मिलों में अचानक गेहूं की कमी और महंगाई महसूस होने लगी।

रूस और यूक्रेन दुनिया के लगभग एक-तिहाई गेहूं निर्यात के लिए जिम्मेदार हैं। युद्ध के कारण ब्लैक सी के समुद्री रास्ते प्रभावित हो गए और दोनों देशों की कृषि सप्लाई व्यवस्था बिगड़ गई। इसका असर एशिया और अफ्रीका तक पहुंचा। गेहूं की कीमतें तेजी से बढ़ीं और कई देशों को नए सप्लायर ढूंढने पड़े।

युद्ध से पहले बांग्लादेश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा रूस और यूक्रेन से खरीदता था। लेकिन सप्लाई रुकने के बाद उसे तुरंत दूसरे विकल्प तलाशने पड़े। उसी समय भारत भी मुश्किल दौर से गुजर रहा था। 2022 में भीषण गर्मी के कारण भारत में गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा था और देश में महंगाई बढ़ने लगी थी।

इसी वजह से 13 मई 2022 को भारत सरकार ने गेहूं निर्यात पर रोक लगा दी। हालांकि यह पूरी तरह सख्त फैसला नहीं था। भारत ने उन पड़ोसी देशों के लिए छूट रखी, जिन्हें खाद्य सुरक्षा की जरूरत थी और जिन्होंने औपचारिक अनुरोध किया।

बांग्लादेश को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिला। भारत ने दुनिया के दूसरे देशों को गेहूं भेजना बंद कर दिया, लेकिन बांग्लादेश के लिए सप्लाई जारी रखी। इस दौरान भारत ने लगभग 1.5 लाख मीट्रिक टन गेहूं बांग्लादेश को दिया। इससे वहां आटे की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिली और खाद्य संकट काफी हद तक टल गया।

साधारण बांग्लादेशी परिवारों और छोटे कारोबारियों के लिए यह बहुत बड़ी राहत थी। स्थानीय दुकानों पर आटा मिलता रहा और लोगों को भारी संकट का सामना नहीं करना पड़ा।

इस घटना ने दिखाया कि मुश्किल समय में पड़ोसी देशों का सहयोग कितना जरूरी होता है। कई बड़े देशों ने अपने हितों को देखते हुए निर्यात पूरी तरह बंद कर दिया था, लेकिन भारत ने अपने घरेलू हितों के साथ-साथ पड़ोसी देशों की जरूरतों का भी ध्यान रखा।

यह सिर्फ मदद नहीं थी, बल्कि क्षेत्रीय जिम्मेदारी निभाने का उदाहरण था। भारत और बांग्लादेश के बीच जमीन के रास्ते बनी सप्लाई व्यवस्था ने यह भी साबित किया कि पड़ोसी देशों के बीच मजबूत संबंध संकट के समय सबसे ज्यादा काम आते हैं।

Exit mobile version