ग्रीनलैंड पर ट्रंप का ‘Infinite Life’ समझौता क्या है? अमेरिका को क्या मिला, यूरोप और रूस-चीन के लिए क्यों बदलेंगे समीकरण

Greenland पर अमेरिका की बढ़ती सैन्य मौजूदगी, रूस-चीन पर रोक की कोशिश; ट्रंप के समझौते से यूरोप और NATO के सामने नई चुनौती

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच महीनों से चल रहा तनाव अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 सितंबर को ऐलान किया कि अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच एक नया सुरक्षा समझौता हुआ है। ट्रंप ने इसे “Infinite Life” यानी अनंत अवधि वाला समझौता बताया और दावा किया कि इसके तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा और उससे जुड़ी जरूरतों पर स्थायी नियंत्रण मिलेगा। साथ ही उन्होंने ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की बात कही।

लेकिन इस कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने इसे अमेरिका को ग्रीनलैंड सौंपने या उसकी संप्रभुता खत्म करने वाला समझौता नहीं बताया है। दोनों का कहना है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के भीतर रहेगा और ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान होगा। समझौते को अभी औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित किया जाना है और इसके बाद जरूरी संसदीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी।

आखिर ग्रीनलैंड इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

दुनिया के नक्शे पर ग्रीनलैंड को देखें तो इसकी अहमियत तुरंत समझ आती है। यह उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है। इसके आसपास का समुद्री क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक को जोड़ता है। यही वजह है कि नाटो के लिए आर्कटिक अब सिर्फ बर्फीला और दूरदराज इलाका नहीं रह गया है, बल्कि सामूहिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

नाटो के अनुसार आर्कटिक सुरक्षा की रणनीतिक अहमियत के मुताबिक आर्कटिक उत्तरी अटलांटिक तक पहुंच का महत्वपूर्ण मार्ग है और यहां से यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के बीच व्यापार, परिवहन और संचार संपर्क गुजरते हैं। रूस ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ाई हैं, जबकि चीन की ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और समुद्री मार्गों में रुचि बढ़ रही है।

अमेरिका के लिए इसका मतलब है कि ग्रीनलैंड सिर्फ जमीन का एक बड़ा टुकड़ा नहीं है। यह उत्तर अमेरिका की रक्षा, आर्कटिक निगरानी, मिसाइल चेतावनी और अंतरिक्ष गतिविधियों के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थान है।

अमेरिका पहले से ग्रीनलैंड में क्या कर रहा है?

यह भी समझना जरूरी है कि अमेरिका ग्रीनलैंड में पहली बार सैन्य मौजूदगी स्थापित नहीं कर रहा है। ग्रीनलैंड में अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस पहले से मौजूद है। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार यह अड्डा अंतरिक्ष निगरानी और शुरुआती मिसाइल चेतावनी जैसी क्षमताओं के लिए महत्वपूर्ण है और आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका तथा नाटो की सैन्य क्षमता को मजबूत करता है। अमेरिका और डेनमार्क के बीच ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का ढांचा कई दशक पुराना है।

नया समझौता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मौजूदा व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए अमेरिका को लंबी अवधि के लिए अधिक व्यापक सैन्य पहुंच और गतिविधियों की संभावना देता है। Reuters के अनुसार समझौते में अमेरिकी पहुंच, सैन्य अड्डों के इस्तेमाल और हवाई क्षेत्र से जुड़े अधिकारों को मजबूत करने की बात सामने आई है।

ट्रंप ने ‘Infinite Life’ क्यों कहा?

ट्रंप के मुताबिक इस समझौते की कोई समाप्ति तारीख नहीं होगी। उन्होंने इसे “Infinite Life” समझौता बताते हुए कहा कि अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए हमेशा वह करने की क्षमता रहेगी जो जरूरी हो।

ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड में बड़ी सैन्य मौजूदगी विकसित करने की प्रक्रिया तुरंत शुरू करेगा और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर निर्माण तथा विकास का काम करेगा। उनके मुताबिक अमेरिका के किसी प्रतिद्वंद्वी देश को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा बनाने, सैन्य मौजूदगी रखने या संवेदनशील निवेश करने की अनुमति अमेरिकी मंजूरी के बिना नहीं होगी। यहीं से रूस और चीन का पहलू सामने आता है।

निशाने पर रूस और चीन क्यों हैं?

आर्कटिक अब अमेरिका और रूस के बीच पुरानी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र तो है ही, चीन भी धीरे-धीरे यहां अपनी मौजूदगी और आर्थिक रुचि बढ़ा रहा है। रूस के पास आर्कटिक में लंबी समुद्री सीमा, सैन्य अड्डे और उत्तरी समुद्री मार्ग से जुड़ी रणनीतिक क्षमता है। नाटो के मुताबिक रूस ने आर्कटिक में नए और पुराने सैन्य ठिकानों को सक्रिय किया है, जबकि चीन ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और समुद्री संपर्कों तक पहुंच में रुचि दिखा रहा है।

ग्रीनलैंड में अमेरिका की स्थायी सुरक्षा भूमिका का अर्थ होगा कि वॉशिंगटन इस इलाके में किसी गैर-नाटो शक्ति की सैन्य या संवेदनशील आर्थिक मौजूदगी को रोकने की स्थिति मजबूत करना चाहता है।

इसका असर केवल ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं रहेगा। आर्कटिक में अमेरिका और उसके सहयोगियों की निगरानी क्षमता बढ़ने का अर्थ रूस के लिए उत्तरी दिशा में सैन्य गतिविधियों की निगरानी और नाटो की प्रतिक्रिया क्षमता में बदलाव हो सकता है।

चीन के लिए इसका मतलब यह हो सकता है कि ग्रीनलैंड के खनिजों, बंदरगाहों, संचार ढांचे या दूसरी रणनीतिक परियोजनाओं में निवेश करना पहले की तुलना में ज्यादा कठिन हो।

लेकिन क्या अमेरिका ने ग्रीनलैंड हासिल कर लिया?

नहीं। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। समझौते से ग्रीनलैंड अमेरिकी क्षेत्र नहीं बन रहा और न ही डेनमार्क अपनी संप्रभुता अमेरिका को हस्तांतरित कर रहा है।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने साफ कहा है कि व्यवस्था डेनमार्क की संप्रभुता और ग्रीनलैंड के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देती है। Reuters के मुताबिक समझौता भविष्य में ग्रीनलैंड स्वतंत्र हो जाने की स्थिति में भी अमेरिकी सुरक्षा अधिकारों को जारी रखने की दिशा में प्रावधान कर सकता है।

यानी ट्रंप के पुराने ग्रीनलैंड अधिग्रहण वाले विचार और मौजूदा समझौते में बड़ा अंतर है। पहले सवाल जमीन के मालिकाना हक का था, अब बातचीत का केंद्र सुरक्षा, सैन्य पहुंच और रणनीतिक नियंत्रण बन गया है।

यूरोप के लिए इसका क्या मतलब है?

यूरोप के सामने यहां एक दिलचस्प स्थिति है। एक तरफ यूरोपीय देश चाहते हैं कि अमेरिका नाटो की सुरक्षा में सक्रिय रहे और रूस के खिलाफ यूरोप की रक्षा क्षमता मजबूत बनी रहे। दूसरी तरफ ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन है और इसलिए उसकी संप्रभुता यूरोपीय देशों के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा है।

हाल ही में यूरोपीय संघ ने ग्रीनलैंड के साथ अपनी साझेदारी मजबूत करने के लिए निवेश और सहयोग बढ़ाने की घोषणा की है। सितंबर में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेर लेयेन ने ग्रीनलैंड में कहा कि उसकी भविष्य की दिशा ग्रीनलैंड के लोगों और डेनमार्क को तय करनी है। यूरोपीय संघ ने कनेक्टिविटी, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और सुरक्षा सहयोग पर भी अपनी मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं।

इसलिए ग्रीनलैंड अब अमेरिका-डेनमार्क विवाद भर नहीं है। यह अमेरिका, यूरोप, रूस और चीन के बीच आर्कटिक की बदलती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है।

ग्रीनलैंड के लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल

सबसे बड़ा सवाल अंततः ग्रीनलैंड के लोगों का है। ग्रीनलैंड में लंबे समय से स्वतंत्रता की आकांक्षा मौजूद है और स्थानीय राजनीति में आत्मनिर्णय महत्वपूर्ण मुद्दा है। ऐसे में किसी भी बड़े सैन्य या आर्थिक समझौते को स्थानीय लोगों की सहमति और अधिकारों के संदर्भ में देखना जरूरी होगा।

यही कारण है कि मौजूदा समझौते का अंतिम स्वरूप महत्वपूर्ण होगा। अभी समझौते का पूरा कानूनी पाठ सार्वजनिक नहीं हुआ है और इसे औपचारिक हस्ताक्षर तथा संसदीय प्रक्रियाओं से गुजरना है। I

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