स्त्री: भारतीय स्त्री-विमर्श और नारीत्व की पुनर्परिभाषा

स्त्री भारतीय स्त्री-विमर्श को पश्चिमी प्रतिमानों के अनुकरण से आगे ले जाकर भारतीय ज्ञान परंपरा के भीतर स्त्री की अवधारणा को पुनः देखने का अवसर प्रदान करती है।

स्त्री भारतीय स्त्री-विमर्श को पश्चिमी प्रतिमानों के अनुकरण से आगे ले जाकर भारतीय ज्ञान परंपरा के भीतर स्त्री की अवधारणा को पुनः देखने का अवसर प्रदान करती है।

डॉ. शुचि चौहान द्वारा रचित स्त्री भारतीय स्त्रीविमर्श के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कृति है। यह पुस्तक भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित स्त्री के विशिष्ट स्वरूप और उसकी सामाजिकसांस्कृतिक स्थिति को रेखांकित करने का प्रयास करती है। पुस्तक को छह विस्तृत अध्यायों में सुविचारित ढंग से विभाजित किया गया है। इसकी शुरुआत एक व्यापक भूमिका से होती है, जिसमें आधुनिक भारत में महिलाओं की बदलती भूमिकाओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को रेखांकित करते हुए उनके गौरवशाली अतीत का भी स्मरण किया गया है। पुस्तक की एक प्रमुख चिंता उन भारतीय महिलाओं के प्रति है जो भारतीय सभ्यता को पश्चिम की तुलना में हीन मानती हैं और सामाजिकसांस्कृतिक स्तर पर पश्चिम का अनुकरण करने की मांग करती हैं। लेखिका इस दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा में स्त्री के स्थान को पुनः स्थापित करती हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा स्त्री को चेतना और सृजनात्मकता के सर्वोच्च रूप के रूप में देखती है। लेखिका ने चतुर् वेदों से अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि स्त्री और पुरुष समान आध्यात्मिक एवं मानवीय गरिमा के अधिकारी हैं तथा दोनों की उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है। इस दृष्टिकोण में लैंगिक संघर्ष की अवधारणा के लिए भी सीमित स्थान है, क्योंकि आत्मा को मूलतः अलैंगिक माना गया है।

सनातन धर्म में स्त्री की भूमिका पश्चिमी दृष्टिकोण से मूलतः भिन्न रूप में प्रस्तुत होती है। सामवेद के संदर्भ में पत्नी को सहधर्मिणी के रूप में देखा गया है, अर्थात् वह पुरुष की केवल जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि उसके धर्म और कर्तव्यों की समान सहभागी है। इसके विपरीत, ईसाई परंपरा की व्याख्याओं में ईव द्वारा ज्ञान के फल का सेवन करने और उसके परिणामस्वरूप आदम के पतन की कथा को स्त्री की भूमिका से जोड़ा गया है। भारतीय सभ्यता में, इसके विपरीत, ज्ञान को स्त्री के लिए निषिद्ध नहीं माना गया। ब्रह्मवादिनियों की दीर्घ परंपराजिसमें अपाला और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों का उल्लेख मिलता है, यह प्रमाणित करती है कि वैदिक और उत्तरवैदिक काल में महिलाओं की शिक्षा एवं बौद्धिक सहभागिता के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद थे।
विवाह को भी केवल सामाजिक अनुबंध के रूप में नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्था और समान सहभागिता वाले संबंध के रूप में देखा गया। इसी प्रकार, मासिक धर्म को लेकर भारतीय समाज में एकरूप नकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रहा है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे अनेक राज्यों में कन्या के प्रथम ऋतुस्राव को सामाजिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठानों के माध्यम से उत्सव के रूप में स्वीकार किए जाने की परंपराएँ आज भी दिखाई देती हैं। स्वतंत्रतापूर्व और स्वतंत्रत्तोतर भारत दोनों में महिलाओं ने शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, सार्वजनिक नीति और सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अहिल्याबाई होलकर और रानी लक्ष्मीबाई जैसी महिलाओं ने न केवल अपने समय में असाधारण नेतृत्व का परिचय दिया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्त्रीत्व, साहस, शासनकौशल और कर्तव्यनिष्ठा के आदर्श भी स्थापित किए।

पुस्तक के इस्लामी और ईसाई दृष्टिकोणों पर केंद्रित अध्याय स्त्री के प्रति भेदभाव के ऐतिहासिक एवं धर्मशास्त्रीय पक्षों का विश्लेषण करते हैं। इस्लाम के संदर्भ में कुछ कुरआनी आयतों और पारंपरिक इस्लामी न्यायशास्त्र की उन व्याख्याओं की चर्चा की गई है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से लैंगिक पदानुक्रम स्थापित करने वाला माना गया है।
कुरआन की आयत 4:34 में पुरुषों को महिलाओं का qawwāmūn कहा गया है, जिसका अनुवादपालनकर्ता’, ‘भरणपोषण करने वालाअथवा कुछ संदर्भों मेंअधिकारीके रूप में किया गया है। पारंपरिक टीकाकारों ने इस आयत को परिवार में पुरुष के नेतृत्व और पत्नी के प्रति उसके अनुशासनात्मक अधिकार से जोड़ा है। इसी प्रकार, कुरआन 4:11 में कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में पुरुष उत्तराधिकारी के लिए महिला की तुलना में दोगुने हिस्से का प्रावधान मिलता है। इन प्रावधानों की आधुनिक नारीवादी विद्वानों द्वारा लैंगिक असमानता को संस्थागत रूप देने के आधार पर आलोचना की गई है।
हालांकि, यह भी स्वीकार करना आवश्यक है कि समकालीन मुस्लिम विद्वानों में इन आयतों की वैकल्पिक व्याख्याएँ प्रस्तुत करने की परंपरा मौजूद है, जिसमें पारस्परिक दायित्व, ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक न्याय पर बल दिया जाता है। अतः अकादमिक रूप से अधिक संतुलित निष्कर्ष यह होगा कि सभी मुसलमान महिलाओं को हीन मानते हैं, ऐसा कहना उचित नहीं है; बल्कि कुछ विशिष्ट धार्मिक प्रावधानों और प्रभावशाली पारंपरिक व्याख्याओं ने ऐतिहासिक रूप से परिवार और समाज में पुरुष अधिकार के लिए धार्मिक एवं विधिक आधार प्रदान किया है।

ईसाई धर्म में भी कुछ बाइबिलीय अनुच्छेदों की ऐसी व्याख्या की गई है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से पुरुष की तुलना में महिला की अधीनस्थ स्थिति को उचित ठहराने के लिए प्रयुक्त किया गया। Ephesians 5:22 में पत्नियों को अपने पतियों के अधीन रहने की बात कही गई है, जबकि 1 Timothy 2:11–12 में महिलाओं के शिक्षण और पुरुषों पर अधिकार रखने को सीमित करने वाली भाषा मिलती है। ऐतिहासिक रूप से इन अनुच्छेदों ने विवाह में पुरुषप्रधान नेतृत्व, चर्च में महिलाओं की धार्मिक भूमिका पर प्रतिबंध तथा अनेक ईसाई परंपराओं में महिलाओं के पादरी अथवा पुरोहित बनने पर रोक जैसी व्यवस्थाओं के लिए धर्मशास्त्रीय आधार उपलब्ध कराया। इसी प्रकार, Genesis में सृष्टि और पतन की कथा की पारंपरिक व्याख्याओं ने भी अनेक अवसरों पर स्त्री को अधीनस्थ स्थिति तथा ईव को मानवपतन और पाप की अवधारणा से जोड़ने में भूमिका निभाई। हालांकि, ईसाई धर्म को एकरूप रूप से स्त्रीविरोधी मानना भी ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। प्रारंभिक ईसाई समुदायों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिकाएँ थीं और आधुनिक नारीवादी धर्मशास्त्रियों ने पितृसत्तात्मक बाइबिलीय व्याख्याओं को चुनौती दी है। इसलिए अधिक संतुलित निष्कर्ष यह है कि कुछ बाइबिलीय अनुच्छेदों और उनकी पारंपरिक संस्थागत व्याख्याओं ने ऐतिहासिक रूप से स्त्री की अधीनता को वैधता प्रदान की, न कि ईसाई धर्म अनिवार्य रूप से महिलाओं को स्वभावतः हीन मानता है।

मार्क्सवाद और तथाकथितसांस्कृतिक मार्क्सवादके संदर्भ में भी सावधानीपूर्वक विवेचन आवश्यक है।सांस्कृतिक मार्क्सवादस्वयं एक विवादित और बहुअर्थी राजनीतिक पद है तथा इसे एकल, सुसंगत बौद्धिक सिद्धांत के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसके विपरीत, शास्त्रीय मार्क्सवाद ने महिलाओं की अधीनता की स्पष्ट आलोचना की। फ्रेडरिक एंगेल्स ने अपनी पुस्तक The Origin of the Family, Private Property and the State (1884) में महिलाओं के दमन को निजी संपत्ति, वर्गव्यवस्था और पितृसत्तात्मक परिवार के विकास से जोड़ा। उनके अनुसार निजी संपत्ति पर आधारित एकविवाही परिवार के उदय ने महिलाओं को आर्थिक रूप से आश्रित बनाया और पतिपत्नी के संबंधों को व्यापक वर्गीय संबंधों के समानांतर समझा जा सकता है। आगे चलकर मार्क्सवादी नारीवाद ने महिलाओं के शोषण को पूँजीवादी संरचनाओं, विशेषतः अवैतनिक घरेलू श्रम और श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन से जोड़कर देखा। अतः यह कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा कि मार्क्सवाद महिलाओं को स्वभावतः हीन मानता है। इसके बजाय आलोचना का अधिक उपयुक्त आधार यह हो सकता है कि कुछ मार्क्सवादी तथा उत्तरवर्ती उग्र सैद्धांतिक दृष्टिकोण महिलाओं के अनुभवों को मुख्यतः वर्ग, अर्थव्यवस्था अथवा वैचारिक संरचनाओं के माध्यम से समझने की प्रवृत्ति रखते हैं, जिसके कारण जैविक, पारिवारिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत आयाम अपेक्षाकृत उपेक्षित हो सकते हैं। यह तर्क महिलाओं को स्वभावतः हीन मानने की धारणा से मूलतः भिन्न है।

इसी क्रम में, वोकिज़्म, व्यक्तिवाद, लिवइन संबंध और पितृसत्ता जैसी अवधारणाओं के समकालीन रूपों ने भी भारतीय समाज में नए सामाजिक तनाव उत्पन्न किए हैं, विशेषतः तब, जब वे समुदाय, उत्तरदायित्व, पारिवारिक दायित्व और पारस्परिक कर्तव्यों को विस्थापित करने लगते हैं। इन अवधारणाओं का भारतीय समाज पर प्रभाव इसलिए गंभीर विमर्श का विषय बनता है क्योंकि इनके कुछ रूप भारतीय सभ्यता की संबंधपरक एवं कर्तव्यकेंद्रित विश्वदृष्टि से तनाव उत्पन्न करते हैं। वोकिज़्म का भारत में बिना पर्याप्त संदर्भबोध के अनुकरण विशेष रूप से समस्याग्रस्त हो सकता है, जब पश्चिम में विकसित सामाजिक श्रेणियों और संघर्ष की अवधारणाओं को भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं पर यांत्रिक रूप से आरोपित किया जाता है। भारतीय बौद्धिक परंपरा ने सदैव व्यक्तिगत नैतिक agency, आत्मविकास तथा पुरुषार्थों की साधना को स्वीकार किया है। समस्या व्यक्तित्व या स्वतंत्रता में नहीं, बल्कि उस स्थिति में उत्पन्न होती है जब स्वतंत्रताउग्र व्यक्तिवादका रूप ले लेती है और व्यक्तिगत इच्छा को सर्वोच्च नैतिक मानदंड मान लिया जाता है, जबकि परिवार और समुदाय के प्रति दायित्वों को बंधन के रूप में देखा जाने लगता है।

इसी प्रकार, पारंपरिक भारतीय समाज में विवाह को केवल दो व्यक्तियों के बीच रोमांटिक संबंध के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक, पारिवारिक और अंतरपीढ़ीगत संस्था के रूप में समझा गया है। इसमें पतिपत्नी, संतान तथा विस्तृत परिवार के प्रति उत्तरदायित्व निहित होते हैं। विवाहेतर या औपचारिक विवाह के बिना सहजीवन संबंधों (live-in relationships) का बढ़ता सामान्यीकरण कुछ परिस्थितियों में दीर्घकालिक प्रतिबद्धता की धारणा को कमजोर कर सकता है और संबंधों को अधिक अस्थायी अथवा सुविधाआधारित बना सकता है। इससे आर्थिक उत्तरदायित्व, उत्तराधिकार, देखभाल और बच्चों की सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रश्न भी उत्पन्न हो सकते हैं, यद्यपि भारतीय विधि ने विभिन्न परिस्थितियों में ऐसे संबंधों में रहने वाले व्यक्तियों और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक प्रावधान विकसित किए हैं। इसलिए प्रश्न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के संतुलन का है। भारतीय समाज के लिए चुनौती यह है कि वह पितृसत्तात्मक असमानताओं का सुधार करते हुए परिवार, प्रतिबद्धता और पारस्परिक दायित्वों की संस्थाओं को भी सुरक्षित रखे।

समग्रतः, स्त्री भारतीय स्त्रीविमर्श को पश्चिमी प्रतिमानों के अनुकरण से आगे ले जाकर भारतीय ज्ञान परंपरा के भीतर स्त्री की अवधारणा को पुनः देखने का अवसर प्रदान करती है। पुस्तक का मूल आग्रह इस बात पर केंद्रित है कि भारतीय स्त्री की अस्मिता को केवल आधुनिक पश्चिमी विमर्शोंजैसे समानता, अधिकार, व्यक्तिवाद या लैंगिक संघर्षके माध्यम से नहीं समझा जा सकता। भारतीय परंपरा में स्त्री को शक्ति, प्रकृति, सहधर्मिणी, ज्ञान और सृजन की अधिष्ठात्री के रूप में देखने वाली अनेक अवधारणाएँ मौजूद हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन अवधारणाओं का न तो रोमानीकरण किया जाए और न ही उन्हें पूर्वाग्रहपूर्वक अस्वीकार किया जाए, बल्कि उनका आलोचनात्मक एवं समकालीन पुनर्पाठ किया जाए। इस दृष्टि से स्त्री भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति, परंपरा, आधुनिकता और सांस्कृतिक आत्मबोध पर गंभीर विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करती है।

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