Amnesty India वर्ष 2018 में उस समय देश में तीखी बहस के केंद्र में आ गया था, जब संगठन ने बाल दुष्कर्म के दोषियों के लिए मौत की सजा के प्रावधान का विरोध किया था। यह वह दौर था जब नाबालिग बच्चियों के साथ हुई भयावह घटनाओं को लेकर देशभर में गुस्सा था और दोषियों को जल्द से जल्द कड़ी सजा देने की मांग उठ रही थी।
Amnesty India का तर्क था कि मौत की सजा यौन हिंसा को रोकने में प्रभावी नहीं होगी। संगठन ने इसके बजाय बेहतर जांच, मजबूत अभियोजन और मौजूदा कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू करने पर जोर दिया।
यह विवाद केंद्र सरकार के अप्रैल 2018 के उस फैसले के बाद सामने आया, जिसमें 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से दुष्कर्म के दोषियों के लिए मौत की सजा का प्रावधान करने वाले अध्यादेश को मंजूरी दी गई थी। यह फैसला कठुआ दुष्कर्म और हत्या मामले तथा उन्नाव दुष्कर्म मामले को लेकर देशभर में हुए आक्रोश के बीच लिया गया था। सरकार ने इसे महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से निपटने के लिए कड़े कदम के रूप में पेश किया था। इस बदलाव में नाबालिगों से जुड़े कुछ अन्य अपराधों के लिए न्यूनतम सजा भी बढ़ाई गई थी।
Amnesty ने क्यों किया विरोध?
Amnesty India ने सरकार के इस कदम को एक ऐसी दंडात्मक नीति बताया, जो आपराधिक न्याय व्यवस्था की कमजोरियों से ध्यान भटका सकती है। संगठन का रुख Amnesty International की लंबे समय से चली आ रही नीति पर आधारित था, जिसमें वह हर परिस्थिति में मौत की सजा का विरोध करता है।
2013 में दिल्ली गैंगरेप मामले के बाद भी संगठन ने इसी तरह का रुख अपनाया था। Amnesty का कहना था कि यौन हिंसा का समाधान मौत की सजा नहीं है, बल्कि संस्थागत और कानूनी प्रक्रियाओं में सुधार जरूरी है।
संगठन का तर्क था कि मौत की सजा से अपराध रोकने का कोई अलग या खास प्रभाव साबित नहीं हुआ है। इसके बजाय जांच को बेहतर बनाने, दोष साबित होने की संभावना बढ़ाने, पर्याप्त संख्या में न्यायाधीश नियुक्त करने और यौन हिंसा की शिकायतों को सही तरीके से दर्ज कर उनकी जांच सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
क्या बच्चों के साथ दुष्कर्म में मौत की सजा होनी चाहिए?
Amnesty India के रुख के बाद एक बड़ा सवाल उठा कि अगर पीड़ित बच्चा हो और अपराध बेहद गंभीर व क्रूर हो, तो क्या ऐसे मामले में दोषी को न्याय व्यवस्था की सबसे कठोर सजा मिलनी चाहिए?
Amnesty India का जवाब था कि अपराध की गंभीरता उसकी मौत की सजा के विरोध की नीति को नहीं बदलती। Amnesty International की नीति सभी परिस्थितियों में मौत की सजा का विरोध करने की है, चाहे अपराध की प्रकृति या परिस्थितियां कुछ भी हों।
वहीं, सरकार के फैसले का समर्थन करने वालों का तर्क था कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध बेहद गंभीर होते हैं और कानून में इसकी गंभीरता दिखाई देनी चाहिए। वर्ष 2018 की बहस सिर्फ सजा को लेकर नहीं थी, बल्कि इस बड़े सवाल पर भी थी कि अपराध रोकने के लिए कड़ी सजा ज्यादा प्रभावी है या फिर दोषियों का निश्चित और जल्द सजा पाना।
उस समय की रिपोर्टों में यह भी सामने आया था कि बाल अधिकार संगठनों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मौत की सजा का विरोध किया था, जबकि सरकार ने इसे अपराध रोकने के लिए जरूरी कदम बताया था।
मौत की सजा और अपराध की रिपोर्टिंग पर भी बहस
मौत की सजा के विरोध में एक तर्क यह भी दिया गया कि बच्चों के साथ यौन शोषण के कई मामलों में आरोपी पीड़ित के परिचित या रिश्तेदार होते हैं। ऐसे में परिवार शिकायत दर्ज कराने से डर सकता है, क्योंकि दोष साबित होने पर आरोपी को मौत की सजा मिलने की संभावना हो सकती है।
कार्यकर्ताओं ने यह आशंका भी जताई थी कि कुछ मामलों में आरोपी पीड़ित को गवाह के रूप में खत्म करने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, ये तर्क मानवाधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं की ओर से रखी गई आशंकाएं थीं, न कि हर मामले में होने वाली घटनाओं के स्थापित निष्कर्ष।
POCSO कानून के क्रियान्वयन पर भी उठे सवाल
इस बहस के दौरान Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी सवाल उठे। उस समय की रिपोर्टों में कहा गया था कि बच्चों के लिए बनाए गए कानून में मौजूद कई सुरक्षा उपायों को पूरी तरह लागू नहीं किया जा रहा था।
आलोचकों का कहना था कि अगर जांच में देरी हो, मुकदमों में लंबा समय लगे और पीड़ित बच्चों को पर्याप्त सहायता न मिले, तो केवल अधिकतम सजा बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा।
दूसरी ओर, Amnesty India की आलोचना करने वालों का कहना था कि संगठन दोषी या आरोपी के अधिकारों पर ज्यादा ध्यान दे रहा है, जबकि यौन हिंसा का शिकार हुआ बच्चा और उसका परिवार जिंदगीभर इसके गंभीर प्रभाव झेल सकते हैं।
Amnesty का कहना था कि यह उसकी वैश्विक नीति है
Amnesty India का जवाब था कि मौत की सजा का विरोध किसी खास अपराध या अपराधी के लिए बनाई गई नीति नहीं है। यह Amnesty International की वैश्विक और लंबे समय से चली आ रही नीति का हिस्सा है।
बाद के वर्षों में भी संगठन ने इस मुद्दे पर अपना रुख नहीं बदला। वर्ष 2024 में Amnesty International ने पश्चिम बंगाल में कुछ दुष्कर्म मामलों में मौत की सजा के प्रावधानों का भी विरोध किया। संगठन ने कहा कि सरकारों को प्रभावी जांच, पुलिस सुधार, अपराध की रोकथाम और जवाबदेही पर ध्यान देना चाहिए।
दो अलग-अलग विचारों के बीच बहस
Amnesty India से जुड़ा यह विवाद मानवाधिकार के सिद्धांतों और गंभीर अपराधों में कड़ी सजा की मांग के बीच टकराव को सामने लाता है। इसमें कोई विवाद नहीं है कि बच्चों का यौन शोषण बेहद गंभीर अपराध है। बहस इस बात पर है कि अपराध रोकने, न्याय दिलाने और समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कौन-सी सजा सबसे प्रभावी हो सकती है।
भारत ने 2018 में कुछ बाल दुष्कर्म मामलों में मौत की सजा का प्रावधान किया, जबकि Amnesty International अब भी किसी भी परिस्थिति में मौत की सजा के इस्तेमाल का विरोध करता है।
इस बहस के केंद्र में दो अलग-अलग सिद्धांत हैं—एक तरफ बेहद गंभीर अपराधों के लिए सबसे कड़ी सजा की मांग और दूसरी तरफ यह विचार कि राज्य को किसी दोषी व्यक्ति का जीवन समाप्त करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
