‘राख’ और रंगा-बिल्ला मामला: 1978 का वह दिल्ली अपराध जिसने जघन्य अपराधों और मृत्युदंड पर भारत की न्यायिक सोच को आकार दिया

राख' ने इस मामले को फिर से चर्चा में ला दिया है। यह मामला सिर्फ एक जघन्य अपराध नहीं था, बल्कि इसने देश में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, पुलिस व्यवस्था और न्याय व्यवस्था को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी थी।

'राख' और रंगा-बिल्ला मामला

'राख' और रंगा-बिल्ला मामला

भारत के आपराधिक इतिहास में कुछ ऐसे मामले हैं जिन्हें दशकों बाद भी लोग भूल नहीं पाए हैं। वर्ष 1978 में दिल्ली में हुए गीता और संजय चोपड़ा अपहरण एवं हत्याकांड को ऐसा ही एक मामला माना जाता है। लगभग 50 साल बाद भी यह घटना लोगों के जेहन में ताजा है। हाल ही में प्राइम वीडियो की वेब सीरीज राख ने इस मामले को फिर से चर्चा में ला दिया है।

यह मामला सिर्फ एक जघन्य अपराध नहीं था, बल्कि इसने देश में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, पुलिस व्यवस्था और न्याय व्यवस्था को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी थी।

कौन थे गीता और संजय चोपड़ा?

गीता चोपड़ा 16 वर्ष की थीं, जबकि उनके छोटे भाई संजय चोपड़ा 14 वर्ष के थे। दोनों भारतीय नौसेना के अधिकारी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा के बच्चे थे। परिवार दिल्ली के धौला कुआं स्थित ऑफिसर्स एन्क्लेव में रहता था।

26 अगस्त 1978 की शाम दोनों भाई-बहन ऑल इंडिया रेडियो के एक युवा कार्यक्रम में भाग लेने के लिए घर से निकले थे। परिवार को उम्मीद थी कि कार्यक्रम खत्म होने के बाद उनके पिता उन्हें वापस घर ले आएंगे। लेकिन यह उनकी आखिरी यात्रा साबित हुई।

कैसे हुआ अपहरण?

जब ऑल इंडिया रेडियो का कार्यक्रम शुरू हुआ तो परिवार को पता चला कि उसमें उनके बच्चों की आवाज नहीं है। इससे परिवार चिंतित हो गया। कैप्टन चोपड़ा ने अस्पतालों, पुलिस थानों और रेडियो स्टेशन में तलाश शुरू की और बाद में बच्चों के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई।

जांच में सामने आया कि दोनों का अपहरण कुलजीत सिंह उर्फ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला ने किया था। दोनों छोटे-मोटे अपराधी थे और मुंबई से दिल्ली आए थे। वे एक फर्जी नंबर प्लेट लगी फिएट कार में घूम रहे थे और अपहरण के लिए शिकार तलाश रहे थे।

धौला कुआं के पास उन्होंने गीता और संजय को अपनी कार में बैठा लिया। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि बच्चों ने मदद मांगने की कोशिश की थी, लेकिन कार वहां से निकल गई।

बहादुरी से किया मुकाबला

अपहरण के बाद जब आरोपियों को पता चला कि बच्चे किसी बहुत अमीर परिवार से नहीं हैं, तो फिरौती की उम्मीद खत्म हो गई।

अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों बच्चों ने अपने अपहरणकर्ताओं का बहादुरी से सामना किया। संजय ने विरोध किया और हमलावरों से लड़ने की कोशिश की, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए।

गीता को भी अत्यंत क्रूरता का सामना करना पड़ा। अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के अनुसार, उनके साथ यौन हिंसा की गई और बाद में दोनों भाई-बहन की हत्या कर दी गई। 28 अगस्त 1978 को उनके शव दिल्ली के रिज क्षेत्र के पास बरामद किए गए।

पूरे देश में फैला गुस्सा

इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। अखबारों में लगातार खबरें छपने लगीं, छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए और संसद में भी इस मामले पर चर्चा हुई।

दिल्ली के लोगों के मन में डर बैठ गया। माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गए। साथ ही पुलिस की कार्यप्रणाली और शुरुआती प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठने लगे।

रंगा और बिल्ला की गिरफ्तारी

लगभग दो सप्ताह बाद, 8 सितंबर 1978 को सुरक्षा कर्मियों ने कालका मेल ट्रेन में रंगा और बिल्ला की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

जांच एजेंसियों ने फोरेंसिक सबूत, गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य प्रमाण जुटाए, जिनके आधार पर दोनों के खिलाफ मजबूत मामला तैयार हुआ।

अदालत ने सुनाई फांसी की सजा

1979 में अदालत ने दोनों आरोपियों को हत्या, अपहरण, गैरकानूनी कैद और अन्य गंभीर अपराधों का दोषी ठहराया। दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह अपराध अत्यंत क्रूर और अमानवीय था तथा ऐसे मामलों में कानून की सबसे कड़ी सजा दी जानी चाहिए।

आज भी याद किया जाता है यह मामला

रंगा और बिल्ला की दया याचिकाएं खारिज होने के बाद 31 जनवरी 1982 को तिहाड़ जेल में उन्हें फांसी दे दी गई।

गीता और संजय चोपड़ा को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी याद में गीता चोपड़ा पुरस्कार और संजय चोपड़ा पुरस्कार भी दिए जाते हैं, जो 16 वर्ष से कम आयु के बहादुर बच्चों को प्रदान किए जाते हैं।

करीब पांच दशक बाद भी यह मामला भारत के सबसे चर्चित अपराधों में गिना जाता है। रंगा और बिल्ला के नाम आज भी दिल्ली के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में शामिल हैं, जबकि गीता और संजय की बहादुरी लोगों को प्रेरित करती रहती है।

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