फ्रांस में सड़कों पर उतरी भीड़, जलती इमारतें, लूटपाट और पुलिस से हिंसक टकराव की तस्वीरें केवल यूरोप की राजनीतिक उथल-पुथल की कहानी नहीं हैं। ये उन सभी देशों के लिए चेतावनी हैं, जहां विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक दबाव बनाने का हथियार समझा जाता है और आंदोलन की आड़ में कानून-व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश होती है।
17 अक्टूबर 2026 को फ्रांस में महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं में कटौती और शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। इनमें सैकड़ों हजार लोग शामिल हुए। लेकिन कई शहरों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसा में बदल गए। दुकानों में लूटपाट हुई, सार्वजनिक इमारतों को निशाना बनाया गया और लिमोज शहर के टाउन हॉल में आग लगा दी गई। फ्रांसीसी अधिकारियों ने 1,200 गिरफ्तारियों और 150 सुरक्षाकर्मियों के घायल होने की जानकारी दी। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की निंदा की। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान हिंसक समूहों ने सार्वजनिक व्यवस्था को गंभीर चुनौती दी।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात समझने की है। फ्रांस में उठे हर विरोध को हिंसक कहना गलत होगा। लेकिन यह मान लेना भी उतनी ही बड़ी भूल है कि किसी आंदोलन के पीछे वास्तविक जनसमस्याएं हैं, इसलिए उसमें शामिल हर कार्रवाई जायज हो जाती है।
विरोध का अधिकार है, अराजकता फैलाने का नहीं
लोकतंत्र में सरकार की नीतियों का विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। महंगाई बढ़े, स्कूलों में शिक्षक न हों या सार्वजनिक सेवाएं कमजोर पड़ें, तो जनता को सरकार से जवाब मांगना ही चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि जवाब मांगने और समाज को बंधक बनाने के बीच अंतर कब मिट जाता है?
किसी दुकान में आग लगाने से महंगाई कम नहीं होती। पुलिसकर्मियों पर हमला करने से स्कूलों में शिक्षक नहीं बढ़ते। सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाने से सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता नहीं सुधरती। उलटे, मरम्मत और सुरक्षा पर जनता का पैसा खर्च होता है और सामान्य नागरिकों की जिंदगी मुश्किल बनती है।
जो प्रदर्शनकारी अपने गुस्से की कीमत किसी दूसरे की संपत्ति, सुरक्षा और आजीविका से वसूलना चाहते हैं, उन्हें अपने तरीकों का जवाब भी देना चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन दूसरों के अधिकारों को कुचलने की छूट नहीं।
आंदोलन के पीछे जनता, लेकिन फायदा किसे?
फ्रांस के मौजूदा घटनाक्रम में शिक्षा व्यवस्था, महंगाई और सरकारी खर्च जैसे वास्तविक मुद्दे हैं। इन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। समस्या तब पैदा होती है, जब जनाक्रोश राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का औजार बन जाता है और कुछ समूह हिंसक गतिविधियों के जरिए आंदोलन की दिशा बदलने लगते हैं।
फ्रांस में अधिकारियों ने कट्टर वामपंथी समूहों और अवसरवादी अपराधियों पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है। इन आरोपों की राजनीतिक प्रकृति और जिम्मेदार लोगों की भूमिका की जांच जरूरी है। केवल सरकार का आरोप किसी संगठन का दोष सिद्ध नहीं करता।
लेकिन व्यापक सवाल फिर भी बना रहता है: क्या किसी राजनीतिक दल या विचारधारा को आंदोलन के नाम पर हिंसा से लाभ उठाने की कोशिश करने पर जवाबदेह नहीं होना चाहिए?
जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बीच दुकानों में लूटपाट शुरू होती है, सार्वजनिक भवनों पर हमले होते हैं और पुलिस से हिंसक भिड़ंत होती है, तो आंदोलन की नैतिक ताकत कमजोर पड़ती है। वास्तविक समस्याएं पीछे छूट जाती हैं और सुर्खियां हिंसा पर केंद्रित हो जाती हैं।
भारत को फ्रांस से क्या सबक लेना चाहिए?
भारत में भी अक्सर प्रदर्शन, धरने, बंद और सड़क जाम के जरिए सरकार पर दबाव बनाया जाता है। इनमें से अनेक आंदोलन वास्तविक जनसमस्याओं से जुड़े होते हैं। किसान, कर्मचारी, छात्र और दूसरे नागरिक लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें उठा सकते हैं।
लेकिन किसी आंदोलन की वैधता केवल इस बात से तय नहीं हो सकती कि उसके समर्थक कितने हैं या उसका राजनीतिक नारा कितना आकर्षक है। यह भी देखना होगा कि आंदोलन कानून का पालन कर रहा है या नहीं, आम लोगों के जीवन को कितना प्रभावित कर रहा है और हिंसा करने वालों के खिलाफ उसके आयोजक क्या रुख अपनाते हैं।
दिल्ली की सड़क पर फंसा मरीज, परीक्षा देने जा रहा छात्र, रोज कमाकर परिवार चलाने वाला कामगार और समय पर सामान पहुंचाने वाला छोटा व्यापारी भी इसी लोकतंत्र का हिस्सा है। आंदोलनकारियों की आवाज महत्वपूर्ण है, लेकिन इन नागरिकों के अधिकार कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।
किसी सड़क को अनिश्चितकाल तक रोक देना या सार्वजनिक परिवहन ठप कर देना अपने आप में जनहित का प्रमाण नहीं बन जाता। प्रशासन को भी विरोध की अनुमति देते समय नागरिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और यातायात के बीच संतुलन बनाना चाहिए। जहां हिंसा या गंभीर खतरा पैदा हो, वहां कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।
कानून का राज कमजोर हुआ तो नुकसान जनता का होगा
फ्रांस का अनुभव यह भी बताता है कि जब राजनीतिक असंतोष लगातार बढ़ता है, तब कानून-व्यवस्था संभालना कठिन हो सकता है। लेकिन इसका समाधान न तो हर प्रदर्शन को अपराध मानना है और न ही हिंसक तत्वों को आंदोलनकारी बताकर छोड़ देना।
शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वालों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। अपराध के लिए जिम्मेदारी व्यक्तिगत सबूतों और निष्पक्ष जांच के आधार पर तय होनी चाहिए। पुलिस की कार्रवाई भी कानून के दायरे में रहे और उसके दुरुपयोग की शिकायतों की जांच हो।
सरकार को जनसमस्याओं का समाधान करना चाहिए, लेकिन हिंसा के दबाव में नीतिगत फैसले लेने की मजबूरी भी लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। यदि हिंसा ही निर्णय बदलवाने का प्रभावी तरीका बन जाए, तो शांतिपूर्ण संवाद और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होगा।
लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है, हिंसक भीड़ नहीं
फ्रांस की घटनाओं से भारत को स्पष्ट सबक लेना चाहिए। सरकार की आलोचना कीजिए, नीतियों पर सवाल उठाइए, शांतिपूर्ण प्रदर्शन कीजिए और जरूरत पड़े तो अदालतों तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं का सहारा लीजिए। लेकिन विरोध के नाम पर आगजनी, लूटपाट और हिंसा को किसी भी विचारधारा की ढाल नहीं मिलनी चाहिए।
लोकतंत्र की असली परीक्षा केवल इस बात में नहीं है कि सरकार विरोध को कितना सहन करती है। परीक्षा इस बात की भी है कि प्रदर्शनकारी अपने अधिकारों का इस्तेमाल दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हुए करते हैं या नहीं।
सड़क पर उतरने से किसी को कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं मिल जाता। लोकतंत्र में आवाज बुलंद होनी चाहिए, लेकिन कानून का राज उससे भी बुलंद रहना चाहिए।
