मोदी के ‘सेवा संकल्प’ को सरस्वती के पुनरुद्धार से जोड़ रहा हरियाणा, ‘आदि बद्री’ से सभ्यता और संस्कृति को सहेजने की मुहिम

पीएम मोदी के जन्मदिन पर ‘आशा का दीप’ से शुरुआत, हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड ने प्राचीन जलधारा, तीर्थ और विरासत के संरक्षण को बनाया सेवा अभियान का हिस्सा

सरस्वती धरोहर विकास बोर्‍ के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमिच सरस्वती के उद्गम स्थल पर

पीएम मोदी के जन्मोत्सव पर सरस्वती नदी के उद्गम स्थल पर दीपोत्सव का आयोजन करते हुए सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमिच

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन से शुरू हुए सेवा अभियान को हरियाणा में हजारों वर्ष पुरानी सभ्यतागत विरासत से जोड़ने की एक अनूठी पहल की जा रही है। हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड ने सरस्वती के पौराणिक उद्गम क्षेत्र आदि बद्री में नदी के पुनरुद्धार, जल संरक्षण और इससे जुड़े प्राचीन तीर्थों के विकास के काम को इस अभियान से जोड़ा है।

बोर्ड के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमिच ने प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन की संध्या पर आदि बद्री में आशा का दीप प्रज्ज्वलित कर उनके दीर्घायु होने की कामना की थी। किरमिच के मुताबिक, इसके बाद सेवा अभियान के दौरान सरस्वती से जुड़े स्थलों के संरक्षण, पुनरुद्धार और उन्हें नई पहचान दिलाने के प्रयासों को आगे बढ़ाया जा रहा है।

इस पूरी पहल के केंद्र में एक नदी ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी भारत की प्राचीन सभ्यतागत स्मृति भी है।

ऋग्वेद कीनदीतमासरस्वती

ऋग्वेद में सरस्वती का उल्लेख बारबार मिलता है। ऋग्वेद 2.41.16 में उन्हें अम्बितमे, नदीतमे, देवितमे सरस्वति अर्थात माताओं, नदियों और देवियों में श्रेष्ठ कहा गया है। दूसरे वैदिक मंत्रों में सरस्वती को पर्वतों से समुद्र की ओर प्रवाहित होने वाली शक्तिशाली जलधारा के रूप में वर्णित किया गया है। IGNCA के प्रकाशित साहित्य में भी सरस्वती को ऋग्वेद की अत्यंत महत्वपूर्ण नदी के रूप में रेखांकित किया गया है।

सरस्वती की ऐतिहासिक पहचान और हड़प्पा सभ्यता के साथ उसके संबंध को लेकर लंबे समय से इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और भूवैज्ञानिकों के बीच बहस रही है। पुराने इतिहासलेखन में हड़प्पा सभ्यता को मुख्यतः Indus Valley Civilization के रूप में देखा गया और वैदिक संस्कृति से उसके संबंध को लेकर अलगअलग मत सामने आए। आर्य आक्रमण की पुरानी परिकल्पना में भी समय के साथ बड़े बदलाव आए हैं और आज इस विषय पर कहीं अधिक जटिल विमर्श मौजूद है। लेकिन इसी बहस के बीच आधुनिक रिमोट सेंसिंग और भूवैज्ञानिक अध्ययनों ने उत्तरपश्चिम भारत में प्राचीन नदीमार्गों को लेकर महत्वपूर्ण प्रमाण सामने रखे हैं।

सैटेलाइट से सामने आई प्राचीन जलधारा

भारत सरकार ने 2013 में लोकसभा में बताया था कि ISRO ने भारतीय रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट डेटा और डिजिटल इलेवेशन मॉडल्स की सहायता से उत्तरपश्चिम भारत में सरस्वती से जोड़े गए पैलियो चैनल्स का एक समेकित नक्शा तैयार किया। इन पैलियो चैनल्स को ऐतिहासिकवेदोक्त नक्शों, पुरातत्व साइटों, जल धाराओं और ड्रिलिंग डेटा के आधार पर भी जांचा गया। सरकार के अनुसार कालीबंगा, बनावली, राखीगढ़ी, धोलावीरा और लोथल जैसे कई प्रमुख हड़प्पा स्थल इस खोजे गए पैलियो चैनल सिस्टम के आसपास स्थित हैं।

केंद्र सरकार ने 2022 में भी संसद में बताया कि इसरो, हरियाणा स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों ने पैलियो चैनल्स की मैपिंग की है। अभिलेखों और वैज्ञानिक पड़तालों के आधार पर आदि बद्री से पंजाब में घग्गर तक लगभग 200 किलोमीटर के रास्ते की पहचान किए जाने की जानकारी भी सरकार ने दी थी।

अदृश्य जलधारा को फिर प्रवाह देने की कोशिश

हरियाणा सरकार ने 12 अक्टूबर 2015 को हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड का गठन किया था। इसके आधिकारिक उद्देश्यों मेंसरस्वती धरोहरपर शोध, विरासत का संरक्षण एवं पुनरुद्धार, पैलियो चैनल्स के साथ सांस्कृतिक और पर्यटन कॉरिडोर विकसित करना, जलाशयों का निर्माण और प्राचीन जलमार्गों से जुड़े क्षेत्रों का पुनर्जीवन शामिल है।

बोर्ड के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमिच के अनुसार अब कोशिश केवल प्राचीन नदी का रास्ता पहचानने तक सीमित नहीं है, बल्कि चिन्हित जलमार्ग में फिर से जल प्रवाह और आसपास के क्षेत्रों में ग्राउंड वाटर रिचार्ज की संभावनाएं विकसित करने की भी है।

इसी उद्देश्य से हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के बीच आदि बद्री बांध को लेकर समझौता किया गया। केंद्र सरकार के मुताबिक बांध में संग्रहित पानी का प्रमुख उपयोग सरस्वती के पुनरुद्धार और इससे जुड़ी विरासत के विकास के लिए किया जाना है। फिलहाल ये बांध रिकॉर्ड समय में ही टेंडर स्टेज तक पहुंच चुका है और जल्द ही इसका निर्माण शुरू होने की संभावना है।

अगस्त 2026 में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में हुई बोर्ड की बैठक में सरकार ने बताया कि 350 एकड़ में सरस्वती जलाशय विकसित किया जा रहा है और IIT Roorkee से भी विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कराने का निर्णय लिया गया है।

आदि बद्री को नई पहचान देने की तैयारी

धुम्मन सिंह किरमिच के मुताबिक सरस्वती के उद्गम क्षेत्र के विकास के साथ आदि बद्री मंदिर और माता मंत्रा से जुड़े स्थल के जीर्णोद्धार तथा पूरे क्षेत्र को सांस्कृतिकधार्मिक पहचान दिलाने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।

किरमिच ने इस अभियान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन से जुड़े सेवा कार्यक्रमों को समर्पित करते हुए कहा कि सरस्वती का पुनरुद्धार केवल किसी प्राचीन नदी को खोजने का प्रयास नहीं है, बल्कि जल, पर्यावरण, इतिहास, आस्था और भारत की सभ्यतागत विरासत को एक साथ संरक्षित करने का अभियान है।

आज इसलिए आदि बद्री में चल रहा प्रयोग अपने आप में दिलचस्प है। आधुनिक सैटेलाइट मैपिंग, हाइड्रोलॉजी और इंजीनियरिंग की मदद से उस प्राचीन जलमार्ग को समझने और पुनर्जीवित करने का प्रयास हो रहा है, जिसका वर्णन भारत के सबसे पुराने ग्रंथों में मिलता है।

प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन से शुरू हुए सेवा अभियान के बीच हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड का संदेश भी इसी दिशा में है। उनका संदेश है कि सेवा केवल वर्तमान की नहीं, अपनी प्राकृतिक और सभ्यतागत विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजने की भी है।

Exit mobile version