दुनिया भर में यूरेनियम की कमी की आशंका गहराती जा रही है। ऐसे वक्त में भारत के जाने-माने परमाणु वैज्ञानिक और परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) के पूर्व चेयरमैन डॉ. अनिल काकोदकर ने बड़ा सुझाव दिया है। 6th इंटरनेशनल क्लाइमेट समिट में बोलते हुए उन्होंने कहा कि यूरेनियम सप्लाई मार्केट में आने वाली भविष्य मे आने वाली कमी को देखते हुए भारत को अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में तुरंत थोरियम को शामिल करना चाहिए। काकोदकर के मुताबिक, भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा थोरियम भंडार मौजूद है, लेकिन इसका पूरा फायदा उठाने के लिए हमें फ्यूल रीसाइक्लिंग और आधुनिक तकनीक पर तेजी से काम करना होगा।
दुनिया में यूरेनियम का क्या संकट खड़ा हो रहा है?
दुनिया भर में नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन हासिल करने के लिए परमाणु ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है। ‘डिक्लेरेशन टू ट्रिपल न्यूक्लियर एनर्जी’ के तहत 2050 तक वैश्विक परमाणु क्षमता 1,200 गीगावाट करने का लक्ष्य है, जबकि वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन का अनुमान है कि यह 1,446 गीगावाट तक पहुंच सकती है। डॉ. काकोदकर के अनुसार मौजूदा व्यवस्था में उपलब्ध यूरेनियम केवल 550 से 750 गीगावाट क्षमता को 50–70 साल तक चला सकता है। लेकिन जब मांग 1,400 गीगावाट से ज्यादा पहुंचेगी, तो यूरेनियम की भारी किल्लत तय है। बाजार में अभी से इसका दबाव दिखने लगा है, इसलिए भारत को समय रहते विकल्प तलाशना होगा।
वन्स-थ्रू’ बनाम ‘रीसाइक्लिंग’, 70 से 100 गुना ज्यादा बिजली का फॉर्मूला क्या है?
काकोदकर ने बताया कि भारत, फ्रांस और रूस जैसे गिने-चुने देशों को छोड़कर ज्यादातर देश ‘वन्स-थ्रू फ्यूल साइकिल’ (Once-through cycle) अपनाते हैं। जिसमें साइकिल: इसमें यूरेनियम को रिएक्टर में सिर्फ एक बार ईंधन के रूप में जलाया जाता है और बचे हुए हिस्से को न्यूक्लियर कचरा मानकर छोड़ दिया जाता है। इससे यूरेनियम की ऊर्जा क्षमता बेहद सीमित रह जाती है। रीसाइक्लिंग में जरिए इस्तेमाल हो चुके ईंधन को दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। इससे ईंधन की ऊर्जा क्षमता 70 से 100 गुना बढ़ जाती है।
भारत के पास खजाना, फिर भी थोरियम का इस्तेमाल सीधा क्यों नहीं हो सकता?
भारत के समुद्री तटों खासकर केरल और ओडिशा की रेत में भारी मात्रा में मोनाजाइट पाया जाता है, जिसमें थोरियम प्रचुर मात्रा में है। भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा थोरियम भंडार है, लेकिन इसमें एक तकनीकी पेंच भी है। दरअसल यूरेनियम-235 ‘फिसाइल’ (विखंडनीय) होता है, यानी यह सीधे न्यूट्रॉन से टकराकर टूटता है और ऊर्जा पैदा करता है। जबकि थोरियम-232 ‘फर्टाइल’ होता है, यानी यह अपने आप ऊर्जा नहीं देता। थोरियम को पहले रिएक्टर में यूरेनियम या प्लूटोनियम के साथ रखकर इसे तपाना पड़ता है। इसके बाद थोरियम बदलकर यूरेनियम-233 बनता है, जो एक फिसाइल ईंधन है और बिजली बना सकता है। इसलिए बिना रीसाइक्लिंग तकनीक के थोरियम का सीधा इस्तेमाल मुमकिन नहीं है।
थोरियम के इस्तेमाल से भारत को क्या 4 बड़े फायदे होंगे?
पहला फायदा सुरक्षा का है , थोरियम आधारित ईंधन पारंपरिक यूरेनियम के मुकाबले रिएक्टर में ज्यादा स्थिर और सुरक्षित व्यवहार करता है। दूसरी ओर इससे महंगे और आयातित यूरेनियम पर निर्भरता घटेगी, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी। तीसरा थोरियम से निकलने वाला रेडियोधर्मी कचरा बहुत कम समय के लिए सक्रिय रहता है, जिससे वेस्ट मैनेजमेंट का संकट कम होता है।
और चौथा सबसे जरुरी फायदा है उर्जा सुरक्षा और संप्रुभता का। इसके बाद भारत अपनी परमाणु ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी दूसरे देश के यूरेनियम पर निर्भर नहीं रहेगा।
दुनिया जब यूरेनियम की कमी से जूझने की कगार पर होगी, तब थोरियम और रीसाइक्लिंग तकनीक में आत्मनिर्भर भारत न सिर्फ अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी सबसे मजबूत स्थिति में होगा।
