वंदे मातरम पर शर्मिला टैगोर की टिप्पणी से बहस तेज, कंगना रनौत ने दिया जवाब

वंदे मातरम को लेकर की गई टिप्पणी के बाद एक बार फिर राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस शुरू हो गई है। शर्मिला टैगोर ने गीत के उन हिस्सों पर सवाल उठाया है, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र है। इसके बाद बीजेपी सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने उनकी बात पर प्रतिक्रिया दी।

वंदे मातरम पर शर्मिला टैगोर की टिप्पणी से बहस तेज

वंदे मातरम पर शर्मिला टैगोर की टिप्पणी से बहस तेज

दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर की वंदे मातरम को लेकर की गई टिप्पणी के बाद एक बार फिर राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस शुरू हो गई है। शर्मिला टैगोर ने गीत के उन हिस्सों पर सवाल उठाया है, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र है। इसके बाद बीजेपी सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने उनकी बात पर प्रतिक्रिया दी।

कंगना ने कहा कि वंदे मातरम को सिर्फ धार्मिक नजरिए से नहीं देखना चाहिए। उनके मुताबिक, कविता और गीतों में कई बार शब्दों का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया जाता है।

शर्मिला टैगोर ने क्या कहा?

शर्मिला टैगोर ने कहा कि जो लोग केवल एक ईश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें वंदे मातरम के बाद के कुछ हिस्सों को गाने में परेशानी हो सकती है। इसकी वजह यह है कि इन हिस्सों में कई देवी-देवताओं का उल्लेख किया गया है।

उन्होंने कहा कि गीत के पहले दो अंतरे मातृभूमि की सुंदरता और उसकी प्रशंसा पर आधारित हैं और इन्हें ज्यादा लोग आसानी से स्वीकार कर सकते हैं।

कंगना रनौत ने क्या कहा?

शर्मिला टैगोर की टिप्पणी पर कंगना रनौत ने कहा कि किसी कविता या गीत को उसके शब्दों के सीधे अर्थ तक सीमित नहीं करना चाहिए।

कंगना के मुताबिक, वंदे मातरम में ‘शक्ति’ का मतलब केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि ताकत, साहस और देश के जागने की भावना भी हो सकता है।

कंगना ने कहा कि कलाकारों को कविता और उसके प्रतीकों को व्यापक नजरिए से देखना चाहिए।

वंदे मातरम का क्या है इतिहास?

वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा रहा। आजादी की लड़ाई के दौरान इस गीत ने लोगों में देशभक्ति की भावना जगाने का काम किया।

गीत के शुरुआती हिस्सों में मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन है, जबकि बाद के हिस्सों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों का जिक्र आता है।

इसी वजह से समय-समय पर इस गीत को लेकर अलग-अलग राय सामने आती रही है।

धार्मिक विविधता को लेकर क्यों उठता है सवाल?

शर्मिला टैगोर की बात का मुख्य आधार यह है कि भारत में अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। ऐसे में राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर सभी समुदायों की भावनाओं का ध्यान रखना जरूरी है।

वहीं, कंगना का कहना है कि वंदे मातरम को उसके ऐतिहासिक और साहित्यिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए और इसमें मौजूद धार्मिक प्रतीकों को व्यापक अर्थों में समझा जा सकता है।

वंदे मातरम फिर बना राजनीतिक मुद्दा

वंदे मातरम को लेकर यह बहस ऐसे समय में शुरू हुई है, जब यह गीत पहले से ही राजनीतिक चर्चा में है।

15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में हुए कार्यक्रम के बाद बीजेपी ने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी ने पूरे वंदे मातरम के गायन पर आपत्ति जताई थी। कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा था कि सोनिया गांधी पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी की व्यवस्था कराने की बात कर रही थीं।

अब शर्मिला टैगोर और कंगना रनौत की टिप्पणियों के बाद वंदे मातरम एक बार फिर चर्चा में है।

एक गीत, दो अलग-अलग नजरिए

शर्मिला टैगोर और कंगना रनौत की बातों से वंदे मातरम को देखने के दो अलग-अलग नजरिए सामने आए हैं। एक तरफ धार्मिक विविधता और सभी समुदायों की भावनाओं का सम्मान करने की बात है, तो दूसरी तरफ गीत के इतिहास, साहित्य और प्रतीकों को महत्व देने की बात कही जा रही है।

वंदे मातरम आजादी के आंदोलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण गीत रहा है और आज भी देश में इसका भावनात्मक महत्व बना हुआ है। यही वजह है कि इसके अर्थ और इस्तेमाल को लेकर बहस समय-समय पर सामने आती रहती है।

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