राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने शनिवार को IIT रुड़की के दीक्षांत समारोह में अपनी जिंदगी का करीब पांच दशक पुराना एक ऐसा किस्सा सुनाया, जिसमें एक इंटेलिजेंस मिशन, चीन की हिरासत, गलत नक्शे और एक बुजुर्ग तिब्बती शेरपा की सलाह—सब एक साथ जुड़ जाते हैं। लेकिन डोभाल की कहानी का असली मतलब सिर्फ एक पुराने ऑपरेशन की नाकामी नहीं है। इसका सबसे अहम हिस्सा वह सीख है, जिसे उन्होंने ‘मैप रीडिंग’ कहा।
डोभाल के मुताबिक, वह 20 की उम्र में एक युवा IPS अधिकारी थे और इंटेलिजेंस की दुनिया में नए-नए आए थे। उस समय उन्हें सिक्किम में इंटेलिजेंस की जिम्मेदारी दी गई थी। सिक्किम तब भारत का पूर्ण राज्य नहीं बना था और भारत के साथ उसके विलय की प्रक्रिया चल रही थी। डोभाल ने बताया कि उनकी जिम्मेदारियों में सीमा क्षेत्र पर नजर रखना और चीनी सेना यानी PLA की गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाना भी शामिल था।
यह संदर्भ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिक्किम सिर्फ एक प्रशासनिक इकाई नहीं था। हिमालय के इस छोटे से क्षेत्र की सीमा तिब्बत यानी चीन, नेपाल और भूटान से लगती है। 1975 में सिक्किम भारत का 22वां राज्य बना। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, 16 मई 1975 को उसे भारतीय संघ का हिस्सा बनाया गया और संविधान के 36वें संशोधन के जरिए उसके लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान भी किए गए।
‘मुझे लगा, करियर खत्म हो गया’
डोभाल ने बताया कि एक बार सीमा क्षेत्र में इंटेलिजेंस मिशन के लिए उनकी एक टीम भेजी गई। टीम को करीब आठ दिन में वापस लौटना था। आठ दिन बीते, फिर 10 दिन और देखते-देखते करीब 15 दिन गुजर गए। टीम की कोई खबर नहीं थी।
डोभाल को तब पता चला कि उनकी टीम चीनी सेना की हिरासत में है। टीम से पूछताछ की गई थी। बाद में बातचीत या किसी समझौते के बाद उन्हें वापस भारत भेजा गया।
इसके बाद जांच बैठी। उस समय डोभाल बेहद युवा थे और उन्होंने खुद माना कि उन्हें लगा कि यह घटना उनके करियर का अंत है। उन्होंने कहा कि उन्हें यह पूरा घटनाक्रम बेहद गैर-पेशेवर लगा था।
बुजुर्ग तिब्बती शेरपा ने क्या कहा?
डोभाल ने बताया कि उस समय इंटेलिजेंस ब्यूरो में उनके साथ एक बुजुर्ग तिब्बती शेरपा भी काम करते थे। पहाड़ों और बर्फीले इलाकों में रास्ता पहचानने का उन्हें लंबा अनुभव था।डोभाल ने बताया कि उस शेरपा ने उनसे कहा- उन्होंने (तिब्बती शेरपा ने) कहा कि उन्होंने 45 वर्षों तक इन पहाड़ियों में घूमते हुए समय बिताया है। उनके पास न तो कोई नक्शा था और न ही कंपास। लेकिन वे तीन बातें जानते थे। और जिसने भी इन तीन बातों को सीख लिया है, उसके लिए कोई भी मंजिल मुश्किल नहीं है।
इन तीन बातों ने मेरी जिंदगी को बहुत गहराई से प्रभावित किया है। शुरुआत में शायद बहुत सतही और औपचारिक तौर पर, लेकिन बाद में इनका असर मेरी जिंदगी पर कहीं ज्यादा गहरा हुआ।
उन्होंने कहा कि पहली बात यह है—क्या आपको पता है कि आप इस वक्त कहां हैं? आपको नक्शे की जानकारी होनी चाहिए और यह पता होना चाहिए कि आप कहां हैं।
दूसरी बात—आप जाना कहां चाहते हैं?
और तीसरी बात—वहां पहुंचने का रास्ता क्या है?
डोभाल ने इसमें एक और बात जोड़ी—अगर संभव हो तो वापसी का रास्ता भी पता होना चाहिए।
नक्शा और जिंदगी
यहीं डोभाल की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा सामने आता है। इंटेलिजेंस में नक्शा जमीन की तस्वीर देता है। लेकिन रणनीति में ‘नक्शा’ उससे कहीं बड़ा होता है। इसमें अपनी स्थिति की समझ, सामने वाले की क्षमता, उपलब्ध संसाधन, जोखिम और लक्ष्य सबकुछ शामिल होता है हैं। अगर आपकी शुरुआती जानकारी गलत है, आपका अपने बारे में, अपनी स्थिति के बारे में आकलन गलत है तो आगे सब सही हो जाए ये कहना सिर्फ एक आशा ही है ।
रणनीति का पहला नियम—अपनी स्थिति पहचानो
राष्ट्रीय सुरक्षा की भाषा में इसे ‘सिचुएशनल अवेयरनेस’ कहा जा सकता है। लेकिन डोभाल ने इसे बेहद सरल भाषा में समझाया—मैप रीडिंग।
आप कहां हैं, सामने कौन है, आपके पास कितने विकल्प हैं, किस रास्ते में जोखिम है और अगर पहला रास्ता बंद हो जाए तो वापसी या वैकल्पिक रास्ता क्या है ? यही किसी भी रणनीति की बुनियादी सोच है।
कभी-कभी गलत नक्शा आपको गलत जगह पहुंचा देता है। लेकिन अगर आप उस गलती से यह सीख लें कि अगली बार नक्शा भी पढ़ना है और जमीन भी, तो वही घटना आगे की यात्रा का हिस्सा बन जाती है। और शायद डोभाल की इस कहानी का सबसे सीधा सवाल भी यही है—
आपकी जिंदगी का नक्शा आपके हाथ में है, लेकिन क्या आपको सचमुच पता है कि आप इस वक्त कहां खड़े हैं? असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आपके हाथ में नक्शा है या नहीं। सवाल यह है कि आप उस नक्शे को पढ़ पा रहे हैं या नहीं।
