जावेद अख्तर बनाम आनंद रंगनाथन: मौलाना आज़ाद की एक लाइन ने क्यों खोल दिया इतिहास का पूरा पिटारा

मौलाना आजाद के भाषण को लेकर क्यों छिड़ी बहस, क्या कहता है ‘खुतबात-ए-आजाद’?

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कभी-कभी एक ट्वीट किसी किताब की धूल झाड़ देता है। यहां भी यही हुआ। मामला शुरू हुआ एक कथित उद्धरण से, जिसे लेखक-टिप्पणीकार आनंद रंगनाथन ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के एक पुराने भाषण से जोड़कर पेश किया। अभिनेता-लेखक जावेद अख्तर को यह बात हज़म नहीं हुई। उन्होंने सीधा सवाल दागा कि क्या इसका कोई प्रामाणिक स्रोत है? उनकी दलील थी कि यह भाषा उस मौलाना आज़ाद से मेल नहीं खाती, जिन्हें वे जानते हैं कि यानी हिंदू-मुस्लिम एकता और आधुनिक भारत की नींव रखने वाला नेता।

जवाब आया एक किताब के हवाले से यान ‘खुतबात-ए-आज़ाद’। सवाल यह है कि इस किताब में असल में है क्या, और क्या यह पूरा विवाद सिर्फ ट्विटर की बहस है या इतिहास की एक भूली-बिसरी परत खुल रही है? पहले साफ कर दें कि किताब असली है।

कौन सी किताब का जिक्र है ?

‘Khutbat-e-Azad’ कोई गढ़ी हुई चीज़ नहीं है। Rekhta पर मौजूद संस्करण में यह मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की किताब के तौर पर दर्ज है, जिसमें उनके अलग-अलग दौर के भाषणों का संकलन है। इसी संग्रह में 28-29 फरवरी 1920 को बंगाल प्रांतीय खिलाफत सम्मेलन में दिए गए उनके अध्यक्षीय भाषण का भी ज़िक्र मिलता है।

और यह कोई अस्पष्ट स्रोत नहीं है। विदेश मंत्रालय के तहत काम करने वाली संस्था ICCR भी अपनी सूची में ‘खुतबात-ए-आज़ाद’ को आज़ाद से जुड़े प्रमुख दस्तावेज़ों में गिनती है। तो विवाद की पहली परत—क्या ऐसी किताब और ऐसा भाषण वजूद रखता है—का जवाब सीधा हां है।

अब असली सवाल: वह भाषण किस माहौल में दिया गया था?

यहीं से कहानी दिलचस्प मोड़ लेती है। रंगनाथन के मुताबिक जो उद्धरण वायरल हुआ, वह उस दौर का है जब खिलाफत आंदोलन अपने उफान पर था। पहला विश्व युद्ध खत्म हो चुका था, ऑटोमन साम्राज्य और खिलाफत का भविष्य अधर में लटका था, और भारत के मुसलमानों के बीच इसे लेकर गहरी बेचैनी थी।

इतिहास के दस्तावेज़ भी बताते हैं कि 1920 के उस बंगाल सम्मेलन में आज़ाद ने खिलाफत, भारतीय मुसलमानों की ज़िम्मेदारी और अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ असहयोग जैसे मसलों पर खुलकर बात की थी। एक अकादमिक अध्ययन बताता है कि उस भाषण में कुरान-हदीस के हवाले से राजनीतिक कार्रवाई तक की बात हुई थी।

मतलब साफ है—आज़ाद को सिर्फ आज़ाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री के चश्मे से देखना अधूरा है। उनकी राजनीतिक ज़िंदगी के शुरुआती बरसों में खिलाफत और पैन-इस्लामिक सोच का भी बड़ा हिस्सा था।

वो ‘तुर्क के पैर में कांटा’ वाली बात आखिर है क्या?

जिस अंश पर सबसे ज़्यादा बवाल मचा, उसका लब्बोलुबाब यह है कि मुस्लिम समुदाय को एक शरीर की तरह देखा गया, जिसमें दुनिया के किसी कोने में किसी मुसलमान को तकलीफ हो तो बाकी मुसलमानों को भी उसका दर्द महसूस होना चाहिए। रंगनाथन ने जो हवाला दिया, उसमें आज़ाद ने यही तर्क शरीर और उसके अंगों की मिसाल और हदीसों के ज़रिए समझाया था। मौलाना आजाद  उस वक्त आज़ाद अंग्रेज़ों के खिलाफ एक ऐसी लड़ाई का हिस्सा थे, जिसमें भारतीय मुसलमानों की धार्मिक फिक्र और भारत की सियासी आज़ादी की मांग एक-दूसरे में गुंथी हुई थी।

तो कौन थे आज़ाद ?

ये कहना तो मुश्किल है? जावेद अख्तर का सवाल सही था, जब किसी बड़े नेता के नाम पर सोशल मीडिया पर घूम रही लाइन को सिर्फ इसलिए सच मान लेना कि वह अपनी राजनीतिक सोच से मेल खाती है तो यह आदत खतरनाक है। स्रोत मांगना सही आदत है। लेकिन जब स्रोत यानी ‘खुतबात-ए-आज़ाद’ और उससे जुड़ा भाषण सामने आ ही गया है, तो सवाल उठता है कि उनकी असल पहचान क्या थी ?

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