राखी सिर्फ भाई की कलाई पर धागा बांधने की रस्म नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज की भावनात्मक बुनावट का हिस्सा है। यही वजह है कि जब कोई ब्रांड इस त्योहार को नए विजुअल्स, नए फैशन या बदले हुए नैरेटिव के साथ पेश करता है, तो मामला विज्ञापन तक सीमित नहीं रहता — बहस सीधे परंपरा बनाम आधुनिकता पर आ जाती है।
ताजा विवाद एक ज्वैलरी ब्रांड के कैंपेन से शुरू हुआ। सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने कृति सेनन के एक रक्षाबंधन एड पर सवाल दागे, और देखते ही देखते सोशल मीडिया दो खेमों में बंट गया — एक जो इसे भारतीय परंपरा का अपमान बता रहा है, दूसरा जो कह रहा है कि त्योहार की भावना किसी ड्रेस कोड की मोहताज नहीं।
राखी एड विवाद शुरू कहां से हुआ
सिल्वर ज्वैलरी ब्रांड GIVA के रक्षाबंधन कैंपेन में कृति सेनन नजर आईं, और इस बार अंदाज पारंपरिक नहीं, इंडो-वेस्टर्न था। भाई-बहन के रिश्ते को हल्के-फुल्के, मॉडर्न टच के साथ दिखाने की कोशिश हुई — लेकिन यहीं से एतराज शुरू हो गया।
आलोचकों का सीधा सवाल था: रक्षाबंधन जैसे त्योहार पर पूजा की थाली, रोली-अक्षत, तिलक, आरती — ये सब गायब क्यों? और जब एड के एक हिस्से में पालतू कुत्ते को राखी बंधवाते दिखाया गया, तो नाराजगी और बढ़ गई। कई लोगों के लिए यह सिर्फ एक क्रिएटिव चॉइस नहीं, बल्कि राखी की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान से खिलवाड़ जैसा लगा।
कंगना का गुस्सा किस बात पर
कंगना रनौत ने स्टाइलिंग को लेकर सीधा हमला बोला। उनका तर्क — आज महिलाओं के पास कपड़ों के इतने ऑप्शन हैं कि हर मौके पर बोल्डनेस को ही मॉडर्निटी का सिंबल बनाने की जरूरत नहीं। उन्होंने पूछा कि भाई को राखी बांधने जैसे पारिवारिक मौके पर अंडरगारमेंट जैसी स्टाइलिंग की जरूरत ही क्यों पड़ी, और एड को जानबूझकर “क्रीपी” बनाया गया करार दिया।
इस टिप्पणी ने बहस को नया मोड़ दे दिया। सवाल अब सिर्फ यह नहीं रहा कि एड अच्छा है या बुरा — बहस इस पर छिड़ गई कि क्या त्योहारी विज्ञापनों में कपड़ों को लेकर कोई सांस्कृतिक लक्ष्मण-रेखा होनी चाहिए।
कृति सेनन का तर्क
कृति सेनन और उनके समर्थकों की दलील अलग जमीन पर खड़ी है। कृति का कहना है कि उनके संस्कृति के लिए उनका सम्मान केवल कपड़ों से नहीं आंका जाना चाहिए । उनके मुताबिक रक्षाबंधन का असली भाव भाई-बहन के प्यार और भरोसे का है, न कि किसी तय ड्रेस या पूजा की थाली का मोहताज। मॉडर्न कपड़े पहनकर राखी मनाने से त्योहार की भावना खत्म नहीं हो जाती।
यही वो प्वाइंट है जहां से असली मतभेद शुरू होता है — एक पक्ष इसे सांस्कृतिक संवेदनशीलता का मसला मानता है, दूसरा इसे महिला की निजी पसंद और अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ता है। एक ही एड, दो बिल्कुल उलट नजरिए।
त्योहारी विज्ञापन बार-बार विवादों में क्यों फंसते हैं
वजह सीधी है — त्योहार सिर्फ आस्था का मामला नहीं, करोड़ों का बिजनेस सीजन भी हैं। दिवाली, करवा चौथ, राखी, शादियां — ये सब बड़े खरीदारी सीजन हैं, इसलिए ब्रांड्स इमोशनल और “अलग” दिखने वाले कैंपेन पर दांव लगाते हैं।
दिक्कत तब आती है जब कोई ब्रांड किसी पारंपरिक प्रतीक को नया मतलब देने की कोशिश करता है, और दर्शक उसे अपनी आस्था से सीधे जोड़कर देखते हैं। एजेंसी के लिए यह क्रिएटिव एक्सपेरिमेंट हो सकता है — दर्शक के लिए वही चीज श्रद्धा का विषय है। मंगलसूत्र, सिंदूर, बिंदी, कन्यादान, राखी, पूजा — ये विज्ञापन के लिए महज प्रॉप्स नहीं, भावनाओं से जुड़े प्रतीक हैं।
हिंदू त्योहार बार बार शिकार
तनिष्क का ‘एकत्वम’ (2020): मुस्लिम परिवार में हिंदू बहू की गोद भराई दिखाने वाला यह एड कुछ लोगों के लिए सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश था, आलोचकों के लिए ‘लव जिहाद’ नैरेटिव। विरोध इतना बढ़ा कि कंपनी को एड वापस लेना पड़ा।
मान्यवर मोहे का ‘कन्यामान’ (2021): आलिया भट्ट के जरिए ‘कन्यादान’ की रस्म पर सवाल उठाने की कोशिश हुई। इरादा महिलाओं की भूमिका पर नई बहस छेड़ना था, लेकिन एक तबके ने इसे हिंदू विवाह संस्कारों पर सीधी टिप्पणी माना।
फैबइंडिया का ‘जश्न-ए-रिवाज’ (2021): दिवाली कलेक्शन के नाम और प्रेजेंटेशन पर बवाल हुआ। आरोप लगा कि हिंदू त्योहार के प्रचार से जानबूझकर उसकी पारंपरिक पहचान हटाई गई। दबाव में कैंपेन वापस लेना पड़ा।
डाबर फेम ब्लीच (2021): समलैंगिक जोड़े को करवा चौथ मनाते दिखाने वाला यह एड बदलते सामाजिक संदर्भ को दिखाने की कोशिश था, लेकिन विरोधियों ने इसे धार्मिक त्योहार से छेड़छाड़ बताया। कंपनी ने माफी मांगकर एड हटा लिया।
सब्यसाची का ‘रॉयल बंगाल मंगलसूत्र’ (2021): मंगलसूत्र को ग्लैमरस, बोल्ड अंदाज में पेश करने पर आलोचकों ने इसे पवित्र वैवाहिक प्रतीक के “अत्यधिक कामुक” इस्तेमाल का आरोप लगाया। यह भी वापस लिया गया।
असली सवाल कहीं और है
इन तमाम विवादों को साथ रखकर देखें तो एक पैटर्न साफ दिखता है — ब्रांड्स त्योहारों को नई पीढ़ी से जोड़ने के लिए पुराने प्रतीकों की नई व्याख्या गढ़ना चाहते हैं, और समाज का एक हिस्सा चाहता है कि इन प्रतीकों की मूल पहचान से छेड़छाड़ न हो।
यहां बहस ‘आधुनिक बनाम पारंपरिक’ की नहीं, संवेदनशीलता की है। नया आइडिया आजमाना गलत नहीं, न ही हर मॉडर्न प्रेजेंटेशन धर्म-विरोधी है। लेकिन जिस प्रतीक से करोड़ों की आस्था बंधी हो, उसे छूते वक्त क्रिएटिव आजादी और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन साधना ही होगा।
राखी वाला यह ताजा विवाद फिर वही पुराना सवाल दोहरा गया है — त्योहारों को नई पीढ़ी के हिसाब से नया रूप दिया जाए, या उनकी पहचान से बंधे प्रतीकों को केंद्र में रखा जाए? जवाब शायद बीच में कहीं है — आधुनिकता तभी टिकती है जब वह परंपरा को मिटाए नहीं, बल्कि उससे बात करे।
