1911 का दस्तावेज खारिज, फिर तड़के चला बुलडोजर: सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद विवाद की पूरी कहानी

सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद पर सुबह 5 बजे चला बुलडोजर: 1911 का दावा, फर्जी बिल का आरोप और कोर्ट का आदेश; समझिए पूरी इनसाइड स्टोरी

Saharanpur mosque explainer 1911

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में बनी दशकों पुरानी मस्जिद को लेकर छिड़ा विवाद की अंत सीधे बुलडोजर एक्शन से हुआ। शनिवार, 5 सितंबर 2026 की तड़के जिला प्रशासन और पुलिस ने चार बुलडोजर लगाकर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित इस मस्जिद के ढांचे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इस कार्रवाई के बाद से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सियासी माहौल बेहद गरमा गया है।

क्या है पूरा मामला और कब हुई कार्रवाई

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद मस्जिद को लेकर विवाद तब शुरू हुआ, जब एक हिंदू संगठन के पूर्व पदाधिकारी की शिकायत पर प्रशासन ने जमीन की पैमाइश कराई। 17 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा माना और इसे खाली करने के साथ करीब 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। मस्जिद इंतेजामिया कमेटी ने इस आदेश को जिला जज की अदालत में चुनौती दी। 4 सितंबर 2026 को जिला जज की अदालत ने कमेटी की अपील खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट के फैसले को सही ठहराया। इसके बाद 5 सितंबर 2026 की सुबह करीब 4 से 5 बजे के बीच कलेक्ट्रेट के गेट बंद कर भारी फोर्स की मौजूदगी में ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।

मस्जिद का इतिहास और 1911 का बिजली बिल विवाद

मस्जिद कमेटी का कहना था कि यह मस्जिद आजादी से पहले की है। अपने दावे के पक्ष में कमेटी ने अदालत में 1 जनवरी 1911 का एक बिजली बिल और पुराने अभिलेख पेश किए थे। कमेटी की दलील थी कि खेवट नंबर 10/1 की यह जमीन पुराने जमींदारों (वाहिद खान और याकूब खान) के समय से मस्जिद के रूप में दर्ज है, इसलिए यह कानूनी तौर पर ‘वक्फ बाई यूजर’ के दायरे में आती है और कलेक्ट्रेट बाद में बना था।

दूसरी तरफ, सरकारी पक्ष ने इन दावों को अदालत में पूरी तरह खारिज कर दिया। प्रशासन ने रिकॉर्ड पेश कर बताया कि सहारनपुर शहर में बिजली की पहली आपूर्ति ही 1920 के दशक (1922-1928) में शुरू हुई थी, तो 1911 का बिजली बिल सही कैसे हो सकता है। सरकारी अभिलेखों के मुताबिक, 1888-89 (फसली वर्ष 1296) से यह जमीन ‘केसर-ए-हिंद’ (सरकारी भूमि) दर्ज है और सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील डीएम कार्यालय परिसर के भीतर बिना मंजूरी के किसी धार्मिक ढांचे को छूट नहीं दी जा सकती।

असदुद्दीन ओवैसी और इकरा हसन के आरोप 

इस ध्वस्तीकरण को लेकर विपक्ष ने प्रशासन को घेरा है और कानूनी मौका न देने का आरोप लगाया है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर प्रशासन की कार्रवाई पर कड़ा ऐतराज जताया

“सहारनपुर कलेक्ट्रेट में मस्जिद को सुबह 5 बजे ध्वस्त कर दिया गया। मस्जिद कमेटी ने इसके अस्तित्व को साबित करने के लिए 1911 तक के दस्तावेज पेश किए थे। वहां एक सदी से भी अधिक समय से लगातार नमाज अदा की जा रही थी। यह ‘वक्फ बाय यूजर’ की सीधी परिभाषा है, जिसे कानून के तहत वक्फ के रूप में संरक्षण प्राप्त है। मस्जिद पहले आई थी, कलेक्ट्रेट बाद में बना। “

वहीं, 5 सितंबर की सुबह सहारनपुर आने से पहले कैराना में ही नजरबंद (हाउस अरेस्ट) की गईं समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा

“निचली सिविल कोर्ट का आदेश आने के बाद पूरी मस्जिद को सील कर दिया गया और आसपास बैरिकेडिंग लगा दी गई; इस बीच, लोग अधिकारियों से बात करके इस मामले में कुछ समय की गुज़ारिश करना चाहते थे। लोग हाई कोर्ट जाना चाहते थे, लेकिन समय नहीं दिया गया। हम सभी प्रमुख लोगों को घरों में ही रोक दिया गया और फिर सुबह-सुबह मस्जिद को गिरा दिया गया, अगर सरकार इसी तरह कार्रवाई करने जा रही है, तो फिर देश की अदालतों पर ताला लगा दिया जाए।”

कोर्ट का फैसला और प्रशासन की दलील

सहारनपुर जिला प्रशासन और पुलिस के मुताबिक, यह कार्रवाई पूरी तरह विधिक दायरे में रहकर की गई है। डीआईजी और जिला अधिकारियों का कहना है कि सिटी मजिस्ट्रेट के बाद 4 सितंबर को जिला जज की अदालत से भी मस्जिद कमेटी की अपील खारिज हो चुकी थी। चूंकि किसी उच्च अदालत से कोई स्टे ऑर्डर नहीं था और ढांचा सरकारी कलेक्ट्रेट परिसर में अवैध पाया गया था, इसलिए अदालत के अंतिम आदेश का पालन करते हुए 5 सितंबर की सुबह यह ढांचा हटाया गया। किसी भी तरह के तनाव से निपटने के लिए इलाके में पीएसी, आरआरएफ और अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। 

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