12 अगस्त 2026 को राज्यसभा में उस समय माहौल गर्मा गया जब सीपीआई(एम) सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने बीजेपी सांसद सुष्मिता देव के खिलाफ विशेषाधिकार हनन (Privilege Motion) का नोटिस दिया। ब्रिटास का आरोप है कि एक विधेयक पर बहस के दौरान सुष्मिता देव ने उन पर ‘लुंगीवाला‘ कहकर नस्लीय व क्षेत्रीय तंज कसा। दूसरी ओर, सुष्मिता देव ने भी पलटवार करते हुए ब्रिटास के खिलाफ जवाबी प्रिवलेज नोटिस देने का ऐलान कर दिया।
संसद में आखिर प्रिवलेज मोशन कैसे काम करता है? किसी सांसद को इसमें क्या सजा मिल सकती है? और संसद में पहले कब–कब ऐसे क्षेत्रीय विवाद उठे हैं?
क्या है ताजा मामला?
राज्यसभा में ‘द टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026′ पर चर्चा चल रही थी। सीपीआई(एम) सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास जब सदन को संबोधित कर रहे थे, तब आरोप है कि बीजेपी सांसद सुष्मिता देव उनकी सीट के पीछे आकर बैठ गईं और उन्हें बार–बार ‘लुंगीवाला‘ कहकर टोका। डॉ. जॉन ब्रिटास का आरोप है कि यह कोई अनजाने में निकला शब्द नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीयों को नीचा दिखाने और उन्हें स्टीरियोटाइप करने की जानबूझकर की गई कोशिश थी। ब्रिटास ने राज्यसभा के नियम 187 के तहत सभापति सी.पी. राधाकृष्णन को विशेषाधिकार हनन का औपचारिक नोटिस सौंपा।
वहीं दूसरी ओर सुष्मिता देव ने आरोपों को नकारते हुए दावा किया कि ब्रिटास ने भी उनके खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं और वह भी उनके खिलाफ प्रिवलेज नोटिस दायर करेंगी।
ऐसे में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के सुझाव पर सभापति ने दोनों सांसदों को अपने कक्ष (Chamber) में बुलाकर मामले को सुलझाने का आश्वासन दिया।
आरोप प्रत्यारोप ?
डॉ. जॉन ब्रिटास (CPI-M MP): “मैं एक गौरवान्वित भारतीय, गौरवान्वित दक्षिण भारतीय और गौरवान्वित मलयाली हूं। बहस में तीखी नोकझोंक हो सकती है, लेकिन बार–बार ‘लुंगीवाला‘ कहना सदन की गरिमा और देश की विविधता पर हमला है।“
सुष्मिता देव (BJP MP): “ब्रिटास ने भी सदन के भीतर मेरे खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। मैं भी उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस लाऊंगी।
सी.पी. राधाकृष्णन (सभापति, राज्यसभा): “यहाँ कोई उत्तर या दक्षिण भारतीय नहीं है; हम सब केवल भारतीय हैं। मैं दोनों माननीय सदस्यों को अपने कक्ष में बुलाकर मामले का समाधान करूंगा।“
क्या होता है विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव (Privilege Motion)?
संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत सांसदों को संसद में वाक् स्वतंत्रता (Freedom of Speech) और कुछ विशेष अधिकार प्राप्त हैं। जब कोई सांसद या बाहरी व्यक्ति किसी सदस्य के अधिकारों का हनन करता है, सदन की अवमानना करता है, या अनुचित आचरण से संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाता है, तो प्रिवलेज मोशन लाया जाता है। इसके तहत सभापति प्राथमिक जांच करने पर या तो इसे सीधे खारिज कर देते है या फिर मामला सुलझा लिया जाता है। विवाद नहीं सुलझने की स्थिति में मामला 10 सदस्सयी विशेषाधिकार समिति के पास जाता है। इसके बाद सदन द्वारा अंतिम फैसला व सजा सुनाई जाती है।
Privilege Motion के मामले कितनी गंभीर हो सकती है सजा ?
संसदीय विशेषाधिकारों को स्पष्ट रूप से संहिताबद्ध (Codified) नहीं किया गया है, लेकिन संसदीय परंपराओं के अनुसार दोषी पाए जाने पर निम्नलिखित कार्रवाइयां हो सकती हैं।
खेद या माफी (Apology): मामले की गंभीरता कम होने पर समिति संबंधित सांसद को सदन के पटल पर या लिखित रूप में बिना शर्त माफी मांगने का निर्देश देती है।
सदन द्वारा चेतावनी/भर्त्सना (Reprimand): यदि आचरण गरिमा के खिलाफ हो, तो सभापति/अध्यक्ष दोषी सांसद को सदन के समक्ष बुलाकर सख्त चेतावनी या भर्त्सना (Censure) देते हैं।
सदन से निलंबन (Suspension): गंभीर अवमानना के मामले में सांसद को पूरे सत्र या कुछ दिनों के लिए सदन की कार्यवाही से निलंबित किया जा सकता है।
सदस्यता रद्द होना (Expulsion): दुर्लभ और बेहद गंभीर मामलों में सदन सर्वसम्मति या बहुमत से प्रस्ताव पारित करके संबंधित सदस्य की संसद सदस्यता भी समाप्त कर सकता है।
संसद में पहले कब–कब उठे क्षेत्रीय टिप्पणियों को लेकर विवाद?
संसद में उत्तर–दक्षिण या क्षेत्रीय टिप्पणियों को लेकर पहले भी कई बार हंगामा हो चुका है।
- 2023 (डीएनवी सेंथिलकुमार विवाद): तमिलनाडु से डीएमके सांसद डी.एन.वी. सेंथिलकुमार ने लोकसभा में उत्तर भारतीय राज्यों के संदर्भ में ‘गौमूत्र राज्य‘ शब्द का इस्तेमाल किया था। भारी हंगामे और प्रिवलेज की मांग के बाद उन्होंने संसद में औपचारिक रूप से माफी मांगी थी।
- 2017 (तरुण विजय बयान प्रकरण): पूर्व भाजपा सांसद तरुण विजय के एक टीवी बयान (दक्षिण भारतीयों के रंग को लेकर) पर संसद के दोनों सदनों में भारी हंगामा हुआ था। मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह को सदन में बयान देना पड़ा था और तरुण विजय ने बिना शर्त माफी मांगी थी।
- 1990 के दशक के भाषा विवाद: 1990 के दशक में मुलायम सिंह यादव और दक्षिण भारतीय सांसदों के बीच हिंदी बनाम अंग्रेजी को लेकर कई बार तीखी बहसें हुईं, जिन्हें बाद में रिकॉर्ड से हटाना पड़ा था।
