LIC में हिस्सेदारी बिक्री: क्या वाकई नेहरू की बनाई LIC को बेच रही है मोदी सरकार ?

LIC में अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचने जा रही है। खबर सामने आते ही सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं, कुछ लोगों ने इसे "देश बेचने" जैसे भारी-भरकम शब्दों से जोड़ दिया। लेकिन असल कहानी समझने के लिए जरा नियम-कायदों पर गौर करना जरूरी है।

LIC में हिस्सेदारी बिक्री

LIC में हिस्सेदारी बिक्री

3 अगस्त 2026 को एक बड़ी खबर आई — केंद्र सरकार भारतीय जीवन बीमा निगम यानी LIC में अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचने जा रही है। खबर सामने आते ही सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं, कुछ लोगों ने इसे “देश बेचने” जैसे भारी-भरकम शब्दों से जोड़ दिया। लेकिन असल कहानी समझने के लिए जरा नियम-कायदों पर गौर करना जरूरी है।

पहले समझें असली नियम
भारत में शेयर बाजार का नियामक SEBI एक साफ नियम रखता है — किसी भी लिस्टेड कंपनी में कम से कम 10% हिस्सेदारी आम जनता (पब्लिक) के पास होनी चाहिए। इसे “मिनिमम पब्लिक शेयरहोल्डिंग” या MPS नॉर्म कहा जाता है। मकसद सीधा है — शेयर बाजार में असली भागीदारी बनी रहे, और कुछ हाथों में पूरा नियंत्रण न सिमट जाए। अब सवाल यह है कि LIC में सरकार की हिस्सेदारी कितनी है — करीब 96.5%। यानी सिर्फ 3.5% हिस्सा ही आम निवेशकों के पास है। नियम के मुताबिक यह आंकड़ा 10% तक पहुंचना चाहिए, और इसके लिए सरकार को कुल मिलाकर करीब 6.5% हिस्सेदारी बाजार में उतारनी है।

LIC को मिली थी खास छूट
दिलचस्प बात यह है कि LIC को यह नियम पूरा करने के लिए पहले ही एक विशेष रियायत मिल चुकी है। आमतौर पर IPO के बाद कंपनियों को तीन साल के भीतर यह शर्त पूरी करनी होती है, लेकिन LIC के आकार और सरकार की हिस्सेदारी को देखते हुए SEBI ने इसके लिए समयसीमा बढ़ाकर मई 2027 तक कर दी थी। यानी सरकार पर अभी भी कोई तात्कालिक दबाव नहीं था, बल्कि यह एक तय समय-सीमा के भीतर निभाई जाने वाली नियामकीय जिम्मेदारी है।

अभी क्यों हुआ यह फैसला
गौर करने वाली बात यह भी है कि पिछले कुछ समय में शेयर बाजार का माहौल पहले से बेहतर हुआ है। ऐसे माहौल में बड़ा इश्यू लाना निवेशकों को ज्यादा भरोसा देता है और डील की सफलता की संभावना भी बढ़ जाती है। यही वजह है कि सरकार ने बेहतर होते बाजार को देखते हुए इस Offer for Sale (OFS) का समय चुना।
OFS के तहत सरकार आधार रूप में 2.5% हिस्सेदारी बेचेगी, साथ ही 4% का ग्रीनशू विकल्प भी रखा गया है — यानी जरूरत पड़ने पर कुल 6.5% तक बिक्री हो सकती है, जो ठीक वही आंकड़ा है जो नियम पूरा करने के लिए चाहिए।

डिस्काउंट पर बिक्री का मतलब क्या है
बाजार में जब भी कोई बड़ा हिस्सा एकसाथ बेचा जाता है, तो निवेशकों को आकर्षित करने के लिए आमतौर पर मौजूदा बाजार भाव से थोड़ा कम — यहां करीब 10% डिस्काउंट — पर शेयर ऑफर किए जाते हैं। यह कोई असामान्य बात नहीं, बल्कि बड़े OFS सौदों में एक मानक प्रक्रिया है, ताकि इतनी बड़ी मात्रा के शेयर आसानी से बिक सकें। फ्लोर प्राइस बाजार भाव से ही तय होता है। गौरतलब है कि LIC ने मई 2026 में 1:1 का बोनस इश्यू भी जारी किया था।
विरोध के सुर भी उठे

हर बड़े फैसले की तरह इस पर असहमति भी सामने आई है। बीमा क्षेत्र के कर्मचारी संगठन ऑल इंडिया इंश्योरेंस एम्प्लॉइज एसोसिएशन (AIIEA) ने इस डिसइन्वेस्टमेंट का कड़ा विरोध जताया है। संगठन का कहना है कि यह कदम LIC में सार्वजनिक स्वामित्व को लगातार कमजोर करने की दिशा में एक और कड़ी है, और सरकार को इसे वापस लेना चाहिए। एसोसिएशन ने 5 अगस्त को देशभर में लंच-आवर प्रदर्शन का भी ऐलान किया है।
कुल मिलाकर, यह मामला जितना सीधा एक नियामकीय अनुपालन जैसा दिखता है, राजनीतिक और आर्थिक हलकों में उतनी ही अलग-अलग व्याख्याएं भी साथ लेकर आया है।

Exit mobile version