नेपाल जैसी तबाही का हिमाचल में भी खतरा? IIT रोपड़ की स्टडी ने ग्लेशियल झीलों पर चेताया

1990 से 2024 के बीच ग्लेशियल झीलें 107 से बढ़कर 669 हुईं; ब्यास-सतलुज बेसिन में हाइड्रो प्रोजेक्ट्स और सैकड़ों इमारतें खतरे में

Himachal GLOF NEPAL FLASH FLOOD

26 अगस्त को नेपाल में बर्फीली झील फटने से आई प्रलयंकारी बाढ़ ने जिस तरह पूरे इलाके को मलबे के ढेर में बदल दिया, उसने पूरे हिमालयी क्षेत्र की नींद उड़ा दी है। ठीक इसी तरह का जलजला अब भारतीय पहाड़ों, खासकर हिमाचल प्रदेश में आने की आशंका गहरा गई है। आईआईटी रोपड़ और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी के एक ताजा संयुक्त अध्ययन ने चेतावनी दी है कि राज्य में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और अनगिनत प्राकृतिक झीलों को जन्म दे रहे हैं, जो बादलों के फटने या भारी बारिश के साथ मिलकर नेपाल जैसी भयानक तबाही ला सकती हैं।

क्या होता है GLOF और यह कैसे बनता है टाइम बम?

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF उस प्राकृतिक आपदा को कहते हैं, जब ग्लेशियर के पिघलने से बनी झील का प्राकृतिक बांध अचानक टूट जाता है और लाखों क्यूसेक पानी मलबे के साथ नीचे की ओर बह निकलता है। ये झीलें आमतौर पर बर्फ, मिट्टी और ढीली चट्टानों (मोरेन) के प्राकृतिक बांध से घिरी होती हैं। जब पहाड़ों पर हिमस्खलन, चट्टान खिसकना, भूकंप, तेज बारिश या क्लाउडबर्स्ट होता है, तो झील में पानी का दबाव बढ़ जाता है। पानी के इस भारी दबाव या कटाव के कारण यह कमजोर प्राकृतिक ढांचा टूट जाता है और देखते ही देखते निचले इलाकों में सुनामी जैसी बाढ़ आ जाती है।

34 सालों में 5 गुना से ज्यादा बढ़ी झीलों की तादाद

रिसर्च के आंकड़े बताते हैं कि 1990 से 2024 के बीच हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियल झीलों की संख्या 107 से बढ़कर सीधे 669 पर पहुंच गई है। यह 34 वर्षों में करीब 525 फीसदी की भारी बढ़ोतरी है। केवल संख्या ही नहीं, बल्कि इन झीलों का कुल सतही क्षेत्रफल भी 102 फीसदी बढ़कर 5.54 वर्ग किलोमीटर से 11.20 वर्ग किलोमीटर हो गया है। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि बेहद छोटी झीलें, जिनका दायरा 0.01 वर्ग किलोमीटर या उससे कम है, उनकी संख्या 9 से उछलकर 487 हो गई है। ये छोटी झीलें तेजी से पानी जमा कर रही हैं और अस्थिर होकर कभी भी निचले इलाकों के लिए जलजला बन सकती हैं।

88 झीलों पर फटने का गंभीर खतरा

अध्ययन में शामिल 0.02 वर्ग किलोमीटर से बड़ी 94 झीलों में से 88 झीलें ऐसी पाई गईं, जो किसी भी वक्त आपदा का सबब बन सकती हैं। इनमें से 9 झीलों को अति-संवेदनशील यानी वेरी हाई हैजार्ड, 18 को हाई हैजार्ड और 26 को मीडियम हैजार्ड श्रेणी में रखा गया है। इन झीलों के फटने के पीछे प्राकृतिक डैम का कमजोर होना, भूकंप की आशंका, अंदर मौजूद बर्फ के कोर का पिघलना और चट्टानों का खिसकना मुख्य वजहें हैं। जब तेज बारिश या बादल फटने की घटना होती है, तो पानी का दबाव इन प्राकृतिक बांधों को तोड़ देता है।

ब्यास और सतलुज बेसिन में तबाही का सिमुलेशन मॉडल

वैज्ञानिकों ने संभावित नुकसान को समझने के लिए ब्यास और सतलुज नदी बेसिन की दो बेहद संवेदनशील झीलों का कंप्यूटर मॉडल तैयार किया। ब्यास बेसिन में हुर्ला गांव से 30 किलोमीटर दूर स्थित हिमसू झील के टूटने पर 1,385 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से पानी का सैलाब आ सकता है। वहीं सतलुज बेसिन की एक अन्य झील के फटने पर 3,507 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड का डिस्चार्ज पैदा हो सकता है। यह पानी रास्ते में आने वाली हर बसावट को कुछ ही मिनटों में जलमग्न करने की क्षमता रखता है।

हाइड्रो प्रोजेक्ट्स और 600 से अधिक इमारतों पर संकट

स्टडी के सबसे खराब स्थिति वाले मॉडल के मुताबिक, ब्यास बेसिन में उहल-3 जलविद्युत स्टेशन और पंडोह बांध के ढांचे समेत करीब 94 इमारतें बाढ़ की सीधी जद में हैं। सतलुज बेसिन में यह खतरा और भी बड़ा है, जहां कोलडैम और उसके पावरहाउस तथा रामपुर हाइड्रो प्रोजेक्ट सहित करीब 588 इमारतें पानी के तेज बहाव में तबाह हो सकती हैं। रणनीतिक रूप से अहम इन पनबिजली परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने से न केवल देश की बिजली आपूर्ति ठप हो सकती है, बल्कि अरबों रुपये का आर्थिक नुकसान भी होगा।

अलर्ट सिस्टम और नई सुरक्षा नीति की जरूरत

रिसर्चर्स ने राज्य और केंद्र सरकार को चेतावनी दी है कि वे बांध सुरक्षा नीति में GLOF के खतरे को तुरंत अनिवार्य रूप से शामिल करें। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि पंडोह बांध से कम से कम 25 किलोमीटर ऊपर और भाखड़ा बांध से 100 किलोमीटर ऊपर अर्ली वार्निंग सेंसर्स लगाए जाने चाहिए। समय रहते चेतावनी मिलने से न केवल डाउनस्ट्रीम में बसे लोगों को सुरक्षित निकाला जा सकेगा, बल्कि बांधों के पानी को नियंत्रित करके एक बड़ी मानवीय और ढांचागत त्रासदी को टाला जा सकेगा।

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