ब्रिटेन यानी यूनाइटेड किंगडम (UK) के भविष्य को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों के संवैधानिक भविष्य को तय करने के अधिकार को लेकर साथ आने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। कार्डिफ में हुई इस अहम बैठक ने ब्रिटेन की एकता और भविष्य को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।
इस बैठक में स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी, वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर रून एपी इओर्थ और उत्तरी आयरलैंड की फर्स्ट मिनिस्टर मिशेल ओ’नील शामिल हैं। सिन फेन की अध्यक्ष मैरी लू मैकडोनाल्ड के भी इसमें शामिल होने की उम्मीद है। इन नेताओं से जुड़े दलों की राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं, लेकिन वे अपने क्षेत्रों को ज्यादा अधिकार देने और भविष्य में आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग करते रहे हैं।
तीनों क्षेत्रों के बीच बढ़ेगा सहयोग
प्रस्तावित घोषणा में संवैधानिक आत्मनिर्णय के अलावा अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, यूरोप से संबंध और अंतरराष्ट्रीय मामलों जैसे मुद्दों पर सहयोग की बात शामिल हो सकती है। राजनीतिक दलों के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाने की भी संभावना है। इसका उद्देश्य संवैधानिक बदलाव से जुड़े मुद्दों पर आपसी तालमेल बढ़ाना होगा।
अगर तीनों क्षेत्र मिलकर अपनी मांगें उठाते हैं, तो ब्रिटेन की केंद्र सरकार यानी वेस्टमिंस्टर पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। इससे यह सवाल भी मजबूत हो सकता है कि क्या ब्रिटेन की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत है।
स्कॉटलैंड में फिर उठ रहा आजादी का मुद्दा
स्कॉटलैंड में ब्रिटेन से अलग होने की मांग काफी पुरानी है। वर्ष 2014 में स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता को लेकर जनमत संग्रह हुआ था। उस समय लोगों ने ब्रिटेन के साथ रहने के पक्ष में मतदान किया था। हालांकि, इसके बाद भी स्वतंत्रता का मुद्दा खत्म नहीं हुआ।
2016 में ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ (EU) से अलग होने के लिए मतदान किया, जबकि स्कॉटलैंड के ज्यादातर मतदाताओं ने EU में बने रहने के पक्ष में वोट दिया था। इसके बाद स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता की मांग को फिर से मजबूती मिली।
स्कॉटलैंड के नेता जॉन स्विनी का कहना है कि राजनीतिक परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। उनका तर्क है कि अब स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में ऐसे दलों की सरकारें हैं जो अपने क्षेत्रों के लिए ज्यादा अधिकार या आत्मनिर्णय की मांग करते हैं।
वेल्स और उत्तरी आयरलैंड का मामला अलग
वेल्स में भी राजनीतिक बदलाव देखने को मिला है। प्लेड कमरी ने वेल्श संसद के चुनावों के बाद मजबूत स्थिति बनाई है। पार्टी लंबे समय से वेल्स को ज्यादा अधिकार देने की मांग करती रही है। इसमें वेल्स के राजस्व और प्राकृतिक संसाधनों पर ज्यादा नियंत्रण की मांग भी शामिल है। खास तौर पर क्राउन एस्टेट और समुद्री ऊर्जा परियोजनाओं से होने वाली आय पर अधिकार का मुद्दा उठाया जा रहा है।
वहीं उत्तरी आयरलैंड का मामला स्कॉटलैंड और वेल्स से अलग है। वहां संवैधानिक बहस मुख्य रूप से आयरलैंड के साथ एकीकरण यानी संयुक्त आयरलैंड के मुद्दे से जुड़ी है। सिन फेन लंबे समय से आयरलैंड के एकीकरण का समर्थन करता रहा है। हालांकि, उत्तरी आयरलैंड की संवैधानिक स्थिति में बदलाव वहां की जनता की लोकतांत्रिक इच्छा के आधार पर ही हो सकता है।
क्या सच में टूट सकता है ब्रिटेन?
तीनों क्षेत्रों के नेताओं का एक साथ आना निश्चित तौर पर ब्रिटेन की केंद्र सरकार के लिए चुनौती है, लेकिन इससे यह नहीं माना जा सकता कि ब्रिटेन जल्द ही टूटने वाला है। किसी भी क्षेत्र के स्वतंत्र होने के लिए लंबी राजनीतिक और कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा।
अगर भविष्य में अलग होने की स्थिति बनती है तो सीमा, सरकारी कर्ज और संपत्ति, रक्षा, व्यापार, मुद्रा, अंतरराष्ट्रीय समझौतों और यूरोपीय संघ जैसे संगठनों से संबंधों पर कई बड़े सवाल उठेंगे।
फिलहाल कार्डिफ की बैठक को ब्रिटेन के टूटने की शुरुआत के बजाय संवैधानिक बदलाव की मांग को लेकर बढ़ते राजनीतिक तालमेल के तौर पर देखा जा रहा है। अगर आने वाले समय में स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड अपने मुद्दों पर लगातार एक साथ आवाज उठाते हैं, तो प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम की सरकार पर दबाव बढ़ सकता है।
