संसद के मौजूदा सत्र में ‘परिसीमन विधेयक 2026′ (Delimitation Bill 2026) को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच खींचतान चरम पर है। अप्रैल में नंबर गेम के चलते सरकार की कोशिश आगे नहीं बढ़ पाई थी। अब पश्चिम बंगाल चुनाव में TMC की हार के बाद सरकार को उम्मीद है कि जरूरी दो–तिहाई बहुमत का गणित उसके पक्ष में हो सकता है। लेकिन इस पूरी कवायद के बीच सबसे बड़ा सवाल दक्षिण भारत का है। डीएमके के 22 लोकसभा सांसद हैं और पार्टी परिसीमन के मौजूदा फॉर्मूले का विरोध कर रही है। उसका तर्क है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण उन राज्यों को राजनीतिक रूप से दंडित करेगा, जिन्होंने दशकों पहले परिवार नियोजन को अपनाया।
तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK ने विधेयक का समर्थन करने के लिए केंद्र सरकार के सामने 3 प्रमुख शर्तें रख दी हैं। DMK की मुख्य शर्त—यानी परिसीमन को अगले 25 साल टालना या भविष्य की आबादी के आधार पर तय करना—पहली नज़र में दक्षिण के राज्यों के बचाव का रास्ता लग सकती है, लेकिन इसे अब टालना द्क्षिणी भारतीय राज्यों के हितों के लिए भी ऐतिहासिक भूल साबित होगा।
तमिलनाडु की आबादी में हिस्सेदारी लगातार घटी
1971 में तमिलनाडु देश की कुल आबादी का 7.52% था। 2011 की जनगणना तक यह हिस्सेदारी घटकर 5.96% रह गई। 2036 के जनसंख्या प्रोजेक्शन में यह और घटकर करीब 5.14% रहने का अनुमान है। यानी करीब छह दशकों में देश की कुल आबादी में तमिलनाडु का हिस्सा लगातार कम हुआ है।
डेटा बॉक्स: तमिलनाडु की आबादी हिस्सेदारी
| वर्ष | देश की कुल आबादी में तमिलनाडु की हिस्सेदारी |
|---|---|
| 1971 | 7.52% |
| 2011 | 5.96% |
| 2036* | 5.14% |
*Source- Population Projections for India and States, 2011-2036
सीटों में तमिलनाडु की हिस्सेदारी अभी भी आबादी से ज्यादा
यहीं से परिसीमन का असली गणित शुरू होता है। तमिलनाडु के पास लोकसभा की 39 सीटें हैं। 543 सदस्यीय मौजूदा लोकसभा में यह करीब 7.18% हिस्सेदारी है। वहीं 2011 की जनगणना में देश की कुल आबादी में तमिलनाडु की हिस्सेदारी सिर्फ 5.96% थी।
डेटा बॉक्स: तमिलनाडु के लिए मौजूदा प्रतिनिधित्व का गणित
| पैमाना | हिस्सेदारी |
| 2011 में राष्ट्रीय आबादी में हिस्सा | 5.96% |
| लोकसभा में 39 सीटों का हिस्सा | 7.18% |
| दोनों के बीच अंतर | +1.22 प्रतिशत |
यह अंतर किसी खामी का नतीजा नहीं है। यह उस संवैधानिक व्यवस्था का परिणाम है, जिसके तहत 1976 में लोकसभा सीटों के पुनर्समायोजन को 1971 की जनगणना के आधार पर फ्रीज कर दिया गया था। इसका मकसद साफ था कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन को अपनाया, उन्हें आबादी कम करने की कीमत राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नहीं चुकानी पड़े। मगर अगर आज भी इस फ्रीज को जारी रखा जाता है तो देश की बड़ी आबादी के साथ न्यायसंगत नहीं होगा।
2011 पर परिसीमन और 2050 पर परिसीमन में बड़ा फर्क
अगर परिसीमन आज, यानी 2011 की जनगणना के आधार पर भी हो जाए, तो तमिलनाडु की आबादी हिस्सेदारी (5.96%) और सीट हिस्सेदारी (7.18%) के बीच का फासला करीब 1.2 प्रतिशत अंक का ही रह जाता है। यह गैप संभालने लायक है, राजनीतिक बातचीत और संवैधानिक संतुलन से पाटा जा सकता है। लेकिन अगर यही कवायद 2050 के आंकड़ों पर आधारित हो, तो यह फासला बेतहाशा बढ़ जाएगा, क्योंकि तब तक तमिलनाडु की हिस्सेदारी और गिर चुकी होगी जबकि उत्तर भारत के राज्यों की हिस्सेदारी उलटी दिशा में बढ़ रही होगी। यानी समय बीतने के साथ दक्षिणी भारतीय राज्यों के लिए परिसीमन का झटका ज्यादा बड़ा होता जाएगा।
बिहार और यूपी का उलटा ट्रेंड समझिए
तमिलनाडु के मुकाबले बिहार और उत्तर प्रदेश के आंकड़े बिल्कुल दूसरी दिशा की कहानी बताते हैं। बिहार देश की कुल आबादी में 1971 में 7.69% हिस्सेदारी रखता था। 2011 में यह बढ़कर 8.60% हो गई और आधिकारिक अनुमाने के अनुसार 2036 तक इसके 9.79% तक पहुंचने का अनुमान है। वहीं उत्तर प्रदेश की भारत की आबादी भी हिस्सेदारी 1971 के 15.30% से मुकाबले बढ़कर 2036 में 17.06% हो जाएगी।
डेटा बॉक्स: आबादी हिस्सेदारी— तमिलनाडू बनाम बिहार, उत्तरप्रदेश का अंतर
| राज्य | 1971 | 2011 | 2036 अनुमान |
| तमिलनाडु | 7.52% | 5.96% | 5.14% |
| बिहार | 7.69% | 8.60% | 9.79% |
| उत्तर प्रदेश | 15.30% | 16.50 % | 17:06 % |
यानी एक तरफ तमिलनाडु की राष्ट्रीय आबादी में हिस्सेदारी करीब 2.38 प्रतिशत घटती दिख रही है, दूसरी तरफ बिहार की हिस्सेदारी करीब 2.10 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। यहीं दक्षिणी राज्यों की सबसे बड़ी चिंता होनी चाहिए। इसका साफ मतलब है कि अगर मौजूदा 2011 की आबादी पर हुआ परिसीमन दक्षिणी भारत के लिए न्यायोचित नहीं तो फिर 2050 के आस पास तो किया गया परिसीमन तो दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए एक ऐतिहासिक भूल ही होगा।
