जब राजीव गांधी ने दूरदर्शन को दिए थे तियानआनमेन स्क्वायर नरसंहार की कवरेज न करने के निर्देश

4 जून 1989 को तियानआनमेन स्क्वायर से सामने आई तस्वीरों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था। लेकिन भारत की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने इसे लेकर एक चुप्पी ओढ़ ली थी।

राजीव गांधी

राजीव गांधी

आज जब दुनिया तियानआनमेन स्क्वायर नरसंहार की 37 वीं बरसी को याद कर रही है, तो टैंकों के सामने खड़े उस शख्स (जिसे दुनिया में टैंकमैन के नाम से जाना गया) बरबस आंखों के सामने आ जाती है। ये तस्वीर तियानआनमेन चौक ही नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के शासनकाल में पूरे चीन में हो रहे मानवतावादी दमन की एक झलक, और उसके ख़िलाफ़ नागरिक प्रतिकार का प्रतीक बन गई। हालांकि इस प्रतिरोध को पूरी शक्ति के साथ कुचल दिया गया था।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उस नरसंहार से महज़ छह महीने पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन की एक महत्वपूर्ण राजकीय यात्रा की थी। कहा जाता है कि चीन की ओर से उन्हें असाधारण आतिथ्य मिला और CCP ने भारत के प्रधानमंत्री को पूरी तरह प्रसन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को इसका तत्काल लाभ भी मिला। 
ऐसे समय में जब पूरी दुनिया चीन द्वारा लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों पर किए गए क्रूर दमन के खिलाफ आवाज उठा रही थी, भारत की राजीव गांधी सरकार ने न केवल इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली, बल्कि सरकारी मीडिया को भी इस घटना की वास्तविक तस्वीर भारतीय जनता तक पहुंचाने से रोक दिया।

राजीव गांधी ने यह चुप्पी सद्भावना के तहत साधी या किसी दबाव में, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता के रूप में उनका यह फैसला कई लोगों को गलत प्रतीत होता है। यह समझा जा सकता है कि वे भारत-चीन संबंधों में तनाव नहीं चाहते थे, खासकर तब जब दोनों देशों के रिश्ते सुधार की दिशा में बढ़ रहे थे। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी भी कूटनीतिक संबंध की कीमत उन हजारों छात्रों और लोकतंत्र समर्थकों के जीवन से अधिक हो सकती है, जो केवल एक लोकतांत्रिक चीन का सपना देख रहे थे?

हालांकि चीन के प्रति राजीव गांधी का यह नरम रवैया कोई नई बात नहीं थी। गांधी परिवार और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच निकटता की चर्चा लंबे समय से होती रही है। चाहे जवाहरलाल नेहरू का माओ त्से तुंग के साथ संबंध हो और “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का नारा, या फिर राजीव गांधी का चीन के साथ करीबी संबंध स्थापित करने का प्रयास—ऐसे कई कदम अंततः भारत के लिए अपेक्षित परिणाम नहीं ला सके।1962 का भारत-चीन युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। नेहरू लंबे समय तक चीन को मित्र मानते रहे और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन की स्थायी सदस्यता के पक्ष में भी खड़े हुए। लेकिन अंततः चीन ने ही भारत पर हमला किया और नेहरू की धारणाएं टूट गईं।

हालांकि 1967 में स्थिति अलग थी। जब चीन ने नाथू ला क्षेत्र में तनाव बढ़ाने की कोशिश की, तब भारतीय सेना ने कड़ा जवाब दिया। नाथू ला संघर्ष ने चीन को यह एहसास कराया कि भले ही राजनीतिक नेतृत्व की अपनी सीमाएं हों, लेकिन भारतीय सुरक्षा बलों में देश की रक्षा करने की अद्वितीय क्षमता है।
दावा यह भी है कि कांग्रेस और CCP के बीच निकटता समय के साथ समाप्त नहीं हुई। राहुल गांधी ने अपनी कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान स्वयं कहा था कि उन्होंने चीनी नेताओं से मुलाकात की थी, जिन्होंने उन्हें बताया कि चीन में रोजगार सृजन कोई समस्या नहीं है। वर्ष 2017 में राहुल गांधी कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के साथ CCP के निमंत्रण पर चीन की यात्रा पर गए थे। वहीं 2019 में चीन का एक प्रतिनिधिमंडल भारत दौरे के दौरान सोनिया गांधी और राहुल गांधी से भी मिला था। इन घटनाओं को दोनों दलों के बीच संबंधों के उदाहरण के रूप में देखा जाता है। 
इसके अतिरिक्त भी राहुल गांधी कई बार सार्वजनिक रूप से चीन की और चीन के उत्पादों की तारीफ़ करते रहे हैं।

इन तमाम घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि गांधी परिवार और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच ऐतिहासिक रूप से एक विशेष प्रकार की निकटता रही है। 1989 में जब दुनिया चीन के खिलाफ खड़ी थी और बाद के वर्षों में भी जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन को लेकर सवाल उठते रहे, तब कांग्रेस की स्थिति अक्सर चर्चा और बहस का विषय बनी रही है। और इतिहास के इन प्रसंगों को देखते हुए यह सवाल आज भी बना हुआ है कि जब लोकतांत्रिक मूल्यों और चीन जैसे सत्तावादी मॉडल के बीच चुनाव की स्थिति आए, तो कांग्रेस किस पक्ष में खड़ी दिखाई देगी। भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की बात करने वाली कांग्रेस को इसे स्पष्ट करना चाहिए।

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