बिरसा मुंडा 19वीं सदी के अंत में अंग्रेजी शासन और आदिवासी समाज के शोषण के खिलाफ हुए मुंडा विद्रोह (उलगुलान) के प्रमुख नेता थे। उनकी भूमिका को लेकर अब एक नई वैचारिक बहस सामने आई है। चर्चा इस बात पर है कि क्या बिरसा मुंडा को आज के राजनीतिक संदर्भ में ब्राह्मणवाद के विरोधी के रूप में पेश करना ऐतिहासिक रूप से सही है।
1875 में छोटानागपुर क्षेत्र में जन्मे बिरसा मुंडा ऐसे समय में आदिवासी समाज के बीच एक धार्मिक और राजनीतिक नेता के रूप में उभरे, जब उनकी जमीन, परंपराओं और आजीविका पर दबाव बढ़ रहा था। उनके नेतृत्व में हुए उलगुलान ने ब्रिटिश शासन के साथ-साथ आदिवासी जमीन पर कब्जे और शोषण की उन व्यवस्थाओं का भी विरोध किया, जिनमें बाहरी लोगों, जमींदारों और दूसरे बिचौलियों की भूमिका थी।
फुले और अंबेडकर के साथ जोड़े जाने पर बहस
बिरसा मुंडा का नाम आज कई बार ज्योतिराव फुले और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के साथ राजनीतिक और छात्र आंदोलनों में लिया जाता है। इसी संदर्भ में “ब्राह्मणवाद की छाती पर, बिरसा, फुले, अंबेडकर” जैसे नारे भी सामने आए हैं। इन नारों के जरिए तीनों नेताओं को ब्राह्मणवाद के विरोध से जोड़कर देखा जाता है।
हालांकि, तीनों नेताओं का समय, सामाजिक पृष्ठभूमि और उनके आंदोलनों का स्वरूप अलग-अलग था। इसलिए बिरसा मुंडा की विचारधारा को सीधे फुले और अंबेडकर की विचारधारा के समान मानना ऐतिहासिक रूप से जटिल विषय है।
JNU में भी बिरसा मुंडा के नाम का इस्तेमाल
दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की छात्र राजनीति में भी बिरसा मुंडा का नाम सामने आता रहा है। वर्ष 2014 में बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन (BAPSA) का गठन हुआ था। संगठन ने खुद को ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद के विरोध तथा समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के लिए काम करने वाला संगठन बताया है।
JNU की छात्र राजनीति में BAPSA ने अंबेडकरवादी विचारधारा को सामने रखा और अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले छात्र संगठनों के बीच अपनी पहचान बनाई।
ईसाई मिशनरियों से जुड़ाव और बाद में अलग रास्ता
बिरसा मुंडा के धार्मिक जीवन को लेकर भी अलग-अलग विवरण मिलते हैं। युवावस्था में वे कुछ समय ईसाई मिशनरी वातावरण के संपर्क में रहे थे। बाद में उन्होंने ईसाई धर्म से दूरी बनाई और अपने अनुयायियों के बीच एक अलग धार्मिक आंदोलन का नेतृत्व किया।
उनके आंदोलन में आदिवासी समाज में सुधार और सामाजिक अनुशासन पर भी जोर दिया गया। कुछ ऐतिहासिक विवरणों में उनके विचारों पर हिंदू धार्मिक परंपराओं के प्रभाव का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि, इतिहासकार और अलग-अलग स्रोत इन पहलुओं की अलग-अलग व्याख्या करते हैं।
आदिवासी जमीन और अधिकार थे आंदोलन के केंद्र में
बिरसा मुंडा के आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा आदिवासी जमीन और स्वायत्तता था। मुंडा समाज में जमीन से जुड़ी पारंपरिक सामुदायिक व्यवस्थाएं थीं। लेकिन 19वीं सदी में ब्रिटिश नीतियों, जमींदारों, साहूकारों और दूसरे बाहरी लोगों के बढ़ते प्रभाव ने इन व्यवस्थाओं को कमजोर किया।
आदिवासी समाज में बाहरी लोगों के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘दिकू’ शब्द का भी इस संघर्ष में महत्वपूर्ण स्थान था। बिरसा मुंडा के नेतृत्व में आंदोलन ने अंग्रेजी प्रशासन और उन व्यवस्थाओं का विरोध किया, जिनके कारण आदिवासी अपनी जमीन और संसाधनों से दूर होते जा रहे थे।
धार्मिक सुधार पर भी दिया जोर
बिरसा मुंडा का आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि उसका धार्मिक और सामाजिक पक्ष भी था। उनके आंदोलन से जुड़े विवरणों में शराब के अत्यधिक सेवन और कुछ ऐसी सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं का विरोध मिलता है, जिन्हें वे समाज के लिए नुकसानदायक मानते थे।
उन्होंने अपने अनुयायियों को सामाजिक अनुशासन और आदिवासी धार्मिक परंपराओं की ओर लौटने का संदेश दिया। इसी वजह से बिरसा मुंडा को केवल अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने वाले नेता के रूप में देखना उनके आंदोलन के पूरे स्वरूप को नहीं बताता।
25 साल की उम्र में जेल में हुई मौत
1899 और 1900 के बीच उलगुलान तेज हुआ, लेकिन ब्रिटिश प्रशासन ने इसे दबा दिया। बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया गया और जून 1900 में रांची जेल में उनकी मौत हो गई। उस समय उनकी उम्र केवल 25 साल थी।
कम उम्र में निधन के बावजूद बिरसा मुंडा आदिवासी प्रतिरोध और अधिकारों के बड़े प्रतीक बन गए। आज उनका नाम देशभर में राजनीतिक भाषणों, सरकारी कार्यक्रमों, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक आंदोलनों में लिया जाता है।
बिरसा मुंडा की विरासत को लेकर जारी बहस
बिरसा मुंडा को मानने वाले लोगों के लिए वे मुख्य रूप से अंग्रेजी शासन, आदिवासी जमीन के कब्जे और शोषण के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक हैं। वहीं, आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में उनके नाम को जाति, सामाजिक न्याय और पहचान से जुड़े मुद्दों के साथ भी जोड़ा जाता है।
यही अंतर मौजूदा बहस का मुख्य कारण है। एक तरफ बिरसा मुंडा के जीवन और आंदोलन को उस समय के ऐतिहासिक संदर्भ में समझने की जरूरत है, तो दूसरी तरफ आज के राजनीतिक आंदोलनों में उनके नाम और विरासत की अलग-अलग व्याख्याएं की जा रही हैं।
इसलिए बिरसा मुंडा को किसी एक आधुनिक राजनीतिक विचारधारा में सीमित करने के बजाय उनके अंग्रेजी शासन के विरोध, आदिवासी जमीन और अधिकारों की लड़ाई, धार्मिक सुधार और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर समझना अधिक व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ देता है।
